झारखंड: रोजी-रोटी की तलाश में बूढ़ा पहाड़ गए 11 परिवार, नक्सलियों ने लौटने पर लगाया 'ब्रेक'

इस लिहाज से करीब 35 परिवारों को पुलिस ने पहाड़ से नीचे उतार कर उन्हें विस्थापित करार दिया, लेकिन 11 परिवार ऐसे हैं जो रोजी-रोटी की तलाश में महुवा चुनने पहाड़ पर तो गए, पर वापस नहीं आए.

झारखंड: रोजी-रोटी की तलाश में बूढ़ा पहाड़ गए 11 परिवार, नक्सलियों ने लौटने पर लगाया 'ब्रेक'
बूढ़ा पहाड़ पर आज भी चलता है नक्सलियों का फरमान.

गढ़वा: झारखंड में सारंडा का जंगल, झुमरा पहाड़, गढ़वा और लातेहार नक्सलियों का पनाहगाह माना जाता है, क्योंकि यंहा करोड़ो खर्च कर कई नक्सली उन्मूलन अभियान चलाए गए, लेकिन नतीजा सिफर रहा.

गढ़वा में यह नतीजा इसलिए सिफर रहा क्योंकि नक्सलियों की खत्मा के उद्देश्य विस्थापितों को बूढ़ा पहाड़ से उतारा गया था, लेकिन कुछ परिवार पुनः बूढ़ा पहाड़ वापस चले गए.

दरअसल, तीन साल पहले तत्कालीन राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ सरकार से बूढ़ा पहाड़ से नक्सलियों के पूर्ण खात्मा को लेकर बातचीत की थी. साथ ही पहाड़ की घेराबंदी भी की थी, लेकिन समस्या ये थी कि उपर बसे ग्रामीणों को बचाया जाए जिसके आड़ में नक्सली हमेशा बचते रहे हैं.

इस लिहाज से करीब 35 परिवारों को पुलिस ने पहाड़ से नीचे उतार कर उन्हें विस्थापित करार दिया, लेकिन 11 परिवार ऐसे हैं जो रोजी-रोटी की तलाश में महुवा चुनने पहाड़ पर तो गए, पर वापस नहीं आए, क्योंकि नक्सलियों के फरमान के आगे इनकी चली नहीं और वे वहीं रूक गए.

हालांकि, 14 परिवारों को अपना घर मिला तो सात परिवारों को जमीन का पट्टा भी मिल गया. इधर, बूढ़ा पहाड़ से विस्थापित ग्रामीणों का कहना है कि ये लोग महुवा चुनने गए और नक्सलियों ने इन्हें रोक लिया तब से ये लोग नहीं आए हैं. ऐसे में अब इन लोगों के सामने यही स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि ऊपर जाएंगे तो नक्सली और पुलिस दोनों तरफ से जाएंगे.