ME Equation in Bihar: बिहार चुनाव में बड़े-बड़े रिकॉर्ड और समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. (मुस्लिम-यादव) समीकरण के जरिए लालू यादव की आरजेडी ने तीन दशक तक बिहार की राजनीति की दशा और दिशा तय करने के साथ-साथ सियासी ताकत भी हासिल की. लेकिन 2025 में यह समीकरण धरा का धरा रह गया.
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Bihar Election 2025 Result: बिहार चुनाव के नतीजे शुक्रवार को आ चुके हैं और प्रचंड जीत के साथ एक बार फिर जनता ने कमान सौंपी है एनडीए को, जो 201 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. लालू यादव की आरजेडी की अगुआई वाली महागठबंधन महज 36 सीटों पर आगे है. इससे बुरी हार शायद ही किसी ने महागठबंधन के लिए सोची हो. इस चुनाव में बड़े-बड़े रिकॉर्ड और समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. (मुस्लिम-यादव) समीकरण के जरिए लालू यादव की आरजेडी ने तीन दशक तक बिहार की राजनीति की दशा और दिशा तय करने के साथ-साथ सियासी ताकत भी हासिल की. लेकिन 2025 में यह समीकरण धरा का धरा रह गया.
MY ध्वस्त, अब ME का जलवा
अब एक नया समीकरण पैदा हुआ है, जिसका नाम है ME यानी महिला और ईबीसी. यही वो अस्त्र है, जिसकी मदद से एनडीए ने बिहार चुनाव में शानदार जीत हासिल की. एक नया सियासी गणित है, जो सामाजिक कल्याण, लिंग और आकांक्षाओं पर आधारित है. इसी रणनीति ने एनडीए का बिहार जैसे राज्य में गेम बदल दिया, जहां चुनावों को जाति के चश्मे से देखा जाता है.
बीजेपी का इलेक्शन कैंपेन तीन फैक्टर्स पर आधारित था- महिलाओं का वोट और नीतीश की अपील, उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान के वापस लौटने से जाति समीकरण बदलना और यूथ, जिसे लगातार एनडीए ने लालू यादव काल के दौरान कट्टा, दुनाली और रंगदारी के बारे में बार-बार याद दिलाया.
दूसरी ओर महागठबंधन मुस्लिम और यादव के जातिगत समीकरण से बाहर ही नहीं निकला. उसका वोट चोरी कैंपेन वोटर्स की नब्ज पकड़ने में नाकामयाब रहा. इतना ही नहीं, विश्लेषण से पता चलता है कि एमवाई मतदाताओं के वोट का एक बड़ा हिस्सा भी एनडीए को गया है.
63 साल का रिकॉर्ड टूटा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पिछले 63 सालों का रिकॉर्ड ब्रेक हुआ और प्रदेश में 67 प्रतिशत मतदाता सरकार चुनने के लिए मतदान केंद्र तक पहुंचे. इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा जनमत कहना गलत नहीं होगा. हैरानी की बात यह है कि इसमें से महिलाओं के मतदान का प्रतिशत 71 रहा है जो अपने आप में नया रिकॉर्ड है. जबकि पुरुषों का मतदान प्रतिशत इससे लगभग 10 प्रतिशत कम रहा.
इस चुनाव में एनडीए ने जाति समीकरण के छाते का दायरा और बड़ा किया है. जहां बीजेपी का ऊंची जाति के वोटर्स के बीच दबदबा है तो दूसरी ओर नीतीश कुमार की जेडीयू को ईबीसी का भरपूर वोट मिला. इस चुनाव में यही एक्स फैक्टर साबित हुआ. वहीं उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा, चिराग पासवान की एलजेपी और जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के वोट बैंक भी एनडीए के लिए तुरुप का इक्का बना.
ईसीबी ने पलटा गेम?
साल 2020 के बाद एनडीए की सीटें बढ़ने के पीछे ईबीसी का एक बड़ा हाथ है. उस चुनाव में तो एनडीए को कुछ ही मार्जिन से जीत हासिल हुई थी. कास्ट सर्वे डेटा के मुताबिक बिहार की जनसंख्या में ईबीसी आबादी 36 प्रतिशत है.
वहीं कुर्मी समाज (आबादी में 3 प्रतिशत) से आने वाले नीतीश कुमार और एनडीए ने कल्याणकारी योजनाओं के जरिए ईबीसी को अपने पाले में कर लिया. यह जेडी(यू) के लिए एक हैरान कर देने वाला बदलाव है, क्योंकि 2020 के चुनावों में तीन दर्जन से ज्यादा सीटें गंवा दी थीं, जहां ईबीसी और एससी की अच्छी-खासी आबादी थी. जेडीयू ने जिन 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से सिर्फ 43 पर ही जीत हासिल की थी. इस बार, उसकी सीटें 70 से ज्यादा हैं.
महिला वोटर्स ने किया कमाल
इस चुनाव के ऐलान से ठीक पहले सितंबर में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की शुरुआत हुई और बिहार भर की महिलाओं को 10,000 रुपये की राशि उनके अकाउंट में भेजी गई थी. इसके साथ ही बिहार देश का पहला प्रदेश है जहां पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को पहली बार आरक्षण मिल पाया और उनकी बेहतर भागीदारी सुनिश्चित हुई. इसके साथ ही बिहार में 2016 के बाद से जारी शराबबंदी ने प्रदेश की महिला मतदाताओं के दिल में नीतीश सरकार को लेकर एक अलग जगह बना दी. बिहार में महिलाएं जीवनयापन के लिए थोड़ा कष्ट सहने को तैयार हैं लेकिन शराब की वजह से घर की कलह और टूटते परिवार को देख पाना उनके लिए नामुमकिन है. ऐसे में नीतीश सरकार पर महिलाओं का भरोसा चुनाव दर चुनाव बढ़ता गया.
कल्याणकारी योजनाओं का दम
बिहार में महिलाओं के लिए नीतीश सरकार की सोच एक बार देखिए छात्रवृत्ति, आरक्षण, छात्राओं के लिए साइकिल और पोशाक योजना, स्वयं सहायता समूहों के जरिए रोजगार, उद्योग के लिए सहायता राशि और हाल ही में महिलाओं को सीधे बैंक खाते में 10 हजार रुपए की आर्थिक सहायता राशि. बिहार में सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसदी और पंचायती राज में 50 आरक्षण का प्रावधान, जिसकी वजह से प्रदेश में पुरुषों की तुलना में महिलाएं पहले से अधिक आत्मनिर्भर और जागरूक हुई हैं. इस बार तो मतदान के दौरान बिहार में महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले राजनीतिक चेतना ज्यादा बेहतर नजर आई. इस बार महिलाओं ने किसी के कहने पर नहीं बल्कि अपने निर्णय से वोट किया.
एक और बात पर गौर कीजिए बिहार देश का पहला राज्य है जहां 31 लाख से अधिक जीविका दीदियां हैं जो लखपति हैं. इन जीविका दीदियों को लखपति बनाने की योजना नीतीश सरकार में 2023 में शुरू हुई थी. जब 2020 में उनकी कमाई इससे कहीं कम थी तब भी उन्होंने नीतीश कुमार का समर्थन किया. अब जब 31 लाख से अधिक लखपति दीदियां हो गई हैं तो जाहिर उन्होंने 2025 में अधिक मजबूती से नीतीश कुमार का समर्थन किया होगा.
इस आंकड़े ने सबको किया हैरान
ऐसा में यह साफ हो गया कि महिला वोटरों के उत्साह ने सत्ता विरोधी लहर को काट कर नतीजों की दिशा नीतीश कुमार की तरफ मोड़ दी. इस चुनाव में बिहार से एक ऐसा आंकड़ा सामने आया जो हैरान करने वाला था. दरअसल, बिहार में एसआईआर के बाद पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदाताओं का पंजीकृत आधार छोटा दिखा लेकिन इसके बावजूद कुल मतदान में महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों से कहीं ज्यादा होगा चौंकाने के लिए काफी था.
वैसे राजनीति के जानकार और राजनीतिक विश्लेषक के साथ चुनाव को करीब से समझने और देखने वाले लोग हमेशा से मानते हैं कि जब इतने बड़े स्तर पर जब वोटिंग होती है, तो हमेशा व्यवस्था के खिलाफ होती है. पांच या दस प्रतिशत के बीच वोटर चुनाव में मतदान करने के लिए ज्यादा आगे आते हैं तो कहा जाता है कि हो सकता है कि सत्ता पक्ष के साथ हों. लेकिन, जब भी 10 प्रतिशत और उसके ऊपर वोटर बूथ तक पहुंचते हैं। उसके बाद कयास लगाया जाता है कि वहां जनता जरूर बदलाव के मूड में है.
महिलाओं की बढ़ी भागीदारी
ऐसे में एक बात बिहार चुनाव परिणाम से तो साफ पता चल रहा है कि बिहार चुनाव में लगभग 10 प्रतिशत का अंतर महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित कर रहा है, जो संभवतः महिला-केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं और नकद ट्रांसफर के वादों से प्रभावित है. इसके साथ ही दीपावली और आस्था के महापर्व छठ के दौरान 12,000 से अधिक विशेष रेलगाड़ियां का परिचालन भी एक कारण हो सकता है कि क्योंकि बिहार तक बाहर रह रहे प्रदेश के मतदाताओं का पहुंचना सुलभ हो पाया.
हालांकि नीतीश सरकार के प्रति महिलाओं का यह भरोसा चुनाव दर चुनाव बढ़ता जा रहा है. 2010 से लगातार चार बिहार विधानसभा चुनावों में महिलाएं पुरुषों से अधिक मतदान कर रही हैं. पहले जहां महिलाएं 50 प्रतिशत तक ही वोट डालती थीं, वहीं अब 70 प्रतिशत से ऊपर का आंकड़ा पार कर चुकी हैं. इसे आप सिर्फ बिहार का सामाजिक परिवर्तन नहीं मानें, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी बड़ी उपलब्धि है.
ऐसे में बिहार की राजनीति की समझ रखने वाले लोगों की मानें तो इस विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने सिर्फ मतदान का आंकड़ा नहीं बढ़ाया, बल्कि चुनाव के नतीजों की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यह बदलाव बिहार की राजनीति में निर्णायक साबित हुई, क्योंकि महिला मतदाताओं ने हर दल के चुनावी समीकरण को प्रभावित किया.