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जयप्रकाश नारायण: बिहार के इस 'बूढ़े आदमी' ने हिला दी थी इंदिरा गांधी की सत्ता

हिंदी के बड़े कवि दुष्यंत कुमार ने कभी जेपी के लिए लिखा था, 'एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूं कहे इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है.'

जयप्रकाश नारायण: बिहार के इस 'बूढ़े आदमी' ने हिला दी थी इंदिरा गांधी की सत्ता
जयप्रकाश नारायण 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सिताब दियारा में हुआ था. (फाइल फोटो)

राजेश कुमार

करीब 45 साल पहले बिहार एक बड़े आंदोलन का साक्षी बना. राजनीतिक बदलाव की एक ऐसी आग जली, जिसका केन्द्र तो पटना था, लेकिन इसकी चिंगारी देशभर में जल रही थी. पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक, हर कोई इस राजनीतिक यज्ञ की आहूति में शामिल था. केन्द्र की सरकार लोकतंत्र से परे हटकर व्यवहार कर रही थी. आजादी के आंदोलन से उपजे मूल्य महज कुछ वर्षों में ही तार-तार होते नजर आ रहे थे. मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार छीन लिए गए थे. ऐसे में बिहार की धरती से एक ऐसी आवाज उठी, जिसने न केवल बदलाव की उम्मीद जगाई, देश भर में नई ऊर्जा का संचार भी कर दिया. आज़ादी के बाद देश के इस सबसे बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था जयप्रकाश नारायण ने.

यूं ही नहीं जनता ने अपने प्यारे नेता को नाम दिया होगा लोकनायक. हिंदी के बड़े कवि दुष्यंत कुमार ने कभी जेपी के लिए लिखा था, 'एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यूं कहे इस अंधेरी कोठरी में एक रोशनदान है.'

भारत की लोकशाही एहसान मानती है सारण के सिताब दियारा की माटी का. अगर यहां की धरती ने 11 अक्टूबर 1902 को जयप्रकाश नारायण को जन्म नहीं दिया होता तो आजाद भारत में लोकतंत्र और आजादी का नारा महज जुमला बनकर रह जाता.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के लिए लिखा था...

लौटे तुम रूपक बन स्वदेश की
आग भरी कुरबानी का,
अब "जयप्रकाश" है नाम देश की
आतुर, हठी जवानी का।

वह सुनो, भविष्य पुकार रहा,
"वह दलित देश का त्राता है,
स्वप्नों का दृष्टा "जयप्रकाश"
भारत का भाग्य-विधाता है।"

लोकनायक का जीवन
आज़ादी के आंदोलन में उनका संघर्ष, समाजवाद की अवधारणा में यक़ीन और न्यायप्रिय समाज बनाने में उनके योगदान को देश आज भी शिद्दत से याद करता है. छपरा के रिविलगंज प्रखंड के सिताब दियारा के लाला टोला में जेपी का बचपन बीता. बचपन से ही जयप्रकाश नारायण मेधावी छात्र थे. महज 18 साल की उम्र में जेपी का विवाह बिहार के बड़े गांधीवादी नेता बृजकिशोर बाबू की पुत्री प्रभावती देवी से हुआ. 1922 में उच्च शिक्षा के लिए जयप्रकाश नारायण अमेरिका चले गए. 1922-1929 के बीच जेपी ने कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में समाज-शास्त्र का गहन अध्ययन किया.

1929 में जब जेपी अमेरिका से लौटे तो उस वक्त गांधीजी की अगुवाई में बिहार में स्वाधीनता संग्राम अपने परवान पर था. भारत लौटने पर जयप्रकाश नारायण का संपर्क पंडित जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी से हुआ. 1932 में देश के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन की अगुवाई जयप्रकाश नारायण ने की. जेपी को 1932 में मद्रास से गिरफ्तार कर लिया गया.

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब कांग्रेस के सभी बड़े नेता जेल में डाल दिए गए तो जंग-ए-आजादी में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया. उस वक्त जयप्रकाश नारायण हजारीबाग की सेंट्रल जेल से फरार हो गए और आंदोलन में नई जान आ गई.

कहते हैं 9 नवंबर की दीपालवी की रात को जेल ब्रेक की सारी भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने बनाई थी. जयप्रकाश नारायण के साथ समाजवादी दिग्गज रामनन्दन मिश्र, योगेन्द्र शुक्ला, सूरज नारायण सिंह और दो साथी थे. वे बनारस और दिल्ली होते हुए नेपाल पहुंचे, जहां उन्होंने आजाद दस्ते का गठन किया. पंजाब में चलती ट्रेन में उन्हें सितम्बर 1943 में गिरफ्तार किया गया. जब कांग्रेस नेताओँ और अंग्रेजों की बातचीत शुरू हुई तो गांधीजी ने साफ कहा डॉ लोहिया और जेपी की रिहाई के बगैर अंग्रेजों से कोई बातचीत नहीं होगी. आखिरकार जयप्रकाश नारायण को 1946 में आज़ाद कर दिया गया. आज भी आज़ादी के आंदोलन के किस्से जयप्रकाश के सहयोगी शान से सुनाते हैं.

15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान की धरती पर जो आजादी का सूरज चमका उसमें जिन लोगों ने अपनी रोशनी लगाई थी उनमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नाम अग्रणी लोगों में लिया जाता है. 1948 में ही साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने जयप्रकाश नारायण की ऐतिहासिक और रोचक जीवनी की रचना की. आज़ाद भारत में जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की, लेकिन असफल प्रयोग के बाद 1957 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया. राजनीति से संन्यास की घोषणा के बाद जयप्रकाश नारायण सर्वोदय में सक्रिय हुए. लेकिन लोगों के बीच जयप्रकाश का करिश्मा कायम रहा.

सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद भी जब जहां जिस रूप में भारतवासियों को लोकनायक की जरूरत हुई जयप्रकाश वहां पहुंच गए. चंबल में जब दस्यु गिरोह का आतंक इस कदर बढ़ गया कि लोगों का जीना मुश्किल हो गया, तो जेपी की एक अपील पर सैकड़ों कुख्यात डकैतों ने सरेंडर कर दिया.

एक बार अमर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, 'हम सब एक दमघोट कमरे में बंद थे. यदि इस आंदोलन के रूप में स्वच्छ हवा के लिए जेपी ने एक खिड़की नहीं खोली होती तो मैं स्वयं खुदकशी कर लेता.'

आज़ादी मिले डेढ़ दशक से ज्यादा का वक्त बीत चुका था. लोगों ने स्वाधीन भारत में प्रगति और उन्नती के जो ख्वाब देखे थे, वो दरकने लगे थे. राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हो रहा था. युवाओं और छात्रों का गुस्सा तत्कालीन इंदिरा सरकार के खिलाफ सिर चढ़कर बोल रहा था. ऐसे वक्त में कच्छ से लेकर कामरूप तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक लोग केवल एक नाम को नेता मानने को तैयार थे, वह नाम था लोकनायक जयप्रकाश नारायण का.

हिन्दुस्तान की मेहनतकश आबादी, सुलगते नौजवान और बेबस किसानों की पीड़ा देखकर आखिरकार जयप्रकाश नारायण ने सार्वजनिक सक्रियता की घोषणा की. 1974 में किसानों के बिहार आन्दोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की. वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे. गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया.

जयप्रकाश नारायण आज़ादी के संघर्ष के सच्चे सारथी थे. तो आज़ादी के बाद भी उन्होंने सत्ता से अलग रहकर संघर्ष का ही रास्ता ही अख्तियार करना मुनासिब समझा था. हिन्दुस्तान उनके दिल में था और अवाम के हर दर्द को वह अपना दर्द समझते थे.

जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति के 5 जून को घोषणा की
जेपी ने कहा था, 'भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, ये ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकती. क्योंकि वे इसी व्यवस्था की उपज हैं. वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, 'सम्पूर्ण क्रान्ति' आवश्यक है.' उन्होंने कहा था, 'सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां हैं. राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक क्रांति.

संपूर्ण क्रांति को लेकर जो आंदोलन चला उसमें बिहार से बड़ी तादाद में नौजवानों ने शिरकत की. ये नौजवान तब से लेकर अबतक अलग-अलग सियासी दलों से होते हुए बिहार चुनाव की धुरी बने हुए हैं. बिहार में जेपी के सेनानियों की बात करें तो ये नाम शामिल हैं.

लालू प्रसाद, अध्यक्ष, आरजेडी  
नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार
सुशील कुमार मोदी, नेता, बीजेपी
रामविलास पासवान, अध्यक्ष, एलजेपी
शरद यादव, पूर्व सांसद, राज्यसभा
रविशंकर प्रसाद, केन्द्रीय मंत्री

ये तो महज कुछ नाम भर हैं. संपूर्ण क्रांति से निकले नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है. पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने एक नहीं कई बड़ी रैलियां की. एक बार कर्फ्यू के बीच जयप्रकाश की सभा में लाखों लोग उमड़े. पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. एक लाठी जेपी को भी लगी. हालांकि नानाजी देशमुख ने लाठी का वार अपने हाथ पर ले लिया. लेकिन लाठी के उस प्रहार ने केंद्र की कुर्सी से इंदिरा गांधी को उतार दिया. गोपालदास नीरज ने लिखा, 'लाठी जो जयप्रकाश पर बरसी बिहार में... लाठी वो हर शहीद के सीने पे पड़ी है... तुमको भले लगे ना लगे और बात है... कालीख बनके देश के माथे पर लगी है....'

उसी दौरान जेपी की अगुवाई में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात का चुनाव जीत लिया. चौतरफा हमले से घबराई कांग्रेस ने 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा की. जयप्रकाश नारायण के साथ देश के करीब 600 बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. गांधी शांति प्रतिष्ठान के कमरे से लोकनायक जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार कर लिया गया. उस वक्त जेपी के साथ मौजूद थे चंद्रशेखर जो AICC के सदस्य थे बाद में देश के प्रधानमंत्री बने. जेल में जेपी की तबीयत खराब हो गई और उन्हें सात महीने बाद रिहा कर दिया गया. आखिरकार लोकतंत्र पर आपातकाल की मंडराती काली छाया को जयप्रकाश नारायण ने करारी शिकस्त दी.

मार्च 1977 के चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और मोरारजी की अगुवाई में जनता पार्टी की सरकार बन गई. शपथ की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में जनता गठजोड़ की तरफ से विजय रैली रखी गई थी, लेकिन अपनी राजनीतिक विजय के सबसे बड़े दिन जेपी विजय रैली में भाषण देने नहीं गए. वे गांधी शांति प्रतिष्ठान के अपने कमरे से निकलकर सफदरजंग रोड की एक नंबर की कोठी में गए, जहां इंदिरा गांधी रहती थीं. इंदिरा गांधी के साथ उनके सिर्फ एक सहयोगी एचवाई शारदा प्रसाद थे और जेपी के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधाकृष्ण और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी. अद्भुत मिलना था वह. मिलकर इंदिरा गांधी रोई और जेपी भी रोए. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ये लोकनायक के व्यक्तित्व का सर्वोत्तम गुण था.

8 अक्टूबर 1979 को लंबी बीमारी के बाद पटना में लोकनायक का निधन हो गया. जेपी को पूरे देश ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी. आज हालात बदल रहे हैं. लोग जेपी को याद तो करते हैं, लेकिन महज रस्म आदायगी होती है. चुनाव के दौरान या जयंती पुण्यतिथि और आपातकाल की बरसी पर ही इस बड़े नेता को याद किया जाता है.