वह फिल्ममेकर जिसने बॉलीवुड में लगाया मसाला फिल्मों का तड़का, आमिर खान से है खास रिश्ता

यादों की बारात, फिर वही दिल लाया हूं, कयामत से कयामत तक जैसी कई सुपरहिट फिल्में देने वाले नासिर हुसैन ने 2002 में आज के दिन ही अंतिम सास ली थी 

वह फिल्ममेकर जिसने बॉलीवुड में लगाया मसाला फिल्मों का तड़का, आमिर खान से है खास रिश्ता
फोटो साभार: Bollywoodlife

नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा पूरी दुनिया में अपनी मसाला मूवीज और रोमांटिक गानों के लिए जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी सिनेमा को उसकी यह पहचान दिलाने वाला महान फिल्मकार कौन था? वह कौन था जिसने बॉलीवुड को अमीर हीरोइन, गरीब हीरो, हीरोइन का गुस्से वाला पिता और इस एक कहानी के साथ कई सारे इमोशन, डायलॉग, गाने, ट्विस्ट एंड टर्न दिए. तो आपको बता दें कि बॉलीवुड को यह मसालेदार तड़का देने वाला कोई और नहीं बल्कि मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान के ताऊजी आमिर खान यानी नासिर हुसैन थे. आज ही के दिन 2002 में नासिर हुसैन ने इस दुनिया से विदा ली थी. इस मौके जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें... 

नासिर हुसैन को अपने करियर को लेकर अपने परिवार में काफी संघर्ष करना पड़ा था. क्योंकि नासिर एक मुस्लिम धार्मिक परिवार से थे. जहां पढ़ाई लिखाई करके अच्छे ओहदे को पाना ही सफल होना मना जाता था. लेकिन नासिर का मन फिल्मी दुनिया की तरफ दौड़ रहा था. इस मामले में नासिर को कई बार समझाया गया. लेकिन अंत में उन्हें अपने घर से भागकर अपने करियर की राह पकड़नी पड़ी. 

लोग मांगते थे नासिर की रिजेक्ट की हुई धुन 
एक इंटरव्यू में म्यूजिक डायरेक्टर आरडी बर्मन ने बताया था कि नासिर हुसैन की म्यूजिक पर पकड़ इतनी ज्यादा थी कि उनका हर गाना सुपरहिट होना तय था. बर्मन के अनुसार वह नासिर को जब कई धुनें सुनाते तब उन्हें कुछ पसंद आती थीं. ऐसे में दूसरे फिल्ममेकर्स आरडी बर्मन के पास आकर कहते थे कि जो धुने नासिर ने रिजेक्ट कर दी हैं वह वे उनके लिए बेच सकते हैं. इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि नासिर की संगीत पर कितनी बेहतरीन पकड़ थी.  

नासिर हुसैन का जन्म 16 नवंबर 1926 को हुआ था और 13 मार्च 2002 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी. नासिर फिल्म निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक थे. उन्होंने 'यादों की बारात' (1973) को निर्देशित किया, जिसने बॉलीवुड मसाला फिल्म शैली बनाई जिसने 1970 और 1980 के दशक में हिंदी सिनेमा को परिभाषित किया. साथ ही उन्होंने 'कयामत से कयामत तक' (1988) को लिखा और प्रोड्यूस किया, जिसने 1990 के दशक में हिंदी सिनेमा को म्यूजिक रोमांटिसिज्म के नए दौर को स्थापित किया. इनके ऊपर एक किताब 'म्यूजिक, मस्ती और मॉडर्निटी- द सिनेमा ऑफ नासिर हुसैन' भी लिखी गई है.

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