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बिहार : बाढ़ का कहर जारी, पीड़ितों को पेट भरने के लिए करनी पड़ रही है जद्दोजहद

कहने को तो प्रशासन और सरकार द्वारा बाढ़ राहत शिविर खोले गए हैं, लेकिन यह 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रहे हैं. 

बिहार : बाढ़ का कहर जारी, पीड़ितों को पेट भरने के लिए करनी पड़ रही है जद्दोजहद
बिहार में बाढ़ पीड़ितों को हो रही है भारी दिक्कत. (तस्वीर- ANI)

मुजफ्फरपुर : बिहार के इस जिले में बहने वाली बागमती, लखनदेई और बूढ़ी गंडक नदी में इस साल भी उफान आने से लोगों की मुसीबतें बढ़ गई हैं. गांव के गांव पानी में डूबे हैं. अपनी जान बचाने के लिए लोग गांव, घर छोड़कर ऊंचे स्थानों पर पहुंच रहे हैं, लेकिन उनकी मुसीबतें यहां भी कम नहीं हो रही हैं. लोग अपनी जिंदगी को तो किसी तरह सुरक्षित कर ले रहे हैं, लेकिन सड़कों पर दिन और रात काट रहे इन लोगों को दो समय पेट भरने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. 

आशियाना के नाम पर ऐसे लोगों को पॉलीथिन से बना छप्पर सिर छिपाने के लिए कम पड़ रहा है. कहने को तो प्रशासन और सरकार द्वारा बाढ़ राहत शिविर खोले गए हैं, लेकिन यह 'ऊंट के मुंह में जीरा' साबित हो रहे हैं. 

मुजफ्फरपुर के हेसलपुर, बेनीबाद, चंदौली, चंहेंटा, बैगना गांव सहित 150 से अधिक गांव पूरी तरह जलमग्न हैं. अधिकांश गांवों में जाने वाले रास्ते पर तीन से चार फीट तक बाढ़ का पानी बह रहा है. इन गांवों के लोग मुजफ्फरपुर से गुजरने वाली पक्की सड़कों पर दिन-रात गुजार रहे हैं. कई स्थानों पर तो बाढ़ पीड़ितों के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग 'वन वे' हो गया. 

चंदौली गांव की रहने वाली संगीता देवी गर्भवती हैं. उनका घर पानी में डूब गया. बागमती नदी में आई बाढ़ के पानी ने इस गांव के तीन दर्जन से अधिक झोपड़ियां बहाकर ले गईं. अब इन परिवारों की जिंदगी खानाबदोश वाली होकर रह गई है. 

संगीता कहती हैं, "सबको ये लगता है कि इन नदियों के किनारे रहने वाले हम जैसे लोगों के लिए बाढ़ झेलना आदत है. मगर ये बात हम लोग ही जानते हैं कि हर साल बाढ़ में हम कितना कुछ खो देते हैं. इस बार तो शुरुआत में ही ये हाल है. अगले तीन महीनों में इसी तरह न जाने कितनी बार बागमती में पानी बढ़ेगा, कितनी बार कम होगा. अगले कुछ महीनों में हमारा घर बचा या नहीं बचा, फिर भी हमलोग तो दो-तीन महीने रोड पर ही रहेंगे." 

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 77 पर पॉलीथिन शीट टांगकर धूप से बचाव कर रहीं बैगना गांव की 50 वर्षीय माया देवी कहती हैं, "बाढ़ ने सब कुछ उजाड़ दिया है. हम लोग किसी तरह जी रहे हैं." 

वे कहती हैं, "अबोध बच्चों के लिए ना दूध मिल पा रहा है, ना ही बुजुर्गो के लिए दवा उपलब्ध हो पा रही है, लेकिन इसे देखने वाला कोई नहीं. सब नेता वोट मांगने आते हैं, लेकिन इस समय कोई नहीं आ रहा."

इधर, गांव के लोग जिला प्रशासन के उस दावे को भी खोखला बता रहे हैं कि राहत सामग्री बांटी जा रही है. सरकार के किसी नुमाइंदे के आने के विषय में इन ग्रामीणों से पूछा गया तो उन्होंने कहा, "अभी वोट थोड़े है. जब चुनाव होगा तो फिर वोट मांगने आएंगे." 

इस बीच, सड़क पर बनी शरणस्थली पर कुछ सामाजिक संगठन के लोग चूड़ा और गुड़ बांटने जरूर पहुंचे, लेकिन चूड़ा-गुड़ के पॉकेट भी इन बाढ़ पीड़ितों के लिए कम पड़ गए. बाद में फिर आने का वादा कर संगठन के लोग आगे चल पड़े. 

मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी आलोक रंजन घोष कहते हैं कि जिले के पांच प्रखंडों की 27 ग्राम पंचायतों के करीब एक लाख की आबादी बाढ़ से प्रभावित है. उन्होंने दावा करते हुए कहा, "राहत और बचाव के काम हर स्तर पर किए जा रहे हैं. रेस्क्यू का काम अभी भी चल रहा है. प्रभावित क्षेत्र से लोगों को निकाला जा रहा है. अस्थायी शरणस्थलियों में पहुंचाया जा रहा है. अभी तक जिले में किसी की बाढ़ से मौत नहीं हुई है."