सीवान: दो सालों में बढ़ी है मिट्टी के दीयों की डिमांड, लेकिन पैसे नहीं मिलने से कुम्हार परेशान

मैरवा के कुम्हार मोहल्ले में सुबह से लेकर रात तक मिट्टी के दीये, खिलौने और अन्य सामान बनाने में जुट गए हैं. दीपोत्सव में मिट्टी के दीप महत्वपूर्ण माने जाते हैं. जिसे बनाने का कार्य कुम्हार करते हैं और सैकड़ों मिट्टी के दीप बनाते हैं ताकि दीपोत्सव में हर घर में दीप जलाए जा सके.   

सीवान: दो सालों में बढ़ी है मिट्टी के दीयों की डिमांड, लेकिन पैसे नहीं मिलने से कुम्हार परेशान
कुम्हार व्यवसाय में इतनी आमदनी नहीं हो पाती कि वो जीवन यापन करें.

सीवान: दीपावली को लेकर कुम्हार मिट्टी के दीए, करवे और खिलौने बनाने में जुट गए हैं. मैरवा के कुम्हार मोहल्ले में सुबह से लेकर रात तक मिट्टी के दीये, खिलौने और अन्य सामान बनाने में जुट गए हैं. दीपोत्सव में मिट्टी के दीप महत्वपूर्ण माने जाते हैं. जिसे बनाने का कार्य कुम्हार करते हैं और सैकड़ों मिट्टी के दीप बनाते हैं ताकि दीपोत्सव में हर घर में दीप जलाए जा सके. 

लेकिन पिछले दो सालों से लोगों द्वारा चीनी सामानों से दूरी कुम्हारों के लिए फ़ायदेमंद रहा है. इलेक्ट्रॉनिक चकाचौंध के इस युग में तरह-तरह के जगमग रोशनी के साधनों से मिट्टी के दीए का वर्चस्व कायम तो है, लेकिन इससे कुम्हारों का जीवन यापन नहीं हो पा रहा. कुम्हार व्यवसाय में इतनी आमदनी नहीं हो पाती कि मिट्टी के दीये व अन्य चीजे बनाकर जीविकोपार्जन किया जा सके.

फिर भी पूर्वजों की परंपरा को बनाए रखने के लिए दीपावली के समय दीपक बनाने के काम के पीछे मन में यही सोच रहती है कि दीया कुछ घरों को रोशनी करने के साथ माता लक्ष्मी को समर्पित होगी. मैरवा निवासी लालबाबू प्रजापति ने बताया कि वह पिछले तीन माह से दीपावली में घर-घर रोशनी पहुंचाने के लिए दीयों के साथ बच्चों के लिए खिलौने बनाने के लिए पूरे परिवार के साथ लगा हुआ है. बारिश के कारण दिए नहीं बन पाए और इन्हें सुखाने में भी समय लगता है.

मिट्टी को तरासने और उससे दीयों के अलावा मिट्टी के बर्तन, खिलौनें बनाने में परिवार को काफी मेहनत करनी पड़ती है. उन्हें धूप में सुखाने के बाद रंग कर आग में पकाना पड़ता है. इसके बाद भी सही कीमत नहीं मिल पाती है. पूरा परिवार इस काम में लगा रहता है. इस दौर में मेहनताना निकालना भी मुश्किल है. इस बार दीवाली मे छोटे दीये 100 सैकड़ा दीए की कीमत रहेगी. वहीं, इन पर रंग रोगन और सजावट करने के बाद बाजार दुकानदार 50 से 60 रुपए में बेचता है. 

लेकिन मजदूर को तो सिर्फ पांच रुपए ही मिलता है. दीपावली आते-आते मांग बढ़ जाती है. लेकिन इसका फायदा वही लोग उठा पाते हैं, जो स्टॉक पहले से कर लेते हैं. चाइनीज लाइटों के आगे फीकी पड़ी दीयों की रोशनी दिनेश प्रजापति ने बताया कि हाल के वर्षों में मिट्टी के सामान की मांग में आई कमी के चलते कुम्हारों की रुचि लगातार इस पेशे में घटती जा रही है

उन्होंने कहा कि पहले दीपावली के समय बड़ी संख्या में मिट्टी के दीपों सामान का कारोबार होता था. लेकिन अब मिटटी के सामान दीयों का बाजार लगातार मंदा होता जा रहा है. अब चाइनीज इलेक्ट्रानिक लाइट, इलेक्ट्रानिक दीयों सामान ने मिटटी की वस्तुओं को अंधकार में धकेल दिया है. लोग चीन के बने लाइट, दीप, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति, खिलौने आदि को ज्यादा महत्व देने लगे हैं. इससे कुम्हार समाज के लोग निराश है और धीरे-धीरे इस पेशे से मुंह मोड़ते जा रहे है.