आसान भाषा में समझें अत्यधिक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल क्यों है जीवन के लिए खतरा

2050 तक  सलाना तकरीबन 1 करोड़ लोगों के मौत का कारण भी अत्यधिक एंटीबायोटिक का सेवन हो सकता है.

आसान भाषा में समझें अत्यधिक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल क्यों है जीवन के लिए खतरा
विश्वस्तर पर तकरीबन तकरीबन साल 2030 तक इस कारण 24 करोड़ लोग प्रभाव में आ सकते हैं.

मुंबई: शरीर के अंदर जाने और अनजाने तरीके से जाने वाले एंटीबायोटिक के कारण आने वाले 10 साल में अत्यधिक इंटिबीयोटिक के सेवन से मत्यु होने का खतरा मंडराने लगा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेताया है कि शरीर में बैक्टेरिया रोधक क्षमता बेहद कम होते जा रही है. आने वाले दिनों में इसके भयंकर परिणाम भी दिख रहे हैं. इस बात की भी चेतावनी दी गई है कि साल 2050 तक  सलाना तकरीबन 1 करोड़ लोगों के मौत का कारण भी अत्यधिक एंटीबायोटिक का सेवन हो सकता है. विश्वस्तर पर तकरीबन तकरीबन साल 2030 तक इस कारण 24 करोड़ लोग प्रभाव में आ सकते हैं. खान-पान सहित लोगों के एंटीबायोटिक के बारे में नीम हकीम जानकारी, इस बाबत खतरनाक साबित हो रही है.

इसकी वजहें: 
जांच में इस बात का जिक्र किया गया है कि पोल्ट्री और डेयरी कारोबार में जानवरों को तंदुरुस्त रखने के लिए किए गए एंटीबायोटिक का असर मानव शरीर पर धीरे-धीरे प्रतिकूल असर डाल रहा है. इस अत्यधिक एंटिबायोटिक शरीर में जाने की कई वजहें सामने आ रही हैं. चिकन और मटन को सेहत मंद रखने के लिए दिए जाने वाले अत्यधिक एंटीबायोटिक सब्जी और फल को ज्यादा ताजी रखने के लिए रखने के लिए दिए जाने वाले एंटीबायोटिक डेयरी व्यवसाय में जानवरों के अच्छी सेहत के लिए इसके अलावा बगैर डॉक्टरी सलाह के ही मेडिकल स्टोर के जरिए दिए जाने वाली दवाईयां खासकर के एंटीबायोटिक भी शरीर में नुकसान पहुंचाती है. इसके अलावा अत्यधिक और गलत तरीके के एन्टीबायोटिक लेने से एन्टीबायोचिक के जीवाणु ज्यादा प्रतिरोधी हो जाते हैं. नए प्रतिरोधी जीवाणु सुपरबग के रूप में जाने जाते हैं जिस पर कोई भी दवा असर करती है और ये हालात किसी भी रोग और रोगी के लिए भयवह स्थिति में हैं. 

लाभ का लालच: 
आमतौर पर इस बात का ध्यान कोई भी कारोबारी नहीं देता कि जिस एंटीबायोटिक या हार्मोनल दवाएं अपनी फसल या व्यापार को बढाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है. उसका इसके उपयोग करने वालों पर किस तरह का असर होगा. चिकन को तगड़ा और मांस बढ़ाने के लिए जहां 40 से 45 दिन का समय लगता है, वहीं इसे तेजी से बढ़ाने के लिए प्रोटिन और दुसरी खुराक के साथ ही एन्टीबायोटिक की खुराक दी जाती है जो मानव शरीर में भी पहुंचता है. उसी तरह से फल और सब्जियों के भी हालात और डेयरी प्रोडक्ट के भी हालात हैं.     
 
हालांकि, पिछले 35 साल इस कारोबार में रहे फैजल का कहना है कि फ्रेश चिकन में कोई भी दिक्कत नहीं होती है. चिकन में बीमारी जल्दी फैलती है, इसलिए इन्हें स्वस्थ रखने के उपाए किए जाते हैं. समय समय पर इनका डॉक्टरी सहायता भी ली जाती है. जिससे ये स्वस्थ रहें.  

बाजार से चिकन और मटन के खरीददार इस बात से जरुर बाखबर हैं कि प्रोसेस मीट और चिकन में जरूर ताजे रखने के लिए केमिकल का इस्तेमाल होता है. लेकिन फ्रेस या आंखों के सामने लिए जाने वाले ताजे चिकन या मीट में इस तरह की बात नहीं हो सकती. मुबई में रहने वाले अंगद जी के मुताबिक चिकन और मटन में किसी तरह के एन्टीबायोटिक का इस्तेमाल हुआ है कि नहीं यो तो पता नहीं चल सकता , लेकिन प्रोसेस मीट के बारे में जरूर अंदेशा है. इसी लिए फ्रेस चिकन पर ही भरोसा करते हैं. लेकिन जिस तरह का बातें सामने आ रही हैं उससे डर जरूर लगता है.‘’

डॉक्टरों के राय:
जहां बात आती है मीट प्रोजक्ट की तो ये सीधे जुडा रहता है व्यवसाय से. क्योंकि मीट प्रोडक्ट को बाजार में बेचने के लिए इसे जल्द से जल्द ग्रोथ कराने के साथ ही इसका मूल्य भी पूरी तरह से वसूलने के लिए कारोबारी चाहते हैं. पिछले 25 साल से पशुओं के व्यवहार -आचार और उन पर किए जा रहे किए जा रहे. चिकित्सीय जांच करने वाले रिटायर्ड डॉ. लेफ्टिनेन्ट कर्नल जेसी खन्ना का मानना है कि जिस तरह के इन्टीबायोटिक लगातार अब जानवरों को दिए जा रहे हैं, वो मानव को किसी गंभीर बीमारी के अंतिम चरण में दिए जाते हैं. यानी जनरेशन पांच तक की दवाएं उन पर दी जाती हैं. अगर इसने ज्यादा पावर की दवाएं उन पर दी जा रही हैं और वो मानव आहार के रूप में मानव शरीर में आती हैं तो इसका असर आना स्वाभाविक है. 

मुबई के जसलोक हॉस्पटल में मेडिसिन रिसर्च विभाग के कंसलटेंट डॉ रोहन सिक्वेरा इस बात की गंभीरता इसी बात से बताते हैं कि जिस तरह के अत्यधिक एंटीबायोटिक का इस्तेमाल हो रहा है, उस हिसाब से हम पांचवे और छठे जेनरेशन की दवाओं की श्रृंखला में पहुंचे हैं. आम बीमारी में पहले दी जाने वाली एंटीबायोटिक दवा अब बेअसर साबित हो रही हैं. ये एक गंभीर समस्य़ा है."