Charlie Chaplin का वह भाषण, जिससे हिटलर जैसे तानाशाह भी थर्रा गए थे

चार्ली चैपलिन (Charlie Chaplin) के व्यंग्य ने तानाशाहों को परेशान कर दिया था.

Charlie Chaplin का वह भाषण, जिससे हिटलर जैसे तानाशाह भी थर्रा गए थे
फोटो साभार: ट्विटर

नई दिल्ली: चार्ली चैपलिन (Charlie Chaplin) की पहली टॉकिंग मूवी 1940 में आई 'द ग्रेट डिक्टेटर' थी. पहले पूरी दुनिया उन्हें देख रही थी और अब सुन भी पा रही थी. चैपलिन के व्यंग्य ने तानाशाहों को परेशान कर दिया था. तब हिटलर जैसे तानाशाहों के खिलाफ बोलने से लोग डरते थे. 'द ग्रेट डिक्टेटर', हिटलर को संबोधित करने वाली पहली हॉलीवुड फिल्म थी.

इस फिल्म का अंतिम भाषण लोकतंत्र का एक शानदार नमुना है. उनकी यह फिल्म खूब चर्चित हुई. हिटलर, इटली के तानाशाह मुसोलिनी और स्पेन के सैन्य नेता जनरल फ्रेंको सहित सभी ने फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसलिए यह फिल्म निश्चित रूप से अपनी छाप छोड़ गई.
 
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस फिल्म के अंतिम भाषण का एक अंश, जिसे सुनकर हिटलर जैसे तानाशाह घबरा गए थे-  
'मुझे खेद है, पर मैं सम्राट नहीं बनना चाहता. यह मेरा काम नहीं है. मैं किसी पर शासन या विजय नहीं करना चाहता. अगर मुमकिन है, तो मुझे हर किसी की मदद करना चाहिए, फिर वह चाहे यहूदी हो या कोई काला या गोरा आदमी. हम सभी एक-दूसरे की मदद करना चाहते हैं. हम इंसान ऐसे ही हैं. हम एक-दूसरे के सुख के लिए जीना चाहते हैं, दुख का कारण नहीं बनना चाहते. हम एक-दूसरे से घृणा नहीं करना चाहते हैं. इस दुनिया में हर किसी के लिए जगह है. पृथ्वी समृद्ध है और सभी का पोषण कर सकती है. जीवन का मार्ग स्वतंत्र और सुंदर हो सकता है, लेकिन हमने रास्ता खो दिया है.'

'लालच ने मनुष्य की आत्मा को जहर से भर दिया है, दुनिया को घृणा, हिंसा, और दुख में धकेल दिया है. हम दौड़ना सीख गए, पर अपने अंदर खुद को बंद कर लिया है. मशीनरी जिसने हमें संपन्न बनाया है, उसने हमारी इच्छाओं को बढ़ाया है. हमारे ज्ञान ने हमें निंदक बना दिया है. हमारी चतुराई, कठोर और निर्दयी है. हम सोचते बहुत अधिक हैं और महसूस बहुत कम करते हैं. मशीनरी के बजाए हमें मानवता की जरूरत है. चतुराई से अधिक हमें करुणा और विनम्रता की जरूरत है. इन गुणों के बिना, जीवन हिंसक होगा और सब खो जाएगा...' 

चार्ली चैपलिन का यही अंदाज था, जो तब की सरकारों को अखरता रहा. 

अमेरिकी प्रशासन ने आज ही के दिन चैपलिन को उन्हें अपने घर जाने से रोका था
आज के ही दिन अमेरिकी प्रशासन ने महान हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन को उन्हें अपने घर जाने से रोका था. अमेरिकी सरकार उन्हें अपना विरोधी मानती थी. तब चार्ली को मजबूरन अमेरिका छोड़कर स्विटजरलैंड जाकर बसना पड़ा था. बहरहाल, 20 साल बाद वह अमेरिका वापस लौटे. तब उन्हें फिल्म 'लाइमलाइट' के लिए ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया था. तब उनके सम्मान में 12 मिनट तक समारोह में तालियों की गूंज होती रही, जो ऑस्कर अवॉर्ड के इतिहास में एक रिकॉर्ड है.  

16 अप्रैल 1889 को लंदन में हुआ था चैपलिन का जन्म
चार्ली चैपलिन का जन्म 16 अप्रैल 1889 को लंदन के एक गरीब परिवार में हुआ था. वह शुरुआत में गुजर-बसर के लिए शो करते थे. पिता घर छोड़कर चले गए थे और चार्ली की मां एक गायिका जरूर थीं, पर वह भी मानसिक स्वास्थ्य जूझ रही थीं. चैपलिन 1914 से 1936 के बीच अपनी फिल्मों में द लिटिल ट्रैम्प के रूप में दिखाई दिए. यह चरित्र मौन सिनेमा युग का सबसे प्रसिद्ध किरदार बन गया. यहां चैपलिन की गजब की प्रतिभा थी कि उन्होंने तेजी से अपनी फिल्मों पर नियंत्रण कर लिया और आखिरकार अपना एक स्टूडियो शुरू किया.

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