Bihar election 2025: बिहार के शाहाबाद क्षेत्र में इस बार एनडीए आत्मविश्वास से भरा है. पहले जहां उसे करारी हार मिली थी, अब चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की वापसी से समीकरण बदल गए हैं. भोजपुर-बक्सर में कांटे की टक्कर, सासाराम में मुकाबला दिलचस्प है.
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बिहार की सियासत में शाहाबाद इलाका हमेशा से राजनीतिक रूप से अहम माना जाता है. पांच साल पहले इसी इलाके ने एनडीए के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया था, जब भोजपुर, बक्सर, कैमूर और रोहतास की 22 विधानसभा सीटों में से एनडीए सिर्फ दो सीटें आरा और जगदीशपुर ही जीत सका था. पिछली लोकसभा चुनाव में भी हालात नहीं बदले, जब गठबंधन को यहां की चारों सीटों आरा, बक्सर, करकट और सासाराम में हार का सामना करना पड़ा. लेकिन इस बार हालात अलग दिख रहे हैं. एनडीए आत्मविश्वास से भरा है और मान रहा है कि शाहाबाद अब उसका खोया किला फिर लौटा देगा.
जहां से बदले थे बिहार के राजनीतिक समीकरण
शाहाबाद इलाका, जो कभी वामपंथी और समाजवादी राजनीति का गढ़ माना जाता था, अब सियासी बदलाव के केंद्र में है. 2020 के विधानसभा चुनाव में यहां एनडीए को सबसे कमजोर प्रदर्शन का सामना करना पड़ा था. तब लोजपा (चिराग पासवान) और आरएलएसपी (उपेंद्र कुशवाहा) गठबंधन से अलग थे. दोनों पार्टियों के करीब 7% वोटों ने नतीजे पलट दिए थे, जिससे महागठबंधन और एनडीए के बीच बेहद मामूली अंतर रह गया था.
अब एनडीए की वापसी का भरोसा
इस बार एनडीए के लिए सूरत बदल चुकी है. चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा दोनों फिर से गठबंधन में लौट आए हैं. इससे शाहाबाद क्षेत्र में भाजपा और जदयू का मनोबल बढ़ा है. जदयू नेता मानते हैं कि नीतीश कुमार की “मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना” यानी ‘दशजारी योजना’ ने महिलाओं में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ाया है. भोजपुर की सातों सीटों पर इस बार कड़ी टक्कर देखी जा रही है.
आरा और सासाराम में सियासी दिलचस्पी बढ़ी
भोजपुर की आरा सीट पर एनडीए को 2020 की तुलना में इस बार बड़ी जीत की उम्मीद है, जहां पिछली बार बीजेपी प्रत्याशी अमरेंद्र प्रताप सिंह मामूली अंतर से जीते थे. वहीं, रोहतास के सासाराम सीट से इस बार उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता मैदान में हैं. आरजेडी के उम्मीदवार सत्येंद्र शाह के बैंक डकैती केस में गिरफ्तारी और फिर जमानत से यहां मुकाबला और दिलचस्प हो गया है.
महागठबंधन को पिछली बार मिला था फायदा
राजनीतिक विश्लेषक सज्जन कुमार के अनुसार, 2020 में महागठबंधन को शाहाबाद में बढ़त इसलिए मिली थी क्योंकि आरजेडी और माले का गठजोड़ कुशवाहा और अति पिछड़ों का वोट खींचने में सफल रहा था. वहीं, चिराग पासवान की लोजपा ने दलित वोटों को एनडीए से दूर कर दिया था. तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी मुद्दे पर युवाओं का साथ हासिल किया था.
मतदान समीकरणों में बदलाव की उम्मीद
स्थानीय मतदाताओं के मुताबिक, इस बार समीकरण बदलते दिख रहे हैं. भोजपुर और बक्सर में एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर है. महिलाओं का वोट नीतीश कुमार के पक्ष में जा सकता है, जबकि युवा वोट तेजस्वी यादव को आकर्षित कर रहा है. कैमूर और रोहतास की कुछ सीटों पर बसपा के कारण मुकाबला त्रिकोणीय बन गया है. एनडीए को भरोसा है कि शाहाबाद से उसकी वापसी पूरे बिहार के खेल को बदल देगी.