बोकारो : 70 वर्षों में नहीं मिला न्याय, वस्थापितों ने दी हथियार उठाने की धमकी

संकल्प के दौरान विस्थापित नौजवान संघर्ष मोर्चा की केंद्रीय कमेटी की बैठक में सभी पदाधिकारी और सभी शाखा को अधिकारी उपस्थित थे. 

बोकारो : 70 वर्षों में नहीं मिला न्याय, वस्थापितों ने दी हथियार उठाने की धमकी
बोकारो में विस्थापितों ने हथियार उठाने की धमकी दिया है.

बोकारो : सत्तर वर्ष के बाद भी बोकारो में विस्थापितों को न्याय नहीं मिला है. अब विस्थापित हथियार उठाने की बात कह रहे हैं. उनका कहना है कि 15 अगस्त से वे हथियार उठा लेंगे. उनका कहना है कि 'करो या मरो' की स्थिति में विस्थापित अपना भी बलिदान दे देंगे. बोकारो में विस्थापित नौजवान संघर्ष मोर्चा के बैनर तले यह संकल्प लिया गया है.

संकल्प के दौरान विस्थापित नौजवान संघर्ष मोर्चा की केंद्रीय कमेटी की बैठक में सभी पदाधिकारी और सभी शाखा को अधिकारी उपस्थित थे. 

बैठक की अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय अध्यक्ष अरुण कुमार महतो ने कहा कि विस्थापित नौजवान संघर्ष मोर्चा के सभी पदाधिकारियों ने निराशा में गोता लगाते हुए 15 अगस्त को 'करो या मरो' की तर्ज पर हथियार उठाने और विस्थापन विरोधी अधिकारियों को चिन्हित कर शहादत देने का निर्णय लिया है. आंदोलन 15 अगस्त से निरंतर जारी रहेगा.

उनका कहना है कि जब तक बीएसएल प्रबंधन विस्थापितों के नियोजन को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाती है, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा. विस्थापित नौजवान संघर्ष मोर्चा विस्थापितों की सीधी नियुक्ति करने सहित अन्य मांगों को लेकर विगत कई वर्षों से उग्र आंदोलन कर रहा है, लेकिन बीएसएल प्रबंधन के कानों में जूं तक नहीं रेंग रहा है.

विस्थापितों की समस्या को लेकर कई बार जिला प्रशासन की अगुवाई में बीएसएल प्रबंधन और मोर्चा के पदाधिकारियों के साथ त्रिपक्षीय बैठक हुई. कई बार बीएसएल प्रबंधन के साथ त्रिपक्षीय बैठक हुई, लेकिन बीएसएल प्रबंधन ने विस्थापितों की समस्या को कभी भी गंभीरता पूर्वक नहीं लिया. अपनी मनमानी करते रहे. मोर्चा द्वारा आंदोलन के क्रम में बीएसएल सेल प्रबंधन द्वारा हमेशा उच्च स्तरीय पदाधिकारियों से वार्ता कराने और विस्थापितों की समस्या का समाधान करने की बात कहते हैं.

आज तक कभी भी उच्च स्तरीय पदाधिकारियों से ना तो वार्ता हुई और ना ही समस्या का कोई समाधान हुआ है. बीएसएल प्रबंधन की गलत नीति के कारण बोकारो के  युवा विस्थापित दूसरे राज्य पलायन कर गए. आज भी पलायन कर रहे हैं. कुछ रोजगार के लिए दर-दर की ठोकर खाते आ रहे हैं.