सम्राट अशोक के बाद गुप्तकाल के शासकों ने शिलालेखों और प्रमाणों के माध्यम से ऐसी जानकारी छोड़ी, जिसके आधार पर उस समय की राजनीति, संस्कृति और समाज को आज समझा जा सकता है. आइए जानते है उस खास स्तंभ के बारे में जो भारत के इतिहास के बारे में विस्तार से बताता है...
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Gupta Empire: विश्व इतिहास में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. यही कारण है कि भारत को जीतने और यहां से धन लूटने के लिए ना सिर्फ ईसा पूर्व सिकंदर महान ने भारत का रुख किया, बल्कि बाद के वर्षों में मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी और अंग्रेजों ने भी हमला किया था. भारत की सभ्यता बहुत पुरानी है, लेकिन यहां इतिहास लिखने की परंपरा कम थी, जिस कारण से भारतीय इतिहास की जानकारी कम मिलती है. प्राचीन इतिहास में अगर जाएं तो सम्राट अशोक के बाद गुप्त काल के शासकों ने ही अपनी भावी पीढ़ी के लिए कुछ प्रमाण छोड़े जिनके जरिए उस काल को समझा जा सकता है.
भारत के इतिहास में क्यों खास है गुप्त काल
बता दें, भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग के रूप में पहचाना जाने वाला गुप्त काल चौथी से छठी शताब्दी के बीच, लगभग 320 से 550 ईस्वी तक फैला माना जाता है. इसी काल ने आर्यभट्ट के शून्य तथा महाकवि कालिदास की कृति अभिज्ञान शाकुंतलम् जैसी अद्वितीय धरोहर विश्व को दीं थी. गुप्त काल इसलिए भी विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस युग ने इतिहास के अध्ययन के लिए अनेक प्रमाण छोड़े जिनमें शिलालेख, सिक्के और साहित्यिक कृतियां जिनके आधार पर उस दौर की राजनीति, समाज और सांस्कृतिक विकास को समझा जा सकता है.
कहां-कहां मिले गुप्तकालीन शिलालेख?
गुप्त काल के शिलालेख बंगाल से लेकर काठियावाड़ तक विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं. इन अभिलेखों की मदद से गुप्त वंश के इतिहास की कालक्रम सहित विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई. इनमें प्रयागराज का अशोक स्तंभ सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. मूल रूप से मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित इस स्तंभ पर पहले अशोक के शिलालेख अंकित थे, बाद में समुद्रगुप्त ने भी इसी स्तंभ पर अपना अभिलेख खुदवाया था.
जानें क्या-क्या दर्ज है अशोक स्तंभ पर?
अशोक स्तंभ के ऊपरी भाग में सम्राट अशोक के शासनकाल से संबंधित विवरण दर्ज हैं. इसके नीचे गुप्त काल का शिलालेख अंकित है, जिसमें समुद्रगुप्त के विजय अभियानों, उनकी नीतियों, समकालीन राजनीति और उस समय के सामाजिक ढांचे का विस्तृत वर्णन मिलता है.
शिलालेख से यह भी जानकारी मिलती है कि गुप्त वंश की स्थापना श्रीगुप्त ने की थी, जबकि इसका विस्तार चन्द्रगुप्त प्रथम के काल में हुआ. चन्द्रगुप्त प्रथम ने स्वयं गद्दी त्यागकर अपने पुत्र समुद्रगुप्त को उत्तराधिकारी बनाया था. स्तंभ पर अंकित यह अभिलेख समुद्रगुप्त की प्रशस्ति है, जिसे उनके दरबारी कवि हरिषेण ने लिखा था. इतिहासकारों के अनुसार, गुप्तकालीन शिलालेख विशेष महत्व रखते हैं क्योंकि वे प्राचीन भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में काफी मदद करते है.