बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जहानाबाद के टाउन हाल में संयुक्त किसान मोर्चा ने समागम आयोजित किया. किसानों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल हर बार चुनाव के समय उनके वोट का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन घोषणापत्र में उनकी समस्याओं को शामिल नहीं करते.
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बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है. सभी दल अपने वादों और घोषणाओं से मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. मगर इस पूरी कवायद में किसानों और खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे एक बार फिर पीछे छूटते नजर आ रहे हैं.
इसी उपेक्षा के खिलाफ जहानाबाद के टाउन हाल में संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एक किसान समागम आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में प्रदेश के लगभग हर जिले से किसान प्रतिनिधि पहुंचे. मंच से बोलते हुए किसानों ने साफ कहा कि चुनावी वादों में किसानों का नाम तक शामिल नहीं किया जाता, जबकि कृषि राज्य की रीढ़ है.
किसान नेताओं ने कहा कि राजनीतिक दल चुनाव के वक्त किसानों की मेहनत और उनके वोट की ताकत का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन घोषणापत्र में उनकी समस्याओं को शामिल करना जरूरी नहीं समझते. उन्होंने कहा कि यह रवैया किसानों के योगदान का सीधा अपमान है.
समागम में यह भी तय किया गया कि इस बार किसान चुप नहीं बैठेंगे. वे एकजुट होकर उन्हीं दलों का समर्थन करेंगे जो उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनेंगे और समाधान का आश्वासन देंगे. किसानों ने चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो वे मतदान के जरिए दलों को सबक सिखाएंगे.
किसानों का यह ऐलान स्पष्ट संकेत है कि अब वे सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि राजनीतिक मंचों पर भी सक्रिय भूमिका निभाएंगे. उनकी यह एकजुटता आने वाले चुनाव में नतीजों को प्रभावित कर सकती है और बिहार की राजनीति में किसानों की अहमियत को फिर से सामने ला सकती है.
इनपुट- मुकेश कुमार
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