पहले कॉर्पोरेट लाइफ में जमाया सिक्का, फिर आपको दिया Aadhaar

2009 में मनमोहन सिंह ने Nandan Nilekani को UIDAI यानि यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया का चेयरमैन बनाया और उन्हें एक कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया.

पहले कॉर्पोरेट लाइफ में जमाया सिक्का, फिर आपको दिया Aadhaar
नंदन नीलेकणी (फाइल फोटो)

मोहम्मद हामिद, नई दिल्ली: इनोवेटर, टेक्नोक्रैट, इनवेस्टर, मेंटॉर, विजनरी और दानी...ये वो गुण हैं जो किसी एक शख्स में हों तो वो नंदन नीलेकणी (Nandan Nilekani) हो जाता है. ये वो नाम है जो हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है.

नंदन नीलेकणी कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरू में 2 जून 1955 को पैदा हुए. पढ़ने लिखने में शुरू से ही तेज तर्रार थे. शुरुआती पढ़ाई बैंगलोर के बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल और पीयू कॉलेज धारवाड़ से हुई. इसके बाद वो IIT बॉम्बे पहुंचे और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

यहां से हुई कैरियर शुरुआत
1978 में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मुंबई के पटनी कंप्यूटर्स से की, जहां वो पहली बार लेजेंड्री एन आर नारायणमूर्ति से मिले और उन्हें अपना इंटरव्यू दिया. यही नंदन नीलेकणी की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. क्योंकि 1981 में नारायणमूर्ति ने पटनी कंप्यूटर्स छोड़कर पांच लोगों के साथ मिलकर इंफोसिस की नींव रखी, उन पांच लोगों में नंदन नीलेकणी भी शामिल थे. उनकी काबिलियत पर नारायणमूर्ति को जबरदस्त भरोसा था, 2002 में उन्होंने नंदन नीलेकणी को इंफोसिस का CEO बना दिया. इंफोसिस को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का काफी हद तक श्रेय नंदन नीलेकणी को ही जाता है. क्योंकि 5 साल के अपने CEO काल के दौरान उन्होंने कंपनी का मुनाफा 6 गुना बढ़ाया और 300 करोड़ डॉलर तक ले गए. 2007 में उन्होंने CEO का पद छोड़ दिया, और अब एक बार फिर से इंफोसिस के चेयरमैन की कमान संभाल रहे हैं.

टेक्नोक्रैट भी है नंदन निलेकणी
नंदन नीलेकणी एक जबरदस्त टेक्नोक्रैट हैं, जब मनमोहन सिंह की सरकार देश भर में आधार योजना को लागू करने की सोच रही थी, तब उन्हें एक ऐसे शख्स की तलाश थी जो इस काम को बखूबी कर सके, तब उन्होंने नंदन नीलेकणी को बुलाया. 2009 में मनमोहन सिंह ने उन्हें UIDAI यानि यूनीक आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया का चेयरमैन बनाया और उन्हें एक कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया. नंदन नीलेकणी को आधार का आर्किटेक्ट माना जाता है, क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में हर किसी को एक विशिष्ट पहचान देना एक असंभव सा काम था, लेकिन नीलेकणी ने वो कर दिखाया. नंदन नीलेकणी ने राजनीति में भी हाथ आजमाया लेकिन बात नहीं बनी. 2014 में वो कांग्रेस के टिकट पर बैंगलुरू साउथ से लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन हार गए. नंदन नीलेकणी राजनीति में आने को अपनी सबसे बड़ी गलती मानते हैं.

नंदन नीलेकणी एक इनोवेटिव माइंड और 'सीरियल इनवेस्टर' हैं, हर वक्त कुछ नया करते हैं और नई चीजों को बढ़ावा देते हैं, यही वजह है कि उन्होंने करीब 12 स्टार्टअप्स में निवेश किया है. अपने इनोवेशन के जरिए वो समाज सेवा भी करते हैं. वो और उनकी पत्नी रोहिणी ने अपनी आधी संपत्ति 'गिविंग प्लेज' नाम की सामाजिक संस्था को दान कर दी है, जो बिल गेट्स चलाते हैं. नंदन नीलेकणी अपनी पत्नी के साथ मिलकर EKSTEP नाम से साक्षरता प्रोग्राम भी चलाते हैं. ये एक नॉन प्रॉफिट संस्था है जो टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों की शिक्षा को आसान और बेहतर बनाने लिए के लिए काम करती है.

इंफोसिस और UIDAI के अलावा उन्होंने कई हाई प्रोफाइल पदों पर काम किया है. नंदन नीलेकणी की छवि एक संकटमोचक के तौर भी पर रही है, जब जिसकी नैया अटकी उसने नंदन नीलेकणी को ही याद किया. चाहे वो सरकार हो या कोई निजी कंपनी. अपनी किसी हीरो सरीखी जिंदगी में नंदन नीलेकणी ने कई बड़े सम्मान हासिल किए. 2006 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया, TIMES मैगजीन ने 2006 में उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली व्यावसायिक व्यक्तियों में शुमार किया. 2006 और 2007 में फोर्ब्स ने उन्हें बिजनेस लीडर ऑफ द ईयर से नवाजा.  
नंदन नीलेकणी एक हंसमुख और जिंदादिल इंसान हैं, 65 साल की उम्र में वो आज भी किसी उत्साही टीनेजर की तरह काम करते हैं.