'ठुमरी की रानी' Girija Devi: मां और दादी की आलोचना झेलने के बाद हासिल किया था ऐसा मुकाम

गिरिजा देवी को साल 1972 में पद्मश्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. 

'ठुमरी की रानी' Girija Devi: मां और दादी की आलोचना झेलने के बाद हासिल किया था ऐसा मुकाम
24 अक्टूबर साल 2017 को गिरिजा देवी ने अंतिम सांस ली थीं.

नई दिल्ली: प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी (Girija Devi) यानी 'ठुमरी की रानी' का जन्म आज के दिन साल 1929 को वाराणसी में हुआ था. काशी उनके दिल में बसती थी. 'ठुमरी क्वीन' के नाम से प्रसिद्ध गिरिजा देवी को शास्त्रीय संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए 1972 में पद्मश्री, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा संगीत नाटक एकेडमी अवॉर्ड, महा संगीत सम्मान अवॉर्ड समेत कई ढेरों पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका था, लेकिन इस मुकाम को हासिल करना गिरिजा देवी के लिए आसान नहीं था.

5 साल की उम्र में सारंगी वादक सरजू प्रसाद मिश्रा से ख्याल और टप्पा गाना सीखा था. उन्होंने 9 साल की उम्र में फिल्म 'याद रहे' में काम किया और 1949 में ऑल इंडिया रेडियो से संगीत की दुनिया में पब्लिक डेब्यू किया, लेकिन इन सबके लिए उन्हें अपने परिवार की आलोचना का भी सामना करना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उनकी मां और दादी का मानना था कि अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाले लोगों के सामने परफॉर्म नहीं करते. घर में विरोध का सामना कर रही गिरिजा ने फैसला लिया कि वह दूसरों के लिए परफॉर्म नहीं करेंगी. लेकिन उन्होंने साल 1951 में बिहार में पहला पब्लिक कॉन्सर्ट किया. उनकी एक कजरी "बरसन लगी" खासी मशहूर रही. ध्रुपद, ख़्याल, टप्पा, तराना, सदरा, ठुमरी और पारम्परिक लोक संगीत में होरी, चैती, कजरी, झूला, दादरा और भजन से वे लोगों को अपनी गायकी का मुरीद बनाती रहीं. भारतीय शास्त्रीय संगीत में वे एकमात्र ऐसी गायिका हैं, जिन्होंने पूरब अंग की गायकी का जादू पूरी दुनिया में बिखेरा. 

एक इंटरव्यू में गिरिजा देवी ने अपने बारे में बताया था, "पिता मुगलसराय (उत्तरप्रदेश) के पुश्तैनी गांव को छोड़कर चक सोहदवार होते हुए बनारस आए. वहां मेरा (गिरिजा का) जन्म हुआ. पिता जी को संगीत में बहुत दिलचस्पी थी. वे ज़मीदारों के यहां गाने-बजाने जाते थे. मेरे कान में भी यह सुर-संगीत पड़ता था. एक दिन मेरे कंठ में भी समा गया. पिता को सहज ही खुशी हुई. मेरी संभावना को उन्होंने पहचान लिया. उस समय के संगीत मनीषी पंडित सरयू प्रसाद को मेरी तालीम के लिए निवेदन किया. इस बीच पिताजी को बनारस छोड़ना पड़ा लेकिन मुझे वहीं बसा दिया. गुरु-दीक्षा के साथ बनारस के मंदिरों में होने वाले बड़े कलाकारों के गायन-वादन को सुनकर मेरा मन संगीत के नए सबक अर्जित करने लगा. विश्वनाथ मंदिर और संकट मोचन मंदिर मेरे लिए संगीत के तीर्थ साबित हुए. वहीं मैंने एक दिन सिद्धेश्वरी देवी को गाते हुए सुना. मेरा मन दूसरी किताबें पढ़ने में नहीं लगता था. रात-दिन संगीत में ही रमी रहती. जैसे-तैसे मैंने दसवीं का दर्ज़ा पास किया.'  

उन्होंने यह भी बताया था, "साल 1949 में मैं बीस बरस की हो गई. इलाहाबाद में रेडियो स्टेशन खुल चुका था. वहां पंडित रविशंकर थे. मुझे पहली बार प्रस्तुति का मौका मिला. मेरी प्रस्तुति से वे बहुत प्रभावित हुए. उनकी तारीफ से मेरा हौसला बढ़ा. दो वर्ष बाद आरा (बिहार) में एक बहुत बड़ा संगीत समारोह हुआ. आला दर्ज़े के नर्तक संगीतकार आमंत्रित थे. एक सभा में जब अचानक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर नहीं आए तो उनकी जगह मुझे गायन के लिए बैठा दिया. पहले तो मैं घबरा गई, लेकिन जब मैंने ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ गाया तो सुनकर मुझे कलाकारों-श्रोताओं ने सिर माथे बैठा लिया. कहने लगे कि यह बंदिश तो गिरिजा के कंठ से सिद्ध हो गई. मेरी प्रसिद्धि को अचानक पंख लग गए." बता दें, 24 अक्टूबर साल 2017 को गिरिजा देवी ने अंतिम सांस लीं. गायिका गिरिजा देवी का कोलकाता के बिड़ला अस्पताल में दम तोड़ा था.

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