कोरोना काल के बाद झारखंड में बढ़ सकता है बाल श्रम, रोकने के लिए उठाने होंगे कदम

लॉकडाउन ने झारखंड जैसे राज्‍यों की स्थिति को और विकट कर दिया है, जो चाइल्ड ट्रैफिकिंग के दृष्टिकोण से अत्‍यधिक संवेदनशील हैं. लॉकडाउन लागू होने से प्रवासी श्रमिक अपने-अपने राज्‍यों में लौट चुके हैं. 

कोरोना काल के बाद झारखंड में बढ़ सकता है बाल श्रम, रोकने के लिए उठाने होंगे कदम
चाइल्ड ट्रैफिकिंग के दृष्टिकोण से झारखंड अत्‍यधिक संवेदनशील है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

रांची: कोरोना महामारी ने लोगों के सामने स्वास्थ्य संकट के साथ-साथ आर्थिक संकट भी पैदा कर दिया है. लॉकडाउन ने झारखंड जैसे राज्‍यों की स्थिति को और विकट कर दिया है, जो चाइल्ड ट्रैफिकिंग के दृष्टिकोण से अत्‍यधिक संवेदनशील हैं. लॉकडाउन लागू होने से प्रवासी श्रमिक अपने-अपने राज्‍यों में लौट चुके हैं. गांव में उनके पास रोजी-रोजगार का कोई साधन नहीं हैं. उन्‍हें अभाव और भुखमरी के दौर से गुजरना पड़ रहा है. 

इधर लॉकडाउन की वजह से पैदा हुए वित्तीय घाटे से उबरने के लिए फैक्ट्री और कारखाना मालिक सस्ते श्रम की तलाश करने लगे हैं. बड़ों की बजाए वो बच्चों को काम पर रखने को प्राथमिकता देंगे. ऐसे में गरीबी से जूझ रहे लोग अपने बच्चों को बाल श्रम करवाने के लिए मजबूर होंगे. इन हालातों में बाल दुर्व्‍यापार की आशंका सबसे ज्‍यादा बढ़ गई है.
 
झारखंड की स्थिति यह है कि लॉकडाउन के दौरान साढ़े सात लाख प्रवासी श्रमिक राज्‍य लौट चुके हैं. वापस आए श्रमिक अपने साथ बाल दुर्व्‍यापार के खतरे भी लाए हैं. गांवों में उन्‍हें काम नहीं मिल रहा है, जिस वजह से उनके सामने भुखमरी की समस्‍या पैदा हो गई है. उन्‍हें जीवन जीने के लिए मजबूरी में दुर्व्यापारियों, साहूकारों और सूदखोरों से ऊंची ब्‍याज दरों पर कर्ज लेने पड़ रहे हैं और अगर ऐसे ही लॉकडाउन के चलते काम धंधे ठप रहे, तो वे कर्ज के बोझ से और लद जाएंगे.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार झारखंड में 2018 में मानव दुर्व्‍यापार के 373 मामले दर्ज किए गए, जो देश में सबसे अधिक था. 373 मामलों में नाबालिग लड़कियों की संख्‍या 314 थी. गैरसरकारी संस्थाओं की मानें तो हर साल झारखंड से तकरीबन 20 हजार बच्चों का दुर्व्यापार कर उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है. इनमें ज्यादातर लड़कियां होती हैं. दुर्व्यापार के शिकार बच्चों का इस्तेमाल जबरिया बाल मजदूरी, भीखमंगाई, बाल वेश्यावत्ति, सेक्‍स टूरिज्‍म, पोर्नोग्राफी, अवैध अंग व्यापार आदि अवैध धंधों में किया जाता है. 

झारखंड में अगर समय रहते ध्‍यान नहीं दिया गया और राज्‍य मशीनरी को दुरूस्‍त नहीं किया गया, तो स्थिति बेकाबू हो सकती है. इसके लिए सबसे पहले बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करने और निगरानी रखने वाले झारखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (जेएससीपीसीआर) जैसे महत्वपूर्ण निकाय में अध्यक्ष एवं सभी सदस्यों के जो पद खाली पड़े हैं, उन्‍हें फौरन भरने होंगे.

झारखंड में 250 ग्राम स्‍तरीय बाल संरक्षण समितियां हैं. ऐसी निगरानी समितियों को पूरे राज्य में कार्यान्वित करने की जरूरत है. जिला बाल कल्याण समितियों (डीसीडब्‍ल्‍यूसी) में भी कई पद खाली पड़े हैं. इनको भी भरने की जरूरत है. जेएससीपीसीआर और डीसीडब्‍ल्‍यूसी का पुनर्गठन राज्‍य में बाल दुर्व्‍यापार और बाल श्रम पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है. संपूर्णा बेहुरा की एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने भी बच्चों का शोषण रोकने के लिए राज्यों को बच्चों के संरक्षण वाली संस्थाओं के खाली पदों को फौरन भरने का निर्देश दिया है.  

नोबेल शांति विजेता कैलाश सत्‍यार्थी अब तक बच्चों को बाल श्रम से मुक्ता करवा चुके हैं. उनके नेतृत्‍व में बाल हिंसा के खिलाफ निकाली गई “भारत यात्रा” में चाइल्ड ट्रैफिकिंग को खत्‍म करने के लिए जो व्‍यापक और मजबूत कानून बनाने की मांग की गई थी, उस पर भी ध्यान देना होगा ताकि बच्‍चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए संसद के दोनों सदनों में ट्रैफिकिंग इन पर्सन्‍स (प्रिवेंशन, प्रोटेक्‍शन और रीहैबिलिटेशन) बिल 2018 को पास किया जा सके.