India-Us Trade Deal: अमेरिका के उप विदेश मंत्री रायसीना डायलॉग में शामिल होने भारत आए थे. यहां उन्होंने जो कुछ कहा, उससे साफ है कि अमेरिका भारत के साथ दोस्ती तो चाहता है, लेकिन इस दोस्ती का एक ही मानदंड है- अमेरिका का हित.
Trending Photos
)
Raisina Dialogue 2026: अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने कहा है कि झूठी दोस्ती मीठे शब्दों से शुरू होती है और अक्सर धोखे पर खत्म होती है. जॉर्ज वॉशिंगटन की ये बात अमेरिका पर शत-प्रतिशत लागू होती है. अमेरिका भारत को अपना सबसे करीबी सहयोगी कहता है. भारत से भागीदार को महत्वपूर्ण बताता है, लेकिन वही अमेरिका भारत की तेज रफ्तार तरक्की से जलता भी है. भारत के विकास से अमेरिका की जलन और डर को समझने के लिए सबसे पहले आप अमेरिका के उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ का एक बयान पढ़िए. क्रिस्टोफर ने आज नई दिल्ली में कहा कि अमेरिका अब वो गलती नहीं दोहराना चाहता, जो उसने 20 साल पहले चीन के साथ की थी. चीन को छूट देकर अमेरिका ने उसे आगे बढ़ने का मौका दिया. भारत के मामले में वे ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर अड़े हैं.
विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि भारत का दुश्मन पाकिस्तान है, सबसे बड़ा दुश्मन चीन है. अमेरिका हमारा दोस्त है, लेकिन अमेरिकी उप विदेश मंत्री ने जो कुछ कहा, उससे साफ है कि भारत को लेकर अमेरिका की नीति भी सिर्फ स्वार्थ और अपने फायदे वाली सोच पर आधारित है.
#WATCH | Delhi | Addressing the Raisina Dialogue 2026, US Deputy Secretary of State Christopher Landau says, "India should understand that we are not going to make the same mistakes with India that we made with China 20 years ago... Then the next thing we know, you are beating us… pic.twitter.com/2fK9Rt2I8X
— ANI (@ANI) March 6, 2026
भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो चुकी है. टैरिफ तय हो चुका है. लेकिन अब ट्रंप के मंत्री कह रहे हैं कि हम भारत के लिए बाजार नहीं खोलेंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका को डर है कि अगर खेल के नियम समान हुए तो भारत अमेरिका को पीछे छोड़ देगा.
अमेरिका के इस डर को समझिए. एक तरफ तो वो ट्रेड डील और दूसरे रक्षा समझौते के जरिए भारत से मजबूत सहयोग चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ भारत के विकास से जलता है. भारत की तरक्की की राह में रोड़ा अटकाना चाहता है. भारत से अमेरिकी द्वेष नया नहीं है और ना ही भारत को रोकने की उसकी कोशिश नई है. क्रिस्टोफर लैंडौ ने जो कहा है अमेरिका वो कर चुका है.
हाल में ही टैरिफ और व्यापार से जुड़ी दूसरी पाबंदियां लगाकर अमेरिका ने भारत को अपने बाजार से दूर रखने की कोशिश की.
अमेरिका ने कई वस्तुओं के आयात का कोटा तय कर दिया. उसका उद्देश्य भारत को रोकना था. भारतीय टैलेंट को रोकने के लिए वीजा नियमों को सख्त किया गया. भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए H-1B वीजा की शर्तों को सख्त बनाना इसका उदाहरण है.
पर्यावरण स्टैंडर्ड, लेबर लॉ और US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कड़े क्वालिटी चेक के नाम पर भी भारतीय कृषि और फार्मा उत्पादों को अमेरिका में रोका जाता है. अब समझिए कि कैसे ईर्ष्या से प्रभावित अमेरिकी नीतियों ने भारत को नुकसान पहुंचाया? उच्च टैरिफ से अमेरिका को होने वाला कपड़ों का निर्यात करीब 70 प्रतिशत तक कम हुआ. जेम्स और ज्वैलरी सेक्टर का निर्यात करीब 30 प्रतिशत तक घटा. ऑटो पार्ट्स और ऑटो मोबाइल सेक्टर पर भारी टैरिफ से सप्लाई चेन पर असर पड़ा. उससे भारत के MSME यानी छोटे उद्योगों को नुकसान हुआ.
भारत को कमजोर करने की अमेरिका ने ये नीतियां तब बनाईं, जब वो बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बनाने की बात कहता है. सोचिए, जो अमेरिका क्वॉड के जरिए भारत से रक्षा संबंध मजबूत करना चाहता है, वही आर्थिक मोर्चे पर भारत को कमजोर करने वाली नीतियां बनाता है. ये तब है जब भारत ने 2020 में कोरोना के दौरान अमेरिका में दवाओं की कमी होने पर हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन के निर्यात से बैन हटाया था.
भारत अमेरिका में उपयोग होने वाली 40 प्रतिशत जेनरिक दवाएं सप्लाई करता है. यानी हर तीसरा अमेरिकी भारत की जेनरिक दवा प्रयोग करता है. सोचिए, अगर भारत अमेरिका को जेनरिक दवाओं की सप्लाई रोक दे तो क्या होगा? अमेरिका का हेल्थ सिस्टम चरमरा जाएगा.
भारत अमेरिका में मसाले और हर्बल प्रोडक्ट्स का बड़ा निर्यातक है. अगर भारत अमेरिका को मसालों का निर्यात रोक दे तो अमेरिका को 50 प्रतिशत ज्यादा कीमत पर ये सामान वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से आयात करना पड़ेगा.
फार्मा और दूसरी इंडस्ट्री के लिए जरूरी ऑर्गेनिक केमिकल्स भारत अमेरिका को निर्यात करता है. अमेरिका अगर दूसरे देशों से ये प्रोडक्ट खरीदे तो उसे 50 प्रतिशत तक ज्यादा कीमत देनी होगी.
अमेरिकी उप विदेश मंत्री भारत की तुलना उस चीन से कर रहे हैं जो अमेरिका को रेयर अर्थ जैसे जरूरी खनिज की सप्लाई रोक देता है. ऐसा होने पर ट्रंप सरकार चीन से समझौता करती है. भारत अमेरिका को दवा से लेकर दूसरे जरूरी सामान वाजिब कीमत पर निर्यात करता है, लेकिन अमेरिका भारत के विकास से ही जलता है.
प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कहा है कि सच्चा मित्र वही है जो आपके मुश्किल वक्त में साथ खड़ा हो, जो केवल लाभ के लिए दोस्ती करे, वह मित्र नहीं होता.
भारत अगर अरस्तू के इस वाक्य को मानदंड मानता तो अमेरिका से भारत की मित्रता खत्म हो गई होती. लेकिन भारत वसुधैव कुटुंबकम की उदार और विराट दर्शन को मानता है. इसलिए संकट के हर समय में भारत अमेरिका के साथ खड़ा रहा है. अमेरिका के डर की वजह भारतीय प्रतिभा और तेज रफ्तार विकास है.
कभी अविष्कार की धरती कहे जाने वाला अमेरिका अब प्रतिभा के मोर्चे पर भारत से पिछड़ रहा है. यही अमेरिका की जलन और डर की असल वजह है.
आईटी और सॉफ्टवेटर सर्विस सेक्टर में अमेरिका पूरी तरह भारत पर निर्भर है. अमेरिका की फॉर्च्यून 500 कंपनियों का पूरा बैक एंड और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भारतीय आईटी कंपनियों के भरोसे है.
दुनिया की बड़ी कंपनियों का रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर भारत में शिफ्ट हो रहा है. पहले इन कंपनियों की पसंद अमेरिका हुआ करता था.
बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज का पूरा काम अमेरिका से शिफ्ट होकर बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा जैसे शहरों में आ रहा है.
स्पेस और सुपर कंप्यूटिंग के सेक्टर में भी भारत अमेरिका पर भारी पड़ रहा है. सस्ते लॉन्चिंग सुविधा की वजह से अमेरिका स्पेस सेक्टर में भारत से पिछड़ रहा है.
ये भविष्य को बदलने वाले सेक्टर हैं. ये वो क्षेत्र हैं, जिनमें पहले अमेरिका टॉप पर था. लेकिन भारतीय प्रतिभाओं ने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है. अमेरिका की ईर्ष्या की असली वजह यही है. अमेरिका जानता है कि आज वो पिछड़ रहा, कल बहुत पीछे छूट जाएगा. इसलिए उसे भारत की तरक्की चुभ रही है. इसलिए अमेरिका के नीति-नियंता भारत के विकास से ईर्ष्या कर रहे हैं और भारत को रोकने की बात कह रहे हैं.