Birth Anniversary: शैलेंद्र के गीतों के बिना अधूरे थे राज कपूर, जानिए अनसुने किस्से...

गीतकार शैलेंद्र (Shailendra) के गीतों के बिना राज कपूर (Raj Kapoor) का सिनेमा अधूरा सा लगता है, इन दोनों ने मिलकर बॉलीवुड को कई बेहतरीन गानों की सौगात दी है. आज शैलेंद्र का जन्मिदन है, इस मौके पर जानते हैं इस जोड़ी के बारे में कुछ खास बातें...

Birth Anniversary: शैलेंद्र के गीतों के बिना अधूरे थे राज कपूर, जानिए अनसुने किस्से...

नई दिल्ली: आवारा हूं.., मेरा जूता है जापानी.., रमैया वस्तावैया.., दोस्त दोस्त ना रहा.., प्यार हुआ इकरार हुआ.., सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है.., ये रात भीगी भीगी..., पान खाए सैंया हमारो..., सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी..., हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..., चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनियां, जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां.... राज कपूर (Raj Kapoor)  के ऐसे पचासों सुपरहिट गाने हैं, जिनके बिना राज कपूर (Raj Kapoor) का सिनेमा अधूरा सा लगता है, और ये सभी गाने शैलेंद्र (Shailendra) ने लिखे थे.

इस दोस्त के संग छेड़ते थे तान
गीतकार शैलेंद्र (Shailendra) का जन्म रावलपिंडी में हुआ था, लेकिन उनकी जड़ें बिहार के आरा के अख्तियारपुर से जुड़ी थीं. लेकिन वो पले बढ़े मथुरा में और वहीं से उनके करियर ने उड़ान लेनी शुरू कर दी. मथुरा के किशोरी रमण स्कूल में उनकी दोस्ती हुई इंद्र बहादुर खरे से, दोनों नौजवान रेलवे स्टेशन और स्टाफ क्वार्टर के बीच एक तालाब किनारे पड़ी चट्टान पर बैठकर तान लगाया करते थे, कविताओं की, गीतों की, गजलों की. इंद्र बहादुर खरे कवि सम्मेलनों की दुनिया के जाने पहचाने चेहरे बन गए, दोनों कवि सम्मेलनों और मुशायरों में जाने लगे. इंद्र बहादुर तो अकेडमिक्स में चले गए और कविताएं करते रहे लेकिन शैलेंद्र की किस्मत में कुछ और लिखा था.

रेलवे में की नौकरी
शैलेंद्र को रेलवे में बतौर एप्रेंटिस जॉब मिल गई, पोस्टिंग थी मुंबई के मांटुंगा स्टेशन की रेलवे वर्कशॉप में. ये नौकरी लगने वाली बात साल 1947 की है, लेकिन कविताओं, गजलों का शौक उनका जारी रहा. 

ऐसे हुई राज कपूर से मुलाकात, लेकिन नहीं जमी बात
उन दिनों राज कपूर अपने पिता से अलग अपना करियर बनाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, बतौर एक्टर भी, डायरेक्टर भी. एक दिन उन्होंने शैलेंद्र को एक मुशायरे में गाते देखा, नज्म का नाम थी 'जलता है पंजाब'. राज कपूर को ये काफी पसंद आई, उन्होंने फौरन शैलेंद्र से उसे बेचने को कहा, इसे वो अपनी आने वाली फिल्म 'आग' (1948)  में लेना चाहते थे. लेकिन जवानी के उफान और वामपंथी रुझान में शैलेंद्र ने साफ इनकार कर दिया. शैलेंद्र वामपंथी संस्था इप्टा से जुड़ गए थे और संस्था के लोगों से पूछे बिना कुछ नहीं करते थे. उन दिनों सिनेमा को लेकर वामपंथियों में ही तमाम गुट थे.

जरूरत पर काम आए राज कूपर
इधर शैलेंद्र की शादी हो गई, पत्नी प्रेग्नेंट हुई तो पैसे की जरुरत पड़ी, उनकी ये जरूरत उनको राजकपूर के पास खींच ले गई. तब उन्होंने किसी भी वामपंथी दोस्त से बिना चर्चा किए राजकपूर से मिलने में ही भलाई समझी. तब राजकपूर अपनी फिल्म 'बरसात' पर काम कर रहे थे. अभी 2 गाने बाकी थी, राजकपूर ने कहा अगर गाने मुझे पसंद आए तो 500 रुपए दूंगा. राजी हो गए शैलेंद्र और इस तरह उनके दो गाने जुड़े 'बरसात में हमसे मिले...' और दूसरा अखिलेश के साथ मिलकर 'पतली कमर है...'.

जिंदगी से ऐसे जोड़ते थे गीत
गीतकार कैसे निजी जिंदगी की शिकायत भी अपने गीतों के जरिए करता है, उसको आप इस दिलचस्प वाकए से समझ सकते हैं. शैलेंद्र के पहले 2 गानों को फिल्म 'बरसात' में संगीत दिया था शंकर-जयकिशन ने. तीनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया, लेकिन शैलेंद्र का नाम जब उन्होंने कई प्रोडयूसर्स के सामने नहीं बढ़ाया तो उन्होंने एक दिलचस्प तरीके से विरोध जताया. चार लाइनें एक कागज पर लिखीं और उन तक भिजवा दिया, वो 4 लाइनें थीं-

छोटी सी ये दुनियां,

पहचाने रास्ते हैं..

कहीं तो मिलोगे,

तो पूछेंगे हाल...

शैलेंद्र की ये लाइनें शंकर-जयकिशन के दिल को छू गईं. उन दिनों वो राजेन्द्र सिंह बेदी की मूवी 'रंगोली' का म्यूजिक तैयार कर रहे थे, जिसके गीत लिखने वाले थे मजरूह सुल्तानपुरी. उन्होंने प्रोडयूसर से शैलेंद्र की बात की और इस तरह शैलेंद्र का ये गीत उस मूवी में शामिल हुआ और सुपरहिट क्लासिक बन गया.

यह थी जीवन की सबसे बड़ी भूल
शैलेंद्र ने जैसे ही ज्यादा पैसे कमाने के लिए राजकपूर की मूवी 'तीसरी कसम' में कुछ ज्यादा पैसा निवेश कर दिया तो दिक्कत हो गई, मूवी की तारीफ तो हुई, लेकिन ज्यादा पैसे नहीं कमा पाई और शैलेंद्र फाइनेंशियस परेशानियों में फंसते चले गए, ज्यादा शराब पीने लगे, कभी उबर नहीं पाए और बहुत जल्द ही इस दुनिया से चले गए.

बेटे ने पूरा किया अधूरा काम 
उन दिनों राजकपूर और शैलेंद्र 'मेरा नाम जोकर' पर काम कर रहे थे, उस मूवी का सबसे जरूरी गाना शैलेंद्र ने आधा ही लिख पाया था- 'जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां...', जिसे राजकपूर के कहने पर उनके बेटे शैली शैलेंद्र ने पूरा किया.

और भी हैं मशहूर गाने
लेकिन ऐसा नहीं था कि शैलेंद्र ने बस राजकपूर के लिए ही गाने लिखे थे, गाता रहे मेरा दिल (देवआनंद की 'गाइड'), आजा आई बहार (शम्मी कपूर की 'राजकुमार'), ये मेरा दीवानापन है (दिलीप कुमार की 'यहूदी'), अजीब दास्तां है ये कहां शुरू कहां खतम (राजकुमार की 'दिल अपना और प्रीत पराई'), चढ़ गयो पापी बिछुआ (दिलीप कुमार की 'मधुमति') जैसे सैकड़ों सुपरहिट गाने उनकी कलम से निकले, जो अलग अलग हीरो हीरोइंस पर फिल्माए गए.

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