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...जब बेटी की शादी का कार्ड लेकर पृथ्वीराज कपूर के घर पहुंचे थे रामवृक्ष बेनीपुरी

हिन्दी साहित्य में समन्वय और समाजवाद के बड़े हस्ताक्षर रामवृक्ष शर्मा का जन्म मुज़फ्फरपुर ज़िले से 38 किलोमीटर दूर बेनीपुर में हुआ था. 

...जब बेटी की शादी का कार्ड लेकर पृथ्वीराज कपूर के घर पहुंचे थे रामवृक्ष बेनीपुरी
बालपन में ही रामवृक्ष ने पूरी रामचरितमानस पढ़ ली. (फाइल फोटो)

राजेश कुमार

बिहार के कलम के सिपाहियों का जब भी जिक्र आएगा, एक लंबी सूची हमारे हाथ में होगी. इनमें वो तमाम नाम होंगे जिन्होंने साहित्य को इस क़दर समृद्ध किया, कि आज देश की बौद्धिक संपत्ति उनके बगैर अधूरी लगती है. इसी सूची में नगीने की तरह चमकने वाला एक नाम है 'माटी की मूरतें' और 'गेहूं और गुलाब' जैसी महान कृतियों के अमर रचनाकार साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी. मुज़फ्फरपुर के बेनीपुर की माटी के सपूत रामवृक्ष साहित्य के साधक थे, स्वाधीनता के सिपाही थे और कलम के योद्धा थे. बेनीपूरी जी समाजवाद के सपने को हक़ीक़त में तब्दील करने की तमन्ना रखने वाले एक जुझारू शख्सियत थे. यही वजह है कि हिन्दुस्तान के महान साहित्यकारों की कोई भी सूची बग़ैर रामवृक्ष बेनीपुरी के मुकम्मल नहीं होगी. रामवृक्ष बेनीपुरी का काग़ज़ और कलम से अटूट रिश्ता था. वे राजनीति की राह पर भी संघर्षशील थे. एक ही साथ वे साहित्यकार, निर्भीक पत्रकार, राजनीतिक कार्यकर्ता और सामाजिक आंदोलनों के अगुवा थे. 

हिन्दी साहित्य में समन्वय और समाजवाद के बड़े हस्ताक्षर रामवृक्ष शर्मा का जन्म मुज़फ्फरपुर ज़िले से 38 किलोमीटर दूर बेनीपुर में हुआ था. अपने गांव की मिट्टी से उन्हें इस क़दर लगाव था कि उन्होंने अपने नाम के आगे बेनीपुरी लगा लिया. 23 दिसंबर 1899 को एक सामान्य किसान परिवार में उनका जन्म हुआ था. बेनपुरी जब बच्चे थे तभी उनके माता-पिता का निधन हो गया. उनका पालन दादा, मामा और मौसी ने किया. बालपन में ही रामवृक्ष ने पूरी रामचरितमानस पढ़ ली. जीवन की जो कठिनाइयां उनकी रचनाओँ में झलकती है. उसे उन्होंने क़रीब से देखा था.

रामवृक्ष बेनीपुरी आज़ादी के आंदोलन में कई बार जेल गए. वे क़रीब 9 साल तक जेल में रहे लेकिन इस दौरान भी उनका रचनाक्रम चलता रहा. जब भी वे जेल से बाहर आते उनके हाथ में 2-4 पांडुलिपी होती. वे जब छपकर आती तो उनकी मशहूर रचनाएं बन जाती. बेनीपुरी जी की रचनाएं सामाजिक समस्याओं और समाजवादी चिंतन से लैस थीं. मिट्टी से क़रीब से जुड़ाव की वजह से ही बेनीपुरी जी ने 'मंगल हरवाहा' और 'सरयुग भैया' जैसी रचनाएं की. रामवृक्ष बेनीपुरी ने क़रीब 100 पुस्तकें लिखीं और कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया. अपने समय में रामवृक्ष बेनीपुरी ने साहित्यकार, पत्रकार और सामाजिक विचार को एक माला में गूंथने की कोशिश की . बेनीपुरी जी ने अम्बपाली, सीता की मां, संघमित्रा, अमर ज्योति, तथागत, शकुन्तला और रामराज्य जैसे लोकप्रिय नाटक रचे. इसके साथ ही विद्यापति की पदावली और बिहारी सतसई की सुबोध टीका का संपादन किया. उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की रोचक और मशहूर जीवनी भी लिखी. इसके अलावा पतितों के देश में, चिता के फूल, लाल तारा, गेहूं और गुलाब और वन्दे वाणी विनायक जैसी लोकप्रिय रचनाएं की. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह' दिनकर ' ने रामवृक्ष बेनीपुरी के बारे में लिखा था , कि ' बेनीपुरी मेरे साहित्यिक जीवन के निर्माता थे, मैं उनसे कभी उऋण नहीं हो सकता. नाम का दिनकर मैं था असली सूर्य बेनीपुरी थे. बेनीपुरी नहीं होते तो दिनकर भी नहीं होता'. साहित्यकार मैथिली शरण गुप्त ने लिखा था कि 'रामवृक्ष बेनीपुरी की लेखनी है कि जादू की छड़ी है.'

रामवृक्ष बेनीपुरी का क़रीबी ताल्लुक सियासी दिग्गजों से तो था ही, वे कला क्षेत्र की हस्तियों के भी नजदीक थे. हिंदी सिनेमा के सबसे समृद्ध परिवार कपूर खानदान से भी रामवृक्ष बेनीपुरी का पारिवारिक संबंध था. पृथ्वीराज कपूर लगातार बेनीपुरी के नाटकों का मंचन करते रहे. एक बार ख़ुद पृथ्वी राज कपूर अपने परिवार और थियेटर के सदस्यों के साथ सुदूर गांव बेनीपुर आए. जानकार बताते हैं कि पृथ्वीराज कपूर बेनीपुरी जी के घर एक महीने से भी ज्यादा वक्त तक रूके. रामवृक्ष बेनीपुरी के नाती रतन बेनीपुरी ने कपूर परिवार से बेनीपुरी के संबंधों को लेकर एक बड़ा दिलचस्प किस्सा सुनाया. जब रामवृक्ष बेनीपुरी अपनी बेटी प्रभा की शादी का कार्ड देने पृथ्वीराज कपूर के घर मुंबई गए तो उसी दिन राज कपूर की फिल्म चोरी-चोरी का प्रीमियर हुआ था. और राजकपूर की आदत थी कि वे अपनी फिल्म के पहले शो की कमाई अपने पिता को सौंपते थे. उस वक्त उनके पास उस जमाने में क़रीब 15 हज़ार रूपये थे जिसे उन्होंने बेटी के नेग के तौर पर रामवृक्ष बेनीपूरी को सौंप दिया. 

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पलायन की दो घटनाओं का बड़ा महत्व है. पहली घटना है भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त हजारीबाग जेल से जयप्रकाश नारायण का फरार होना और दूसरी घटना है नेपाल के हनुमाननगर थाने से डॉ लोहिया को छुड़ाने की. दोनों घटनाओं में सूत्रधार की भूमिका में थे रामवक्ष बेनीपुरी. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त रामवृक्ष बेनीपुरी और जयप्रकाश नारायण हजारीबाग की जेल में बंद थे. उस वक्त देश के तमाम नेता जेल में डाल दिए गए थे. आज़ादी की लड़ाई में नेतृत्व का संकट था. रामवृक्ष बेनीपुरी का मानना था कि जयप्रकाश नारायण की जरूरत इस वक्त जेल से बाहर है. इसीलिए उऩ्होंने जेल ब्रेक की योजना बनाई. दिवाली की रात को जेल में सांस्कृतिक कार्यक्रम किया, सारे क़ैदी और पुलिसवाले कार्यक्रम देखने में उलझे रहे और जयप्रकाश नारायण अपने 6 साथियों के साथ जेल से फरार हो गए. 

जयप्रकाश नारायण भी रामवृक्ष बेनीपुरी के महत्व को बखूबी जानते-पहचानते थे. यही वजह है कि आपातकाल के आंदोलन के दौरान 5 जून 1975 को जब पटना के गांधी मैदान में लोगों की उम्मीद जनसैलाब की शक्ल में उमड़ी, तो लोकनायक ने मंच से रामवृक्ष बेनीपुरी को याद किया. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह उस घटना को याद करते हैं. गोपेश्वर सिंह ने बताया कि जयप्रकाश नारायण लोगों की भारी भीड़ देखकर भावुक हो गए और उन्होंने मंच से बेनीपुरी जी को याद किया.

लोकनायक से बेनीपुरी के आत्मीय रिश्ते थे लेकिन इसके बावजूद जब पहले आम चुनाव के बाद जयप्रकाश नारायण ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर सर्वोदय में जाने का मन बनाया, तो उस वक्त बेहद करीबी रिश्ता होने के बावजूद रामवृक्ष बेनीपुरी ने एक तल्ख चिठ्ठी लिखकर जेपी के फैसले का विरोध किया. सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के पूर्व अध्यक्ष प्रेम सिंह ने बताया कि रामवृक्ष बेनीपुरी चाहते तो क़रीबी होने की वजह से चुप भी रह सकते थे. लेकिन वो दौर दूसरा था तब वैचारिक मतभेद को सार्वजनिक रूप से जाहिर करने पर लोग बुरा नहीं मानते थे. गोपेश्वर सिंह मानते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में जयप्रकाश की महत्ता को पहचानने वाले पहले व्यक्ति थे रामवृक्ष बेनीपूरी.

एक और महत्वपूर्ण घटना है नेपाल के हनुमानगढ़ी थाने से डॉ लोहिया को छुड़ाने की. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब नेपाल पुलिस ने डॉ लोहिया को अरेस्ट किया, तो उन्हें अंग्रेजों को सौंपने का प्लान बनाया. इसके बाद सुभाष चंद बोस के निर्देश और जयप्रकाश नारायण की अपील पर रामवृक्ष बेनीपुरी ने डॉ लोहिया को नेपाल से छुड़ाने की योजना बनाई. रामवृक्ष बेनीपुरी के नाती रतन योगेंद्र शुक्ल के सुनाए संस्मरण याद करते हैं कि किस तरह एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में लोहिया का हाथ पकड़ कर उन्होंने इस योजना को कामयाब किया था.

अपने गांव बेनीपूर से रामवृक्ष बेनीपूरी को बेहद लगाव था. गांव में उन्होंने एक बड़े घर का निर्माण कराया था, जिसके बारे में उनका मानना था कि वे अपनी याद के लिए उसे बना रहे हैं. लेकिन आज बेनीपुर में चारों तरफ विरानी नज़र आता है. बड़े साहित्यकार का गांव बागमती के डूब क्षेत्र में आ गया है. सरकार ने नया बेनीपूर गांव बसाने के लिए ज़मीन तो दी. लेकिन रामवृक्ष बेनीपुरी की स्मृति में अभी तक कोई निर्माण नहीं हुआ . जहां कभी महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण और कई महान स्वाधीनता सेनानियों ने प्रवास किया था वहां आज हर तरफ सन्नाटा नज़र आता है. रामवृक्ष बेनीपुरी का निधन 9 सितंबर 1968 को हुआ. आज उनकी गिनती हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े नामों में है, लेकिन फिर भी उनसे जुड़ी यादें उपेक्षा की शिकार हैं.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)