ख्वाहिशों की कुर्बानी से ही मिलेगी कभी ख़त्म न होने वाली ख़ुशी, 25 सितंबर को बकरीद पर क़ुर्बानी का पैग़ाम

 वही आसमान और ज़मीन का पैदा करने वाला, वही सबसे बड़ा हाक़िम और पालनहार है। उसी के क़ब्ज़े में सब कुछ है। हमारा मरना-जीना, सब अल्लाह के लिए ही है। ख़ुदा ने मोहब्बत के रंग में रंग कर दुनिया बनाई। उसमें खुशियों के फूल खिलाये। उसे अपनी नेमतों से नवाज़ा। ख़ुदा ने, इंसानों की खुशी के लिए ज़मीन बनाई। पेड़-पौधे,फल-फूल और खाने-पीने की न जाने कितनी चीज़ें बनाई। उसने जज्बात बनाये ताकि इंसान ज़ेहनी तौर पर खुश रहे। लेकिन इतना कुछ पाकर भी, इंसान दु:खी है।

ख्वाहिशों की कुर्बानी से ही मिलेगी कभी ख़त्म न होने वाली ख़ुशी, 25 सितंबर को बकरीद पर क़ुर्बानी का पैग़ाम
फाइल फोटो

दिल्ली: वही आसमान और ज़मीन का पैदा करने वाला, वही सबसे बड़ा हाक़िम और पालनहार है। उसी के क़ब्ज़े में सब कुछ है। हमारा मरना-जीना, सब अल्लाह के लिए ही है। ख़ुदा ने मोहब्बत के रंग में रंग कर दुनिया बनाई। उसमें खुशियों के फूल खिलाये। उसे अपनी नेमतों से नवाज़ा। ख़ुदा ने, इंसानों की खुशी के लिए ज़मीन बनाई। पेड़-पौधे,फल-फूल और खाने-पीने की न जाने कितनी चीज़ें बनाई। उसने जज्बात बनाये ताकि इंसान ज़ेहनी तौर पर खुश रहे। लेकिन इतना कुछ पाकर भी, इंसान दु:खी है। उसके जिस्म से लेकर रूह तक पर, ख्वाहिशों की खराशे हैं। वह जितना ख्वाहिशों के पीछे दौड़ता है, उतना ही दु:खी होता है। काश वह जानता कि ख्वाहिशों की कुर्बानी में ही खुशी की बेशुमार दौलत है। बकरीद का त्यौहार, इन्हीं ख्वाहिशों की क़ुर्बानी देकर, ज़िंदगी में खुशियों के रंग घोलने का प्रतीक है। ईद उल ज़ुहा यानि ईद-उल-अज़हा इस्लामी कैलेण्डर हिजरी के, आख़िरी महीने यानि ज़िलहिज्ज की 10वीं तारीख़ को मनाई जाती है। हज़ का मुख्य कार्यक्रम ज़िलहिज्ज की 8 तारीख़ से शुरू होकर 5 दिन यानि 12 ज़िलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 ज़िलहिज्ज को क़ुर्बानी भी शामिल है। 

क़ुर्बानी की अहमियत
खुदा ने बकरीद के ज़रिये, अपनी अज़ीज़ चीज को कुर्बान करने का पैगाम दिया है। पर अफसोस कि हम इच्छाओं की क़ुर्बानी, ख्वाहिशों की कुर्बानी देना भूल गये। अल्लाह पाक ने अपने नबियों के ज़रिये, समाज में क़ुर्बानी की अहमियत को समझाना चाहा। उन्होने ऐसा जीवन दर्शन दिया जिसे अपना कर हर इंसान खुश रहे। वह दूसरों के लिये त्याग और बलिदान कर, फिज़ा में मोहब्बत का रंग भरे। इंसान सिर्फ अपनी नहीं बल्कि दूसरों की खुशियों के बारे में भी सोचे। बकरीद के ज़रिये यही पैगाम दिया गया है।      

क्यों मनाई जाती है बकरीद?
ईद-अल-अज़हा या ईदे क़ुर्बां के पीछे की कहानी भी क़ुर्बानी के जज़्बे का इज़हार करती है। हज़रत इब्राहिम एक पैग़म्बर थे। उन्हें अल्लाह पाक ने,अपनी प्रिय चीज़ की क़ुर्बानी का आदेश दिया। इब्राहिम के लिये उनका बेटा इस्माइल ही सबसे अज़ीज़ था। जब इब्राहिम ने, अपना मन टटोला तो पाया कि इस दुनिया में उन्हें अपने बेहद अज़ीज़ शख्स अपने बेटे को ही कुर्बानी के लिये पेश करना होगा। हज़रत इब्राहिम, अपने बेटे इस्माईल को मीना के मैदान में ले गये। बेटे को ज़मीन पर लिटाकर उसकी आंखों पर पट्टी बांधी और उसकी गर्दन पर छुरी फेर दी। लेकिन अल्लाह को इब्राहिम की क़ुर्बानी का जज़्बा इतना पसंद आया कि उन्होने इस्माईल की जगह जन्नत से, एक दुम्बा यानि भेड़ भेज कर इस्माइल को बचा लिया। तब से इब्राहिम की इसी कुर्बानी के जज़्बे को अहमियत देने के लिये, बकरीद मनाई जाने लगी। आज भी मीना के मैदान में, इसी कुर्बानी को यादगार को अमल में लाया जाता है।     

क़ुर्बानी के नियम
-बकरे की प्रतीकात्मक कुर्बानी होती है। 
-हर किसी के लिये बकरे की कुर्बानी देना ज़रूरी नहीं।
-कुरान में लिखा है कि अल्लाह के पास मांस खून नहीं,रूह पहुंचती है।
-कुर्बानी वही दे सकता है जिसके पास डेढ़ सौ तोला चांदी जितनी दौलत हो।
-क़ुर्बानी देते वक्त, कुर्बानी देने वाले पर कोई क़र्ज़ नहीं होना चाहिये।
-कमाई का 2.5% दूसरो की भलाई पर ख़र्च करने वालों पर बकरे की क़ुर्बानी ज़रूरी नहीं।
-क़ुर्बानी के ग़ोश्त को 3 हिस्सों में बाँटना चाहिये।
-एक हिस्सा अपने लिए, दूसरा पड़ोसियों के लिए और तीसरा ग़रीबों और यतीमों के लिये रखना चाहिये।
-ग़रीबों का हिस्सा उनके घर तक पहुंचाना चाहिये।
जिस तरह बकरा सिर्फ मैं-मैं करता है, वैसे ख्वाहिशें भी सिर्फ अपने बारे में सोचती हैं। बस इन्हीं स्वार्थी ख्वाहिशों को कुर्बान करने की ज़रूरत है। वैसे भी कुरान में लिखा है कि अल्लाह तक मांस,खून और हड्डियां नहीं पहुंचतीं। बल्कि इंसान के दिल की कैफियत पहुंचती है।