बांग्लादेश की नई BNP सरकार में सिलहट डिवीजन को बड़ा झटका लगा है. यहां BNP ने 19 में से 18 सीटें जीतीं, लेकिन कैबिनेट में सिर्फ दो मंत्री बनाए गए हैं. वहीं ढाका-चटगांव में 80 सीटों पर 22 मंत्री बनाए गए हैं, जिसके पीछे बहुत सारी वजहें बताई जा रही है, तो आइए जानते हैं कि बांग्लादेश में बीएनपी की जीत और मंत्री पद का मेल क्यों नहीं बैठा! क्या है तारिक रहमान का दिमाग?
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बांग्लादेश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो चुकी है. 17 फरवरी 2026 को नई सरकार के गठन के साथ ही सत्ता की कमान तारिक रहमान के हाथों में आ गई. लेकिन सरकार बनने के बाद जिस मुद्दे ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी, वह है मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय संतुलन (Regional Balance). सबसे बड़ा सवाल यही है कि जहां सिलहट डिवीजन ने चुनाव में BNP को लगभग क्लीन स्वीप जीत दिलाई, वहीं कैबिनेट में इस क्षेत्र को बेहद सीमित प्रतिनिधित्व क्यों मिला? दूसरी तरफ ढाका और चटगांव डिवीजन से सबसे ज्यादा मंत्री बनाए गए. क्या यह सिर्फ संयोग है या सोची-समझी राजनीतिक चाल? आइए पूरी कहानी आसान भाषा में समझते हैं.
चुनाव 2026: सिलहट बना BNP का सबसे मजबूत किला
12 फरवरी 2026 को हुए 13वें संसदीय चुनाव में BNP ने 212 से ज्यादा सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया. सिलहट डिवीजन में पार्टी का प्रदर्शन सबसे शानदार रहा. यहां कुल 19 सीटों में से BNP गठबंधन ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि एक सीट सहयोगी दल खलाफत मजलिस के खाते में गई. जमात-ए-इस्लामी समेत अन्य दल यहां लगभग साफ हो गए. सिलहट लंबे समय से BNP का मजबूत गढ़ माना जाता है. विदेशों में बसे सिलहटी प्रवासियों (डायस्पोरा) का प्रभाव, कंजर्वेटिव वोट बैंक और पार्टी की पुरानी जड़ें यहां जीत की बड़ी वजह मानी जा रही हैं.
ढाका-चटगांव: कठिन मुकाबला, लेकिन बड़ी राजनीतिक अहमियत
ढाका और चटगांव डिवीजनों में तस्वीर अलग रही. इन दोनों क्षेत्रों में कुल मिलाकर करीब 129 सीटों पर मुकाबला हुआ, जिसमें BNP को लगभग 80 सीटों पर जीत मिली. यहां शहरी राजनीति, गठबंधन समीकरण और विपक्ष की मजबूत मौजूदगी के कारण मुकाबला ज्यादा कठिन था. यानी सिलहट जैसी एकतरफा जीत यहां कहीं नहीं दिखी, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक महत्व के कारण इन क्षेत्रों की भूमिका ज्यादा बड़ी मानी जाती है.
कैबिनेट का गणित: सिलहट को सिर्फ दो मंत्री
17 फरवरी को करीब 50 सदस्यों वाले मंत्रिमंडल ने शपथ ली, जिसमें फुल मंत्री और राज्य मंत्री दोनों शामिल हैं. लेकिन सिलहट से सिर्फ दो नेताओं खंदाकर अब्दुल मुक्तदिर और अरिफुल हक चौधरी को ही कैबिनेट में जगह मिली. कोई राज्य मंत्री नहीं बनाया गया. इसके उलट ढाका और चटगांव मिलाकर 22 मंत्री बनाए गए. यहीं से राजनीतिक बहस शुरू हो गई.
आखिर क्यों हुआ ऐसा? समझिए अंदर की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे कई वजहें हैं:
1. सत्ता का आर्थिक केंद्र
ढाका देश की राजधानी और प्रशासनिक केंद्र है, जबकि चटगांव सबसे बड़ा बंदरगाह और व्यापारिक हब. आर्थिक फैसलों के लिए इन क्षेत्रों से ज्यादा प्रतिनिधित्व देना सरकार की प्राथमिकता माना जा रहा है.
2. ‘सेफ सीट’ बनाम ‘स्विंग एरिया’
सिलहट BNP का सुरक्षित इलाका माना जाता है, जहां पार्टी का वोट बैंक स्थिर है. लेकिन ढाका जैसे क्षेत्रों में राजनीतिक संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है, इसलिए वहां ज्यादा मंत्री बनाए गए.
3. अनुभवी नेताओं को प्राथमिकता
कैबिनेट में कई पुराने और अनुभवी नेताओं को शामिल किया गया, जिनका राजनीतिक आधार ढाका और चटगांव में ज्यादा है.
4. क्षेत्रीय वर्चस्व से बचाव
विश्लेषकों का मानना है कि सरकार नहीं चाहती थी कि कैबिनेट किसी एक क्षेत्र की सरकार लगे. इसलिए संतुलन बनाने की कोशिश की गई.
सिलहट में नाराजगी, लेकिन उम्मीद बाकी
स्थानीय स्तर पर कुछ BNP नेताओं और समर्थकों में नाराजगी देखी जा रही है. उनका तर्क है कि देश की रेमिटेंस अर्थव्यवस्था में सिलहट की बड़ी भूमिका है, फिर भी प्रतिनिधित्व कम मिला. हालांकि पार्टी नेतृत्व का कहना है कि फैसला “योग्यता और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं” के आधार पर लिया गया है, न कि सिर्फ क्षेत्रीय दबाव पर.
क्या आगे बदल सकता है समीकरण?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कैबिनेट गठन का पहला चरण है. आने वाले महीनों में विस्तार या फेरबदल की संभावना है, जिसमें सिलहट से और नेताओं को मौका मिल सकता है. कुल मिलाकर यह फैसला दिखाता है कि बांग्लादेश की राजनीति अब भी काफी हद तक ढाका-केंद्रित है और तारिक रहमान की नई सरकार संतुलन और रणनीति के बीच रास्ता तलाश रही है.