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बिहार के शिशु मृत्यु दर में आई कमी, लड़की-लड़के के मृत्यु दर के अंतर में भी गिरावट

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के हालिया आकड़ों के अनुसार राज्य में शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों) में कमी आई है. 2012 में यह 43 था और तमाम प्रयासों के वावजूद 2013-15 तक यह 42 पर ही स्थिर था. 

बिहार के शिशु मृत्यु दर में आई कमी, लड़की-लड़के के मृत्यु दर के अंतर में भी गिरावट
पूरे भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में 33 है.

पटना: अभी हाल में ही सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के 2019 बुलेटिन  के आंकड़े बिहार के लिए बेहद ही सकारात्मक हैं. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के हालिया आकड़ों के अनुसार राज्य में शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों) में कमी आई है. 2012 में यह 43 था और तमाम प्रयासों के वावजूद 2013-15 तक यह 42 पर ही स्थिर था. 2016 में यह घट कर 38 पर आ गया था. इस बार 2017 (यह रिपोर्ट मई 2019 में प्रकाशित हुई है) में घटकर 35 पर आ गया है जो भारत के औसत से 2 पॉइंट ज्यादा है. पूरे भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में 33 है. 

लिंग आधारित मृत्यु दर के अंतर में आई कमी
बिहार के शिशु मृत्यु दर में 3 पॉइंट की कमी आई है जो एक बड़ी उपलब्धि है. इसके साथ ही लिंग आधारित मृत्यु दर के अंतर में भी कमी आई है. 2016 में लड़कों का शिशु मृत्यु दर 31 एवं लड़कियों का 46 था अर्थात 15 पॉइंट का अंतर था जो कि 2017 में घटकर 3 पॉइंट का रह गया है. एस.आर.एस के अनुसार बिहार का नवजात मृत्युम दर प्रति 1 हजार जीवित बच्चों के जन्म पर 28 से घट कर 27 हो गया है. 

पहल का पड़ा सकारात्मक प्रभाव
शिशु मृत्यु दर में आई कमी के बारे में बताते हुए यूनिसेफ के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ हुबे अली कहते हैं बिहार सरकार द्वारा यूनिसेफ के तकनीकी सहयोग से जन्म से 28 दिन तक के गंभीर रूप से बीमार बच्चों के इलाज के लिए जिलों के सदर अस्पताल में विशेष नवजात देखभाल इकाई की स्थापना की गई है. वर्तमान में बिहार में 42 एसएनसीयू है. इसमें हम एडमिट होने वाले सभी बच्चों की ट्रैकिंग करते है और डेढ़ साल तक आशा के माध्यम से उनकी निगरानी की जाती है. 

2017 में माननीय मुख्मंत्री के द्वारा सभी 38 जिलों में विशेष नवजात देखभाल ईकाई (एसएनसीयू) में कम वजन वाले शिशु खासकर लड़कियों के दाखिले में हो रहे भेदभाव को कम करने और समुदाय में लड़कियों के स्वास्थ्य संबंधित व्यवहार में परिवर्तन के लिए बेटी रक्षक रथ को पूरे राज्य में रवाना किया गया था. इसके अतिरिक्त आशा रिसोर्से सेण्टर के साथ मिलकर सभी ब्लाक मोबिलाइजेशन कोऑर्डिनेटर की आशाकर्मियों को एसएनसीयू में लड़कियों के दाखिले को बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण करवाया गया था. 

इन सब गतिविधियों के बाद एसएनसीयू में हमारा बेड बेड आक्युपेंशी रेट (100 में से कुल भरी हुए सीट ) बढ़ा है 2016 में ये 57 प्रतिशत से बढ़ कर 81 प्रतिशत हो गया है. इसका प्रभाव एसएनसीयू में लड़कियों के दाखिले पर भी हुआ है और ये 35 प्रतिशत से बढ़ कर 37.6 प्रतिशत हो गया है. इन सब पहल का सम्मिलित सकारात्मक प्रभाव सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के हालिया आकड़ों में देखने को मिलता है.

बिहार में 1 साल में अनुमानित बच्चों की मृत्यु की संख्या हुई 1 लाख से कम
2016 के आंकड़ों के अनुसार बिहार में अनुमानित 1 लाख 20 हज़ार बच्चों की मृत्यु तो जाती थी जो 2017 में घटकर यह 1 लाख 5 हजार हुआ था. हाल के आंकड़ों के अनुसार वो घट कर 95,000 हो गया है. 

मीडिया की भी भूमिका
यूनिसेफ की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता ने कहा की शिशु खासकर लड़कियों के स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता के लिए टीकू टॉक नामक एडवोकेसी गतिविधि के माध्यम से समुदाय और समाज के प्रभावशाली लोगों को विभिन्न हितधारकों को बच्चों के स्वास्थ्य, टीकाकरण के बारे में जागरूक किया गया.