बिहार: कचरा से बिजली बनाने की योजना हुई फेल, अब कचरे से मिट्टी बनाएगी सरकार

 पटना से हर दिन निकलनेवाले 700 टन कचरे के निपटारे के लिए सरकार ने कई कंपनियों के साथ समझौते किये. लेकिन सभी कंपनियों ने जमीन पर कुछ काम नहीं किया.

बिहार: कचरा से बिजली बनाने की योजना हुई फेल, अब कचरे से मिट्टी बनाएगी सरकार
पटना से हर दिन लगभग 700 टन कचरा निकलता है जिनका निस्तारण करना सरकार के लिए सिर दर्द है.

पटना: बिहार की राजधानी पटना का कचरा सरकार के लिए सरदर्द बन चुका है. पटना से हर दिन निकलनेवाले 700 टन कचरे के निपटारे के लिए सरकार ने कई कंपनियों के साथ समझौते किये. लेकिन सभी कंपनियों ने जमीन पर कुछ काम नहीं किया. कंपनियों के भरोसे सरकार भी कचरा से बिजली उत्पादन का सपना देख रही थी. लेकिन सपना अब टूट चुका है. अब सरकार ने कचरे को मिट्टी में तब्दील करने की नयी योजना पर काम करने का फैसला लिया है.

ये पहला मौका है जब पटना से निकला लाखों टन कचरा बिहार सरकार के लिए सरदर्द बन गया है. कचरे के सही निस्तारण के लिए सरकार 2016 से प्रयास कर रही है. लेकिन प्रयास सिर्फ प्रयास बनकर रह जा रहा है. पटना से हर दिन लगभग 700 टन कचरा निकलता है. इतने बडे पैमाने पर निकलनेवाले कचरे का सही निस्तारण किसी चुनौती से कम नहीं. 

साल 2018 में कचरे के निस्तारण के लिए अमेरिका बेस्ड कंपनी एजी डाटर ने पटना नगर निगम के साथ समझौता किया. समझौते के तहत कंपनी को हर दिन 790 रुपये प्रति टन के हिसाब से कचरा पटना नगर निगम से खरीदना था. इसके बदले कंपनी कचरे से बिजली, डीजल और पानी का उत्पादन करती. जिसे पटना में ही खपत किया जाता. जिससे कंपनी को आमदनी होती. कंपनी को 1 अक्टूबर तक अपने प्लांट पटना के बैरिया में लगा लेने थे. लेकिन प्लांट का एक ईंट भी कंपनी नहीं लगा सकी. मजबूरन सरकार ने कंपनी के साथ अपना समझौता रद्द करने का फैसला लिया है.

बिहार सरकार के नगर विकास मंत्री सुरेश शर्मा कहते हैं कि कंपनी ने अबतक अपना काम शुरु नहीं किया है. जानकारी के मुताबिक कंपनी को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय से काम की अनुमति ही नहीं मिली है.  जबकि एक साल बीतने को हैं. अब हम ये योजना बना रहे हैं कि कचरे को केमिकली गलाकर उससे मिट्टी ही तैयार कर ली जाए. कई शहरों में ऐसी योजना पर काम हो रहा है. मुजफ्फरपुर में भी योजना पर काम चल रहा है. पटना से बडे पैमाने पर निकलनेवाला कचरा वाकई बडी चुनौती है.    

ये पहला मौका नहीं है जब सरकार ने कचरे के निस्तारण के लिए किसी कंपनी के साथ समझौता किया और कंपनी योजना को जमीन पर उतारने में फेल हो गयी. साल 2016 में भी सरकार ने कचरे के निस्तारण के लिए सबसे पहले सुनील इन्फ्राटेक नाम की कंपनी के साथ समझौता किया था. समझौते के तहत कंपनी को कचरे से बिजली उत्पादन करना था. जिसका इस्तेमाल पटना और उसके आसपास के इलाकों में होता. 

कंपनी ने कचरे के निष्तारण के लिए सरकार के साथ एक शर्त भी रखी. कंपनी ने कचरा घर से लाने से लेकर डंपिंग यार्ड तक कचरा पहुंचाने को लेकर सरकार से टीपिंग चार्ज भी वसूल किया. लेकिन कंपनी कचरा से बिजली उत्पादन करने में असफल रही. सरकार ने कंपनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया.

इधर पटना के बैरिया में कचरे का अंबार लगातार बढता जा रहा है. चूंकि पटना की जमीन काफी कीमती है इसलिए बैरिया कचरा डंपिंग प्वाईंट के आसपास घनी आबादी भी बस चुकी है. इलाके के लोग कहत हैं कि कचरे के अंबार के कारण उन्हें काफी कठिनाईयों का सामना करना पर रहा है. कचरे को लेकर जब वो विरोध करते हैं तो नगर निगम की तरफ से उन्हें केस करने की धमकी दी जाती है. बरसात के वक्त तो तीन महीने तक वो लोग घर से निकल भी नहीं पाते हैं.

कचरा प्रबंधन के लिए कोई ठोस रास्ता नहीं निकलपाने के कारण विपक्ष ने भी सरकार को आडे हाथों लिया है. आरजेडी विधायक राहुल तिवारी कहते हैं कि सरकार के पास कोई विजन ही नहीं है. सरकार पर्यावरण को लेकर झूठी चिंता जता रही है. जबकि कचरा के नाम पर पर्यावरण के साथ बडा खिलवाड किया जा रहा है.