Why no Snowfall in Kashmir: जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड लद्दाख की पहाड़ी चोटियां, लगभग सभी हिमालयी पहाड़ी चोटियां आमतौर पर पूरे साल बर्फ से ढकी रहती थीं, लेकिन बर्फ जल्दी गायब हो गई है. पिछले 4 सालों से हिमालय रेंज में बर्फ समय से बेहद कम पड़ रही है जो धरती के तापमान में बढ़ोतरी के कारण ज्यादा समय तक नहीं टिकती.
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No Snowfall: हम सर्दियों के बीच में हैं, लेकिन हिमालय की चोटियां बिना बर्फ के खाली पड़ी हैं और वैज्ञानिकों ने इसे 'बर्फ का सूखा' कहा है. आंकड़ों के बात करे तो पिछले चार सालों में हिमालय रेंज में 23% की कमी आई है तो कश्मीर में 46.63% बर्फ की कमी आई है. वहीं इस साल पिछले दो महीनों में जम्मू और कश्मीर में लगभग 86%, हिमाचल में लगभग 90% और लद्दाख में लगभग 86% बारिश की कमी रही है.
पहाड़ियों से गायब हो गई बर्फ
जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड लद्दाख की पहाड़ी चोटियां, लगभग सभी हिमालयी पहाड़ी चोटियां आमतौर पर पूरे साल बर्फ से ढकी रहती थीं, लेकिन बर्फ जल्दी गायब हो गई है. पिछले 4 सालों से हिमालय रेंज में बर्फ समय से बेहद कम पड़ रही है जो धरती के तापमान में बढ़ोतरी के कारण ज्यादा समय तक नहीं टिकती. हाल ही में जमा किए गए डेटा से पता चलता है कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तरी भारत के पहाड़ों में मध्यम से गंभीर बर्फ का सूखा पड़ रहा है.
चार साल में बर्फबारी में 23% की कमी
जम्मू कश्मीर के साथ-साथ उत्तरी भारत में भी बर्फ की चादर में तेजी से कमी आ रही है, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के सैटेलाइट-आधारित आकलन से पता चला है कि पिछले चार सालों बर्फबारी में 23% की कमी आई है.
यह ट्रेंड सर्दियों के पैटर्न में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है. अगर हम जम्मू कश्मीर की बात करें तो गुलमर्ग, सोनमर्ग, गुरेज, शोपियां की ऊंचाइयों और पीर पंजाल की ढलानों पर शुरुआती सर्दियों में होने वाली बर्फबारी, जो कभी एक समानी चीज थी, उसमें तेजी से बदलाव हुआ है.
IMD के रिकॉर्ड बताते हैं कि दिसंबर तक बर्फबारी में 46.63% की कमी आई है, जिसने 1974 का रिकॉर्ड तोड़ दिया है और साल के आखिर तक मौसम में कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला है, जिससे 2025 सदी का सबसे सूखा साल बन जाएगा. यह सब मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन और अल नीनो प्रभाव से जुड़ा है.
बारिश-बर्फबारी का कोई बड़ा पूर्वानुमान नहीं
IMD कश्मीर के निदेशक डॉ. मुख्तार अहमद ने कहा, 'पिछले 4-5 सालों से सर्दियों में बारिश और बर्फबारी एक समस्या है. 20-21 में अच्छी बारिश और बर्फबारी हुई थी, लेकिन पिछले 4-5 सालों से इसमें लगातार कमी आ रही है. पिछले साल बहुत कम बारिश और बर्फबारी हुई थी और इस साल अब तक कमी लगभग 50% कम है और आने वाले दिनों में बारिश या बर्फबारी का कोई बड़ा पूर्वानुमान नहीं है, इसलिए हालात गंभीर होते जा रहे हैं.'
न्यूनतम और अधिकतम दोनों रीडिंग के बढ़ते तापमान का ट्रेंड लगातार ऊपर की ओर जा रहा है, और गर्म सर्दियों का मौसम तेजी से आम होता जा रहा है. एक नई स्टडी में इस बात की पुष्टि हुई है कि हिंदू कुश हिमालय और उत्तरी हिमालयी पहाड़ों के समुदायों में बर्फ की कमी हो रही है. सर्दियों में या तो असामान्य रूप से कम बर्फबारी होती है और धरती के लगातार बढ़ते तापमान के कारण यह बर्फ तेजी से पिघलने जाती हैं.
बर्फ की चादर में तेजी से आई गिरावट
यह बार-बार हो रहा हैं, बल्कि तेजी से हो रहा है. इससे न केवल भारत बल्कि एशिया की सबसे महत्वपूर्ण जल प्रणालियां चुपचाप अस्थिर हो रही हैं. वैज्ञानिकों ने कहा कि लगभग दो दशकों से, हिमालयी क्षेत्र में की गई स्टडी और हाई रिजॉल्यूशन वाले सैटेलाइट डेटा से पता चलता है कि आठ देशों में फैली कुछ सबसे महत्वपूर्ण नदियों से सटी बस्तियों के पास बर्फ की चादर में भारी गिरावट आई है. इन में भारत की सिंधु नदी घाटी, अमु नदी घाटी, गंगा नदी घाटी और ब्रह्मपुत्र नदी घाटी और झेलम नदी घाटी शामिल है.
झेलम समेत इन सभी नदियों के पानी का स्तर रिकॉर्ड कम या रिकॉर्ड कम के करीब हो गया है, जिससे पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की कमी की चिंता बढ़ गई है. सूखे की स्थिति ने जंगल की आग को भी बढ़ा दिया है और हवा की गुणवत्ता सूचकांक को भी खराब कर दिया है.
यह सब पहाड़ी जल विज्ञान में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, जिसके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी गंभीरता को अब तक कम करके आंका गया है, लेकिन यह एक बड़ी चिंता का विषय है जो जल्द मानव आवासों को प्रभावित करेगा.
किसानों को भी हो रहा नुकसान
इसके प्रभाव जमीन पर पहले से ही दिखाई दे रहे हैं. किसानों का कहना है कि सूखी मिट्टी और देरी से बर्फबारी सेब के पेड़ों और अन्य फलों के पेड़ों को नुकसान पहुंचा रही है क्योंकि मिट्टी के लिए बर्फ बहुत महत्वपूर्ण है. इसके बिना, जमीन सूख जाती है और अगर जनवरी भी सूखा रहता है, तो बागों को पूरे साल नुकसान होगा.
पर्यटन, जो कश्मीर की सर्दियों की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है, भी कमजोर हो रहा है. गुलमर्ग में शुरुआती सर्दियों में पर्यटकों की संख्या में पहले ही भारी गिरावट आई है क्योंकि बर्फ नहीं है.
डॉ. मुख्तार ने कहा, 'बर्फ के बिना शीतकालीन पर्यटन, स्कीइंग या खेलो इंडिया का कार्यक्रम संभव नहीं है. खासकर जब सभी हिल स्टेशन बर्फ के बिना हैं. यह शीतकालीन पर्यटन के लिए बहुत ही गंभीर स्थिति है. बागवानी के लिए हमें ठंडक की जरूरत होती है जो इस बार नहीं मिल रही है. इसका सीधा असर हो रहा है जैसा कि हम कुछ सालों से बागवानी और कृषि क्षेत्र पर देख रहे हैं.'
भविष्य में भुगतने होंगे गंभीर नतीजे
IMD के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि बर्फ की चादर कम होने के लंबे समय के नतीजे गंभीर हो सकते हैं: पिघलती बर्फ से झरने के पानी का बहाव कम होना, मिट्टी में नमी कम होना और खेती पर दबाव बढ़ेगा.
यह ट्रेंड ग्लेशियर की स्थिरता और गर्मी और पतझड़ के महीनों में पानी की उपलब्धता के लिए गंभीर चिंता पैदा कर रहा है. किसी बड़े पश्चिमी विक्षोभ की उम्मीद नहीं है और तापमान सामान्य से ज्यादा बना हुआ है. विशेषज्ञों को डर है कि उत्तरी हिमालय में सूखा पड़ सकता है, जो पिछले कुछ दशकों में घाटी में देखे गए सबसे बड़े जलवायु बदलावों में से एक होगा, जिसका असर इन इलाकों की बड़ी परियोजनाओं जैसे हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर सेक्टर, बागवानी, कृषि और पीने के पानी पर पड़ेगा.
पिघल रहे ग्लेशियर, नहीं हो रही भरपाई
डॉ. मुख्तार ने कहा, 'इसका कई तरह से असर हो रहा है, न सिर्फ जम्मू-कश्मीर या लद्दाख में, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र में, क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और उनकी भरपाई उस अनुपात में नहीं हो रही है, यहां तक कि भूजल रिचार्ज, या कृषि या बागवानी या हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर सेक्टर, जो सीधे प्रभावित होंगे या शॉर्ट टर्म प्रभाव में इसका असर हमें पीने का पानी कम मिलेगा या घरेलू इस्तेमाल के लिए पानी की सप्लाई प्रभावित होगी क्योंकि कोई बड़ी बारिश नहीं हुई है और कुल मिलाकर स्थिति अच्छी नहीं है, जैसा कि हम देख रहे हैं.'
हिमालय दुनिया के औसत से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है, जिसमें ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान में ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है. यह सब अल नीनो प्रभाव और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहा है, जिससे समुद्र की सतह का तापमान बढ़ रहा है और भारतीय उपमहाद्वीप में वैश्विक मौसम के पैटर्न में गड़बड़ी हुई है.
हिमालयी क्षेत्रों में बारिश की कमी
बर्फ की कमी के अलावा, हिमालयी क्षेत्रों में इस साल बारिश में भी भारी कमी देखी गई. आंकड़ों के अनुसार, 2025 में उत्तर भारत में बारिश की कमी ज्यादातर हिमालयी क्षेत्रों जैसे जम्मू और कश्मीर, हिमाचल, लद्दाख में, खासकर नवंबर और दिसंबर के शुरुआती सर्दियों के महीनों में दर्ज की गई. जम्मू और कश्मीर में लगभग 86% की कमी दर्ज की गई, जबकि हिमाचल में लगभग 90% और लद्दाख में 86% की कमी थी. यह आंकड़े 1 नवंबर से 10 दिसंबर 2025 की अवधि के रिकॉर्ड किए गए हैं.
कुल मिलाकर, 2025 के आंकड़े बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र का हाल के इतिहास में सबसे गंभीर बर्फ की कमी से सामना हो रहा है, जिससे न केवल जम्मू-कश्मीर बल्कि पूरे भारत में पानी की कमी के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो रहा है.