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एग्जिट पोल सच मानें तो भविष्यवाणी ही PK को ले डूबी! बिहार में चूकने के 5 बड़े कारण

Prashant Kishor Bihar Chunav: एग्जिट पोल्स एनडीए को जिता रहे हैं और महागठबंधन को निराश कर रहे हैं लेकिन प्रचार के समय काफी चर्चा में रहे प्रशांत किशोर की पार्टी का क्या हुआ? जिसे एक्स फैक्टर माना जा रहा था क्या वो दहाई में भी नहीं पहुंचेगी, यह बड़ा सवाल है. 

एग्जिट पोल सच मानें तो भविष्यवाणी ही PK को ले डूबी! बिहार में चूकने के 5 बड़े कारण

या तो अर्श पर, नहीं तो फर्श पर. या तो हम 150 सीटें जीतेंगे या फिर 10 से भी कम... बिहार विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल कम से कम प्रशांत किशोर की इस भविष्यवाणी को सच साबित करते दिख रहे हैं. उनकी जन सुराज पार्टी के चुनावी समर में उतरने के बाद पूछा जा रहा था कि जिस राज्य में भले ही सत्ता बदल जाए पर जाति का एंगल कभी नहीं बदलता, उस बिहार में क्या PK का टेस्ट सफल होगा? एक दर्जन से ज्यादा चुनाव एजेंसियों के एग्जिट पोल्स में भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी और एनडीए गठबंधन को 150 से ज्यादा सीटें जीतते दिखाया गया है. महागठबंधन 80 से 83 सीटों पर सिमट सकता है. और तमाम चुनावों की रणनीति बना चुके प्रशांत किशोर को ज्यादा से ज्यादा 5 सीटें मिल सकती हैं. खास बात यह है कि कुछ पोल्स में पीके की पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलने की बात कही गई है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि PK के जिस एक्स फैक्टर को बिहार चुनाव में अहम बताया जा रहा था, वह फेल क्यों हो गया?

बिहार के चुनाव में जातिगत निष्ठा ही एकमात्र चीज होती है जो मायने रखती है. इस राजनीतिक रंगमंच में पीके महज एक राजनीतिक खिलाड़ी नहीं हैं. वह अपने साथ एक बड़ा सवाल लेकर चल रहे हैं. हां, चुनाव नतीजों से इस बात का टेस्ट होगा कि क्या चुनाव प्रबंधन (पीआर, स्ट्रैटिजिटी डेटा) राजनीति (सामाजिक गठबंधन, राजनीतिक गठबंधन आदि) का विकल्प बन सकता है. एक रणनीतिकार के रूप में उनके पिछले 'अवतार' में PK को स्पष्ट वैचारिक छवि की आवश्यकता नहीं थी. हालांकि नेता के रोल में, वह इसे इग्नोर नहीं कर सकते हैं. परदे के पीछे रहने वाले पीके अब सिर्फ प्लानर नहीं हैं, अब वह ऐसा 'प्रोडक्ट' चाहते हैं जिसकी शेल्फ लाइफ (समय) ज्यादा हो. 

125 नहीं केवल 1, 2 या 5

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पीके ने यहां तक कहा था कि अगर उन्हें 125 सीटें भी आती हैं तो वह इसे हार समझेंगे. लेकिन एग्जिट पोल्स में तो 1 या 2 या 5 जैसा सीन बना है. वह लगातार कह रहे थे कि जनता बदलाव चाहती है लेकिन एग्जिट पोल्स बता रहे हैं कि जनता ने भाजपा पर ही भरोसा जताया है. पीके दो ध्रुवीय दिख रहे चुनाव में तीसरा विकल्प बनकर आए थे. मतदान से पहले माना जा रहा था कि वह अपर कास्ट का वोट काटकर भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं. हालांकि एग्जिट पोल ही नतीजों में तब्दील हुए तो प्रशांत किशोर को बड़ा झटका लगने वाला है. ऐसे में एक्सपर्ट के नजरिए से देखें तो समझ में आता है कि तीसरा विकल्प बनने के चक्कर में पीके कहां चूक गए. 

1. जातीय वफादारी

अगर एग्जिट पोल को ही नतीजा मानते हैं तो बिहार में एक बार फिर जाति के हिसाब से ही वोटिंग हुई है. दोनों प्रमुख गठबंधन के पास अपना भरोसेमंद वोटर बेस है जिसने पहले भी वोट किया था और इस बार भी. इनके पास पन्ना प्रमुख और बूथ लेवल तक का मैनेजमेंट था लेकिन नई पार्टी होने के कारण जन सुराज ऐसा कुछ नहीं कर पाई. 

2. संगठनात्मक मजबूती

पीके भले ही दूसरे नेताओं या पार्टियों के लिए रणनीति बनाते रहे हैं लेकिन संगठन ना होने के कारण विधानसभा चुनाव में उनका दांव हल्का पड़ गया. उनके चुनाव प्रचार में भीड़ तो आई, मीडिया में चर्चा भी हुई लेकिन पार्टी में काडर नहीं खड़ा हो पाया. 

3. 'आउटसाइडर' या 'मैनेजर' वाला नरैटिव

हां, दूसरी पार्टियां उन्हें आउटसाइडर या मैनेजर कहकर सुनाती रहीं. उन्हें प्रामाणिक या पुराने राजनीति से जुड़े नेता वाली छवि नहीं मिल पाई. उनका खुद अपर-कास्ट से होना बिहार की राजनीति को पचा नहीं. 

पढ़ें: Bihar Chunav 2025: सभी 10 Exit Poll में NDA की वापसी के संकेत, महागठबंधन का बुरा हाल!

4. खुद चुनाव नहीं लड़ना

इस बात को भाजपा और आरजेडी दोनों खेमों ने उछालकर तीसरे फैक्टर को कमजोर बताया. जनता को भी यही लगा कि जब उन्हें खुद अपनी सीट जीतने का भरोसा नहीं है तो पार्टी को मौका क्यों दिया जाए? जो भी 2-4 सीट मिलती दिख रही है उसमें कैंडिडेट का रोल, उसकी जाति और पीके का सीधा असर हो सकता है. 

5. 2030 में...

कुछ ऐसा प्रचार ज्यादा हो गया कि शिक्षा और पलायन जैसे गंभीर मुद्दे पर उनका फोकस है और तमाम कारणों से युवा उन्हें इस बार नहीं, अगले 2030 के विधानसभा चुनाव का बड़ा प्लेयर मानने लगे. इस बार शायद इसीलिए वोट ही नहीं दिया. 

हालांकि अभी प्रशांत किशोर के समर्थकों को निराश होने की जरूरत नहीं है. आधिकारिक नतीजे आने बाकी हैं. पीके की टीम तो यही प्रार्थना कर रही होगी कि उनका विश्लेषण सही साबित हो, एग्जिट पोल नहीं. 

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Anurag Mishra

अनुराग मिश्र ज़ी न्यूज डिजिटल में एसोसिएट न्यूज एडिटर हैं. वह दिसंबर 2023 में ज़ी न्यूज से जुड़े. देश और दुनिया की राजनीतिक खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. 18 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर ...और पढ़ें

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