तिल और कुशा में ऐसा क्या है जो पूर्वजों को दिला देते हैं मोक्ष, बक्सर में छिपा है उत्तर
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तिल और कुशा में ऐसा क्या है जो पूर्वजों को दिला देते हैं मोक्ष, बक्सर में छिपा है उत्तर

तर्पण किए जाने में तिल और कुशा का प्रयोग सबसे जरूरी होता है. बिहार का बक्सर जिला उन प्राचीन नगरियों में से एक है जिनकी उत्पत्ति सृष्टि की रचना के साथ हुई थी. तिल और कुशा के महत्व की कहानी इसी प्राचीन नगरी से जुड़ी हुई है.

तिल और कुशा में ऐसा क्या है जो पूर्वजों को दिला देते हैं मोक्ष, बक्सर में छिपा है उत्तर

Buxar: श्राद्ध पक्ष का समय चल रहा है. ये पूरे 15 दिन पितरों-पूर्वजों को याद करने के दिन हैं. सनातन परंपरा का ये रिवाज इस एक सत्य को बहुत बारीकी से स्पष्ट करता है कि हम कितने भी आगे क्यों न बढ़ जाएं, हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए. श्राद्ध कल्प विधान यह भी बताता है कि भविष्य की ओर देख रहे वर्तमान को भूतकाल की उंगलियां भी थामकर रखनी चाहिए. यह बेहद जरूरी है जीवन के लिए उपयोगी अनुभव भी देता है. ऐसे में पितरों के लिए तर्पण की क्रिया बेहद जरूरी हो जाती है.

बक्सर का है पौराणिक महत्व
तर्पण किए जाने में तिल और कुशा का प्रयोग सबसे जरूरी होता है. कहते हैं कि ये दोनों ही वस्तुएं पूर्वजों की आत्माओं को सीधे मोक्ष की ओर ले जाती हैं. युगों से चली आ रही ये परंपरा एक सवाल भी साधती है कि आखिर इन दोनों वस्तुओं में ऐसा क्या है जो इनका प्रयोग मोक्ष की राह दिखाता है. इसका उत्तर पौराणिक आख्यानों में मिलता है. बिहार का बक्सर जिला उन प्राचीन नगरियों में से एक है जिनकी उत्पत्ति सृष्टि की रचना के साथ हुई थी. बक्सर का प्राचीन नाम व्याघ्रसर है. इसके अलावा अलग-अलग युगों में इसे वेदगर्भा और बामनाश्रम भी कहा गया है.

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वाराह अवतार से है कुश की उत्पत्ति
इसी बक्सर का एक इतिहास श्रीहरि विष्णु के वाराह अवतार से भी जुड़ा हुआ है. एक बार सतयुग में हिरण्याक्ष नाम के राक्षस ने धरती को चुरा लिया और सागर तल में जाकर छिपा दिया. ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लिया. यह मोटी खाल और मोटे रोएं वाला जंगली शूकर का पशु रूप अवतार था. भगवान विष्णु धरती पर अवतरित होकर आए. इसके बाद पाताल जाने के लिए उन्होंने एक सर यानी तालाब का चयन किया.

वराह अवतार के धरती पर गिरे रोम
मान्यता है कि बक्सर क्षेत्र में एक प्राचीन तालाब से ही पाताल का मार्ग था. हालांकि यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है. किवदंती है कि वाराह अवतार ने यहां से पाताल प्रवेश किया. उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर दिया और पृथ्वी को अपनी सींग पर टिकाकर बाहर निकले. इस दौरान उनके शरीर के कुछ मोटे रोम धरती पर गिर गए. कहा जाता है कि इन्हीं से बाद में कुशा की उत्पत्ति हुई है. हालांकि यही कथा उत्तर प्रदेश के जिले बाराबंकी और सीतापुर के लिए भी कही जाती है.

कुशा सबसे पवित्र घास मानी जाती है. यह मोटी, धारदार और खुरदुरी होती है. पितरों को इसके जल से पानी दिया जाता है तो वह तृप्त होकर मोक्ष प्राप्त करते हैं.

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तिल की उत्पत्ति की कथा
इसी तरह तिल की उत्पत्ति का भी पौराणिक कथाओं में जिक्र है. कहते हैं कि जब हिरण्य कश्यप अपने पुत्र प्रहलाद पर लगातार अत्याचार कर रहा था तो यह देखकर भगवान विष्णु क्रोध से भर उठे. गुस्से में उनका सारा शरीर पसीने से भर गया. यह पसीना जब जमीन पर गिरा तब तिल की उत्पत्ति हुई. तिल को गंगाजल के ही समान पवित्र माना गया है. माना जाता है कि जिस तरह गंगा जल का स्पर्श मृत आत्माओं को वैकुंठ के द्वार तक पहुंचा देता है ठीक इसी तरह तिल भी पूर्वजों, भटकती आत्माओं और अतृप्त जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाता है. अगर आप गया जा रहे हैं और पूर्वजों का श्राद्ध कर रहे हैं तो तिल और कुशा के इस महत्व को जान लेना आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगा.

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