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Bihar Election Result: एकमुश्त पैसा, महिलाओं की लॉयल Tsunami, गठबंधन का ओवर कॉन्फिडेंस, मारक नहीं बने मुद्दे... यूं हुआ खेला

Bihar Election 2025 Result: नतीजों ने जो तस्वीर दिखाई उसने तमाम चर्चाओं को एक झटके में गलत साबित कर दिया. नीतीश कुमार और भाजपा न सिर्फ़ जीते बल्कि बल्कि इतने जबर्दस्त अंदाज़ में जिसका अंदाज़ा ख़ुद उन्हें ही नहीं रहा होगा.

Bihar Election Result: एकमुश्त पैसा, महिलाओं की लॉयल Tsunami, गठबंधन का ओवर कॉन्फिडेंस, मारक नहीं बने मुद्दे... यूं हुआ खेला

तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं - दुष्यंत कुमार

कभी-कभी सियासत आईने की तरह होती है, सच सामने खड़ा हो तो भी दिखता सबसे बाद में है. बिहार के नतीजों को देखकर यही समझ में आता है. पूरे चुनावी मौसम एक ही गाना सुरीले या बेसुरे अंदाज़ में बजता रहा...गुरू! इस बार मुकाबला जबर है! नीतीशे कमजोर हैं! तेजस्वी दम से चमक रहा है! माहौल बदलाव का है! सोशल टपरी से चाय की दुकानों तक, हर जगह एक ही बयान, महागठबंधन भारी पड़ेगा, चुनाव निकल न सकेगा...मोदी-योगी से कुछ न बन पड़ेगा, काहे से कि ये बिहार है!!!!

लेकिन नतीजों ने जो तस्वीर दिखाई उसने तमाम चर्चाओं को एक झटके में गलत साबित कर दिया. नीतीश कुमार और भाजपा न सिर्फ़ जीते बल्कि बल्कि इतने जबर्दस्त अंदाज़ में जिसका अंदाज़ा ख़ुद उन्हें ही नहीं रहा होगा.

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विपक्ष क्या समझने में फेल हुआ?

अब सबसे बड़ा सवाल, कांग्रेस-आरजेडी से चूक कहां हुई? विपक्ष का नैरेटिव क्यों नहीं चल पाया? ऐसा क्या हुआ जिसे जनता ने समझा लेकिन विपक्ष समझने में विफल रहा?

आइए, ज़रा सिलसिलेवार तरीके से पूरी तस्वीर को समझते हैं. यूं तो बिहार के राजनीतिक अखाड़े में सब कुछ सतह पर शांत दिखता रहा, तेजस्वी यादव का युवा चेहरा, जातीय समीकरण का गणित, महागठबंधन का अति आत्मविश्वास…दूसरी तरफ़ NDA ने प्रभावी रणनीति पर काम किया. और जब मतपेटियां खुलीं तो साफ़ हो गया कि असली कहानी परदे के पीछे ही लिखी जा रही थी.

तो कहां हुई महागठबंधन से गलती? 

चुनाव विश्लेषण की भाषा में कहते हैं, हार कभी एक गलती से नहीं होती कई छोटी चूकों के जमा होने से होती है. बिहार में भी महागठबंधन ने वही किया, छोटी-छोटी चूकें, लेकिन असर बड़ा.

कांग्रेस ने कच्चे में उतारी गाड़ी
 
RJD और कांग्रेस का तालमेल कागज़ पर मजबूत दिखा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और थी. कांग्रेस को दी गई अतिरिक्त सीटें महागठबंधन के खाते में उलटा असर डाल गईं. यही वही गलती है जो 2017 में अखिलेश यादव ने की थी. RJD ने SP की 2017 वाली रणनीतिक गलती दोहराई. महागठबंधन ने कांग्रेस को जरूरत से ज्यादा सीटें दीं, जैसे अखिलेश यादव ने 2017 में किया था. यूपी   में तब कांग्रेस को 100 सीटें दी गई थीं लेकिन कांग्रेस ने सिर्फ 7 जीतीं. बिहार में भी इस बार कांग्रेस को 62 सीटें मिलीं लेकिन वह 6 सीटों पर ही बढ़त बना पाई. यानी यह सीट-शेयरिंग महागठबंधन के लिए भारी पड़ी.

तेजस्वी का माहौल बना लेकिन मैसेज में झोल था...

तेजस्वी यादव भीड़ खींचने में सफल रहे, लेकिन भीड़ को वोट में बदलने वाला नैरेटिव कमजोर रहा. जिस बेरोज़गारी की बात होनी चाहिए थी, वह अंत तक सिर्फ़ भाषण में ही रह गई. हर घर सरकारी नौकरी, पेंशन, महिला सशक्तिकरण जैसे बड़े वादे किए थे. सब कुछ सुनने में सही लग रहा था, लेकिन फंडिंग और टाइमलाइन का कोई सॉलिड प्लान नहीं दिया गया. हर घर सरकारी नौकरी का वादा भी लोगों को महागठबंधन के पक्ष में वोट डालने के लिए कारण नहीं दे पाया. फिर तेजस्वी की सबसे बड़ी समस्या है लालू सरकार का जंगलराज. यह टैग उनका पीछा ही नहीं छोड़ता है. जिन लोगों ने उस समय को भोगा है वे किसी की भी सरकार बनवा सकते हैं लेकिन लेकिन फिर से जंगलराज रिपीट करने की हिम्मत नहीं जुटा सकते हैं. 

कहा जा सकता है कि युवाओं के भरोसे बैठे तेजस्वी को कहीं न कहीं इस जंगलराज का दंश भी झेलना पड़ा. इसके अलावा महागठबंधन का वोट बैंक तो मजबूत बना रहा, लेकिन विस्तार नहीं हो पाया. महिलाएं, EBC वोटर और पहली बार वोट देने वाले तीन ही वर्ग नीतीश और NDA की तरफ झुकते चले गए.

महिला की सुनामी, फिर से नीतीशे कुमार... 

इस बार महिला मतदाता निर्णायक साबित हुईं. नीतीश सरकार की महिलाओं केंद्रित योजनाओं विशेषकर 10 हजार डायरेक्ट ट्रांसफर करना...एकदम से गेमचेंजर साबित हुआ. लगभग एक करोड़ महिलाओं का इससे सीधा फायदा पहुंचा. इतिहास में पहली बार महिलाओं ने पुरुषों से भी ज्यादा बढ़ चढ़कर मतदान किया. प्रतिशत की बात की जाए तो लगभग 10 फीसदी से भी ज्यादा का अंतर दोनों के बीच रहा. यह माने जाने में अब कोई गुरेज नहीं है कि यह बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत नीतीश के लिए जबर्दस्त समर्थन लाया. 

महिलाओं में उनकी छवि और 2005 में अपनी पहली सरकार से महिलाओं के लिए किए गए उनके कामों ने इस वर्ग में उनकी छवि एक ऐसे बुजुर्ग की बना दी थी जो महिलाओं के लिए सच में कुछ करना चाहता है. पहली सरकार की साइकिल योजना से लेकर आगे पढ़ाई में अव्वल आने वाली लड़कियों के लिए अवॉर्ड जैसी योजनाओं की एक कड़ी के रूप में ही 10 हजारी योजना सामने आई. इस सभी बातों ने नीतीश के पक्ष में जमकर महौल बना दिया. 

मोदी-शाह का जादू चल गया

प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों ने नैरेटिव सेट किया, जबकि अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह और भाजपा-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने ग्राउंड पर एनर्जी बढ़ाई. भारी भीड़, माइक्रो-मैसेजिंग और बूथ-लेवल मोबिलाइजेशन ने लहर पैदा की. मोदी ने 16 रैलियां कीं जबकि अमित शाह ने लगभग 36 रैलियों को संबोधित किया. राजनाथ ने बीस और भाजपा शासित प्रदेशों के सीएम ने भी कई रैलियों के माध्यम से अलग-अलग वर्गों के बीच पैठ बनाई. मध्यप्रदेश के सीएम मोहन यादव, दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता को अपने वर्गों तक नीतीश सरकार की योजनाओं को पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई थी.

PK फैक्टर उर्फ फटा पोस्टर निकाला जीरो

प्रशांत किशोर से NDA का जितना बज़ सोशल मीडिया पर रहा उतना ग्राउंड जीरो पर दिखाई नहीं दिया. ऐसा लग रहा था कि वे दोनों ही पार्टियों को जमकर नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन ऐसा लगता है कि अभी भी बिहार का जातीय समीकरण को तोड़ने में PK सफल नहीं हो पाए हैं. 27 सौ गांवों में पदयात्रा करने के बाद उन्होंने पार्टी बनाई. उन्होंने बिहार के मानस को जानने का दावा किया इसके अलावा पॉलिटिक्स प्लानर के रूप में उनकी साख ने भी उनके इर्द-गिर्द अच्छा खासा माहौल बना दिया था. 

फिर उनका ही दावा था कि अर्श पर रहेंगे या फर्श पर...यानी या तो 10 सीटें जीतेंगे या 150 ....हालांकि यह बात अलग है कि उनके दोनों ही दावे गलत निकले. उनकी पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई. वे किसी भी गठबंधन के वोटरों में ज्यादा सेंध नहीं लगा पाए. ऐसा कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर उनका असर बहुत ही सीमित रहा. उनके अंदर काबिलियत है लेकिन अब उन्हें थोड़े धैर्य के साथ भी काम करना होगा. यदि वे लगातार बिहार में काम करते रहे तो निश्चित तौर पर देर सबेर वे सियासी दुनिया में बड़ा नाम बन सकते हैं.  

सीधे मुकाबले में भाजपा है चैंपियन...

जब भी कांग्रेस BJP का सीधा मुकाबले में होता है तो भाजपा का प्रदर्शन जबर्दस्त रहता है. त्रिकोणीय चुनाव में जरूर भाजपा उतनी प्रभावी नहीं रहती है. यहां कांग्रेस के सीधे सामने आते ही भाजपा और आरएसएस का कैडर राज्य में बहुत सक्रिय हो गया. लोगों तक भाजपा के वादे पहुंचाने उन्हें प्रभावित करने, अपने पक्ष के वोटरों को पोलिंग बूथ तक लाने में इस कैडर की महत्वपूर्ण निभाई.

ऐसा भी माना जा सकता है कि शुरुआती तौर पर यह बात फैली कि भाजपा कांग्रेस से बहुत पीछे रह जाने वाली है तब यह कैडर जबर्दस्त तरीके से सक्रिय हुआ. इसकी सक्रियता की बदौलत गांव-शहर के भाजपा के परंपरागत वोटर बाहर निकले. वहीं, कांग्रेस का कैडर इस मुगालते में था कि हमारी सरकार बनने जा रही है. इस वजह से संगठन निष्क्रय सा रहा. 

धर्मेंद्र प्रधान के रूप में एक प्रभावी रणनीतिक समन्वय

BJP-JDU और सहयोगी दलों के बीच चुनाव प्रबंधन, उम्मीदवार चयन और ग्राउंड-कोऑर्डिनेशन को streamline करने में धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका अहम रही.

विपक्षी आत्मविश्वास, जरूरत से ज़्यादा

कहते हैं चुनाव में सबसे खतरनाक चीज़ ‘पक्का भरोसा’ होती है. महागठबंधन को जीत का भरोसा इतना पक्का हो गया कि ज़मीनी तैयारी उतनी मजबूती से नहीं दिखी. कैंडिडेट सिलेक्शन से लेकर फ्रेंडली फाइट तक...इनमें गहराई का जबर्दस्त अभाव था.

कुल मिलाकर महागठबंधन की परफॉरमेंस को लेकर कहा जा सकता है कि बाकी तो ठीक है लेकिन वीआईपी पार्टी के डिप्टी सीएम उम्मीदवार मुकेश सहनी को अभी और भी अभी इंतजार करना होगा. यानी वे फिर आम ही बने रहेंगे हालांकि उनकी पार्टी जरूर VIP है.

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ANUJ KHARE

अनुज खरे Zee Media के डिजिटल विंग IDPL के ग्रुप एडिटर हैं. उन्हें डिजिटल और प्रिंट मीडिया में काम करने का 25 साल से ज्यादा का तजुर्बा है. ग्रुप में उनकी ये दूसरी पारी है. इससे पहले वे आजतक, दैनिक भ...और पढ़ें

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