भाईदूज पर भद्रा का साया, आज यमुना में स्नान से कभी नहीं आयेंगे यमराज, उन्नाव में यमराज का इकलौता मंदिर, भैंसा चढ़ाने से कामना पूरी

भाई बहन के प्रेम के पर्वों के नाम पर सिर्फ रक्षाबंधन ही नहीं बल्कि दिवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है भाई दूज। इस दिन जो भाई अपनी बहन के घर जा कर तिलक लगवाता है, उसकी आयु लंबी होती है और वह दिन ब दिन तरक्की करता चला जाता है। लेकिन इस बार के भाईदूज पर भद्रा का साया है। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहते हैं। इस दिन यमदेव की पूजा करने वालों को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन बहन के घर भोजन करना बहुत शुभ माना जाता है।   

भाईदूज पर भद्रा का साया, आज यमुना में स्नान से कभी नहीं आयेंगे यमराज, उन्नाव में यमराज का इकलौता मंदिर, भैंसा चढ़ाने से कामना पूरी
फाइल फोटो

दिल्ली: भाई बहन के प्रेम के पर्वों के नाम पर सिर्फ रक्षाबंधन ही नहीं बल्कि दिवाली के दूसरे दिन मनाया जाता है भाई दूज। इस दिन जो भाई अपनी बहन के घर जा कर तिलक लगवाता है, उसकी आयु लंबी होती है और वह दिन ब दिन तरक्की करता चला जाता है। लेकिन इस बार के भाईदूज पर भद्रा का साया है। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहते हैं। इस दिन यमदेव की पूजा करने वालों को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन बहन के घर भोजन करना बहुत शुभ माना जाता है।   
भाईदूज पर भद्रा का साया
तिलक का शुभ मुहूर्त- दोपहर 1:29PM से दोपहर 3:43PM तक 
कैसे मनाया जाता है भाई दूज ?
पौराणिक कथा के अनुसार यमुना ने इसी दिन अपने भाई यमराज की लम्बी आयु के लिये व्रत रखा था और यमराज को अन्नकूट का भोजन कराया था। मिथिला में इस दिन चावल का लेप भाईयों के दोनों हाथों में लगाया जाता है। कुछ जगहों पर हाथ में सिंदूर लगाने की भी परंपरा है। भाई के हाथों में सिंदूर और चावल का लेप लगाने के बाद उस पर पान के पांच पत्ते, सुपारी और चांदी का सिक्का रखा जाता है। फिर उस पर जल की धार गिराते हुए भाई की दीर्घायु के लिये मंत्र पढ़ा जाता है। इस दिन सिर्फ बहनें ही नहीं बल्कि भाई भी बहनों को उपहार देते हैं। भाई दूज मनाने की परंपरा भी अलग अलग तरह से है। कहीं तिलक लगाकर आरती उतारी जाती है तो कहीं भाई का मुहं माखन मिसरी से मीठा कराया जाता है। शाम के समय कुछ जगहों पर बहनें घर के बाहर चार बाती वाली दिया जलाती हैं।    
भाई दूज की पौराणिक कहानी
भाई बहन के दो पर्व खास तौर पर  मशहूर हैं। पहला रक्षा बंधन और दूसरा भाई दूज। एक कहानी के अनुसार इस दिन यमदेवता ने , अपनी बहन को दर्शन दिये थे। यमुना अपने भाई से मिलने को बहुत व्याकुल थीं। इसीलिए जब अपने भाई को, अपने पास आया देखा तो उऩकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यम ने खुश होकर, यमुना जी को वरदान दिया कि इस दिन अगर भाई-बहन दोनों एक साथ यमुना नदी में स्नान करेगें, तो उन्हें मुक्ति मिलेगी और भाई दीर्घायु होगा। इसीलिए भाईदूज के दिन भाई अपनी बहन के घर जरुर जाते हैं। 

कौन हैं यमुना देवी?
यमुना की कहानी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रज नगरी। वेदों पुराणों में यमुना को भगवान कृष्ण की प्रेयसी बताया गया है। वह जब संगम नगरी पहुंचती हैं तो गंगा  से मिल जाती हैं। उसके बाद जो अद्भुत दृश्य त्रिवेणी संगम में उभरता है वह देखने लायक होता है। यमुना सिर्फ एक नदी नहीं बल्कि भक्ति की ऐसी अविरल धारा है जिसमें ब्रज के लोग कृष्ण प्रेम में बहते आए हैं। हिमालय के यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना, भारत की पवित्र नदियों में से एक है। भारतीय संस्कृति में उन्हें मां माना गया है। यमुनोत्री से निकलते हुए यमुना कई पहाड़ी दर्रों और घाटियों में गरजते बरसते हुये कई छोटी बड़ी पहाड़ी नदियों को खुद में समेटते हुए आगे बढ़ती हैं। उत्तराखंड से यूपी, हरियाणा, दिल्ली और फिर मथुरा आगरा होते हुए इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम की गंगा में मिल जाती हैं। यमुना की सांवली लहरें , जब धवल गंगा की श्वेत लहरों से गले मिलती है तो दोनों नदियों की सुंदरता देखते ही बनती है। ऐसा लगता है जैसे सफेद कमल के हार में नील कमल गूंथ दिए गए हों। कहीं छाया में विलीन चांदनी, धूप-छांव सी छिटकती हुई नज़र आती है तो कहीं शरद के आकाश में बादलों की रेखा से, नील गगन सी छलक पड़ती है यमुना नदी। ब्रज मंडल में तो यमुना एक ऐसी नदी है जो यहां के लोगों को जीवन देती हैं। यहां के लोग यमुना को कृष्ण की दूसरी पटरानी मानते हैं। लेकिन जब ये नदी मथुरा से होते हुए वृंदावन पहुंचती है तो कृष्ण के श्याम रंग में रंगी नज़र आती है, तब इसे देखकर लगता है कि इसे अपने सांवले रंग पर बहुत गर्व है। कहते हैं कि सूर्य यमुना के पिता हैं और सूर्य की दो संताने थीं यम और यमुना। यमुना तो गोलोक चली गईं थीं और यमराज ने एक नई नगरी यमपुरी बसा ली थी। एक दिन यम अपनी बहन से मिलने गोलोक से लेकर विश्रामघाट पहुंचे। भाई को घर आया देख यमुना ने उनका जमकर आदर सत्कार किया। भाई यमराज भी उनकी आवभगत देखकर बहुत खुश हुये। यमराज ने यह  वरदान दिया कि जो भाई-बहन यम द्वितीया के एक साथ यमुना में स्नान करेंगे उन्हें कभी मृत्यु का डर नहीं सताएगा और उन्हें कभी भी यमलोक नहीं ले जाए आएंगे। यमुना का नाम वेदपुराणों में आता है। ब्रम्हपुराण में तो इसे सृष्टि का आधार माना गया है। यमुना सहस्त्र नाम में तो यमुना जी के 1000 नाम बताए गए हैं। 

उन्नाव में यमराज का अनोखा मंदिर
उन्नाव में यमराज का इकलौता मंदिर है। यहां के लोगों पर किसी और की कृपा नहीं बल्कि यमराज की कृपा है। जो लोग यमराज को भैंसे की प्रतिमा चढ़ाते हैं, यमराज उनकी हर इच्छा पूरी करते हैं। यमराज से तो सभी डरते हैं लिहाज़ा आपके भी पांव कांपते होंगे जब सामने आता होगा उनका नाम। ऐसे में अगर कोई यमराज के मंदिर में जाकर पूजा करे तो इसे आप क्या कहेंगे? उत्तर प्रदेश के उन्नाव से 35 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद आता है भैंसेश्वर मंदिर। हर जगह तो देवी देवताओं की पूजा होती है लेकिन जैतीपुरा के आराध्य हैं भैंसेश्वर यमराज। यमराज की सवारी भैंसा है इसीलिये मंदिर का नाम भी पड़ा भैंसेश्वर। यहां के लोगों का मानना है कि उनपर, यमराज की कृपा है। जो लोग भैंसे की प्रतिमा या खुला भैंसा छोड़ते हैं उनकी हर कामना पूरी हो जाती है। गांव वालों का कहना है कि पहले इस गावं में एक राक्षस ने आतंक मचा रखा था। लोग उसके अत्याचार से मुक्ति पाना चाहते थे। तब एक भैंसे ने उस राक्षस को मारा था और गांव के लोगों की मुश्किल दूर की थी। तभी से यह मंदिर इस गावं में है और लोग बिना किसी डर के, यमराज का दर्शन करने आते हैं।