FILM REVIEW: कमाल की एक्टिंग और इमोशन्स से भरपूर है 'सांड की आंख'

वैसे तो आपने अब तक कई जगह चन्द्रो और प्रकाशी तोमर की कहानी को सुना और पढ़ा होगा, लेकिन अब वक्त आ गया इसे देखना का.

FILM REVIEW: कमाल की एक्टिंग और इमोशन्स से भरपूर है 'सांड की आंख'
फिल्म 'सांड की आंख' आज (25 अक्टूबर) सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है.

नई दिल्ली: जिंदगी को सही तरीके से जीना इतना आसान नहीं होता. इस राह में कई सारी मुसीबतें आपके सामने होती हैं, जिसे कैसे संभालना है और कैसे इसका हल निकालना है, यह सोचते-सोचते और आखिरी पड़ाव तक आते-आते आपकी जिंदगी के कई हसीन पल भी गुजर जाते हैं. लेकिन एक वक्त वह हसीन पल दोबारा आपकी जिंदगी में लौटकर आता है और जब वह आता है तो कई सारी खुशियां भी साथ लाता है. इसी तथ्य पर आधारित है उत्तर प्रदेश के बागपत के जोहरी गांव की दो शूटर दादियों चन्द्रो तोमर (Chandro Tomar) और प्रकाशी तोमर (Prakashi Tomar) की सच्ची कहानी, जिसे बड़े पर्दे पर फिल्म 'सांड की आंख (Saand Ki Aankh)' के जरिए उतारा है निर्देशक तुषार हीरानंदानी (Tushar Hiranandani) ने उतारा है.

SAAND KI AANKH

वैसे तो आपने अब तक कई जगह चन्द्रो और प्रकाशी तोमर की कहानी को सुना और पढ़ा होगा, लेकिन अब वक्त आ गया इसे देखना का. चन्द्रो तोमर के रोल में भूमि पेडनेकर और प्रकाशी तोमर के रोल में तापसी पन्नू की जितनी तारीफ की जाए कम है. फिल्म 'सांड की आंख' आज (25 अक्टूबर) सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. भूमि और तापसी ने इस फिल्म में जबरदस्त एक्टिंग का प्रदर्शन किया है. इनके अलावा फिल्म में प्रकाश झा, विनीत कुमार सिंह और पवन चोपड़ा भी अहम भूमिकाओं में हैं. 

SAAND KI AANKH

अब बात करते हैं फिल्म की कहानी कि तो बागपत के जोहर गांव में तोमर परिवार की बहू चन्द्रो और प्रकाशी तोमर, जो अपनी जिंदगी में घर का काम करने, खाना पकाने, अपने पति की सेवा करने, खेत जोतने और भट्टी में काम करने के अलावा ज्यादा कुछ खास कर नहीं पाईं, लेकिन उन्होंने एक काम जरूर किया और वो था कि दोनों ने एक सपना देखा. सपना भी ऐसा जो उनकी बाकी बची जिंदगी को एक नई राह तक ले जाने वाली. जिंदगी के 60 साल ऐसे ही जीवन निकाल देने एक बाद चन्द्रो और प्रकाशी को अचानक से अपने शूटिंग टैलेंट का पता चलता है. 

SAAND KI AANKH

फिर दोनों कुछ करना चाहती हैं. दोनों शूटिंग भी अपना नाम कमाना चाहती है, लेकिन शूटर बनने का सपना देखने लगी इन दोनों दादियों के सामने एक-दो नहीं बल्कि हजारों चुनौतियां हैं. इनमें से सबसे बड़ी है शूटिंग की ट्रेनिंग लेना और उससे भी बड़ी है टूर्नामेंट में जाकर खेलना. जो औरतें कभी अपने घर से बिना किसी मर्द के बाहर ना निकली हों... ऐसे में दोनों ने कैसे अपने सपनों को पूरा किया और देश की बाकी महिलाओं के लिए कैसे प्रेरणा की श्रोत बनीं यह जानने के लिए आपको खुद सिनेमाघर जाकर पूरी फिल्म देखनी होगी.

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