RJD Bihar Election Defeat Reason: बीजेपी ने आरजेडी के 52 यादव उम्मीदवार मैदान में उतारने को लेकर जातिवाद को लेकर बड़ा कैंपेन छेड़ दिया और पूरे चुनाव के दौरान आरजेडी और यादव राज का नैरेटिव चलाया. बीजेपी का ये कैंपेन उन लोगों को छू गया जिन्होंने बिहार में 2005 से पहले का लालू राज देखा था.
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Why RJD Loss in Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा चुनाव के रूझानों में अब एनडीए की जीत सुनिश्चित दिखाई देने लगी है. अगर हम पिछले चुनाव साल 2020 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो आरजेडी महज कुछ हजारों के अंतर से ही एनडीए से पीछे रह गई थी. ऐसे मे इस बार उम्मीद लगाई जा रही थी कि महागठबंधन पिछली बार के उस अंतर को पाट कर बिहार की सत्ता हासिल कर लेगा. लेकिन चुनाव परिणाम के दिन तो कहानी कुछ और ही दिखाई दे रही है. अब तक के नतीजों में एनडीए लगभग 200 सीटों पर काबिज होती दिखाई दे रही है. बीजेपी 95, जेडीयू 84, एलजेपी राम विलास पासवान 20, हम 5 सीटों पर और आरएलएम 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. वहीं आरजेडी महज 24 सीटों पर संघर्ष करती हुई दिखाई दे रही है. बिहार में आखिर जो पार्टी और जो नेता चुनाव के दिन तक एनडीए को बड़ी टक्कर देने का दावा कर रहा था वो अचानक कैसे धराशायी हो गया? आइए आपको बताते हैं बिहार में आरजेडी की हार के 5 बड़े कारण
टिकट बंटवारे में RJD-कांग्रेस की रार
बिहार विधानसभा चुनाव के प्रचार शुरू होने से पहले ही टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और आरजेडी में रार शुरू हो गई थी. चुनाव के ऐलान के बाद पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख से एक दिन पहले तक दोनों दलों में सीट शेयरिंग को लेकर रणनीति तय नहीं कर पाए. कई सीटों पर आरजेडी और कांग्रेस दोनों ने उम्मीदवार उतार दिए थे. एनडीए ने उनके बीच हुए इस तनाव को भरपूर फायदा उठाया और उसी समय अपने सहयोगी दलों के साथ सीट शेयरिंग का अनाउंसमेंट कर दिया. आरजेडी और कांग्रेस के बीच मची रार से जनता ने भी इनसे किनारा करना ही बेहतर समझा.
RJD को सिर्फ यादवों पर भरोसा, उतारे 52 यादव उम्मीदवार
बिहार चुनाव में आरजेडी की हार के पीछे की एक बड़ी वजह ये भी रही कि इस बार आरजेडी ने महागठबंधन का नेतृत्व करते हुए यादव बिरादरी के 52 उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. इससे बिहार की अन्य जातियों में ये साफ मैसेज चला गया कि आरजेडी सिर्फ और सिर्फ अपनी यादव बिरादरी का भला चाहती है. उनके इस फैसले ने जनता की नजरों में आरजेडी को जातिवादी पार्टी साबित कर दिया और बिहार की जनता ने उनसे मुंह फेर लिया. चूंकि बिहार में जातिवाद की राजनीति चलती है ऐसे में बिहार में सबसे बड़ा वोट बैंक यादव बिरादरी का है. बिहार की कुल आबादी का 14 फीसदी वोट यादव समाज से है ऐसे में 144 सीटों में से 52 यादवों (36%) को टिकट देने से बिहार की जनता को यादव राज की धमक दिखाई देने लगी थी जिससे जनता आरजेडी से दूर हुई.
BJP ने चलाया चुनाव प्रचार में जातिवाद का नैरेटिव
बीजेपी ने आरजेडी के 52 यादव उम्मीदवार मैदान में उतारने को लेकर जातिवाद को लेकर बड़ा कैंपेन छेड़ दिया और पूरे चुनाव के दौरान आरजेडी और यादव राज का नैरेटिव चलाया. बीजेपी का ये कैंपेन उन लोगों को छू गया जिन्होंने बिहार में 2005 से पहले का लालू राज देखा था. ऐसे में जनता आरजेडी के उस भयावाह शासन को याद कर डर गई और महागठबंधन से किनारा कर एनडीए की ओर मुड़ गई.तेजस्वी के इस फैसले से बिहार के कुर्मी और मौर्या वोट खिसक गए जो महागठबंधन की ओर चले गए.
आरजेडी ने सहयोगी दलों को हल्के में लिया
बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी की अनुभवहीनता और उनका बड़बोलापन उन्हें ले डूबा. तेजस्वी की रणनीति में सबसे बड़ा चूक ये था कि उन्होंने बिना चुनाव लड़े ही सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी को मान लिया था. उन्होंने कांग्रेस सहित अन्य सहयोगी दलों को लगातार दरकिनार रखा और पूरे चुनाव में अपनी ही मनमानी करते रहे. नतीज सबके सामने है. तेजस्वी और राहुल गांधी के सीट शेयरिंग विवादों ने महागठबंधन को कमजोर किया. इससे विपक्ष के बीच दूरी दिखाई दी और जनता ने इनसे बेहतर विकल्प के तौर पर एनडीए को लिया.
RJD ने मेनीफेस्टो के समय भी सबको दरकिनार किया
आरजेडी ने महागठबंधन के मेनीफेस्टो में भी अपनी मनमानी की और जहां कांग्रेस ने 'गारंटी' मेनिफेस्टो पर जोर दिया था तो वहीं तेजस्वी ने 'नौकरी देंगे' पर प्राथमिकता दी. यह बात अन्य सहयोगियों को खराब लगी. इतना ही नहीं तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के मेनिफेस्टो का नाम भी 'तेजस्वी प्रण' रखा था. इसके बाद तो महागठबंधन के नेता एकदम से दरकिनार हो चुके थे. वहीं रैलियों में राहुल गांधी की तस्वीरें कम और तेजस्वी की ज्यादा दिखाई दीं. जो तेजस्वी यादव के अहंकार को साफ दिखाता है. उनकी हार के पीछे ये भी एक बड़ी वजह रही.
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