फांसी देने के लिए बिहार के बक्सर से ही क्यों मंगाई जाती है रस्सी? जानिए कारण

तिहाड़ जेल प्रशासन ने बक्सर जेल को 10 रस्सियों का ऑर्डर दे दिया है. फांसी देने वाले तख्त और सेल की सफाई करवाई गई है और फांसी देने से पहले ड्राई रन भी किया जाता है.

फांसी देने के लिए बिहार के बक्सर से ही क्यों मंगाई जाती है रस्सी? जानिए कारण
हमारे देश मे मरने वाले इंसान को ज्यादा तकलीफ ना हो उसका भी ख्याल रखा जाता है.

नई दिल्ली: पूरे देश को निर्भया के दोषियों को फांसी देने का इंतज़ार है. दोषी विनय शर्मा की दया याचिका पर कभी भी राष्ट्रपति फैसला ले सकते हैं. फैसले के 14 दिनों के अंदर देनी होती फांसी देनी होती है लेकिन क्या आपको पता है कि फांसी देने के लिए क्यों बिहार के बक्सर से एक खास तरह की रस्सी मंगाई जाती है ? 

जवाब जान कर आप भी हैरान रह जाएंगे कि हमारे देश मे मरने वाले इंसान को ज्यादा तकलीफ ना हो उसका भी ख्याल रखा जाता है. क्योंकि गंगा किनारे बसे बिहार के जिले बक्सर की रस्सी को जिन रेशों से बनाया जाता है वो बेहद मुलायम और मजबूत होते हैं. रस्सी को बनाने के बाद काफी देर तक वैक्स में डूबा कर रखा जाता है जिसकी वजह से फांसी देते वक्त बाकी रस्सियों के मुकाबले बक्सर की रस्सी से फांसी देने वाले कैदी को तकलीफ कम होती है.

तिहाड़ जेल प्रशासन ने बक्सर जेल को 10 रस्सियों का ऑर्डर दे दिया है. फांसी देने वाले तख्त और सेल की सफाई करवाई गई है. जेल मैनुअल के मुताबिक हर तीन महीनों में फांसी देने वाली जगह पर ड्राई रन किया जाता है जहां एक डमी कैदी को लटका कर देखा जाता है कि फांसी देने का पूरा सिस्टम ठीक से काम कर रहा है या नहीं. ड्राई रन के दौरान जिस कैदी को सज़ा देनी होती है उसके वज़न से डेढ़ गुना ज्यादा वजन को लटकाया जाता है, इस ड्राई रन को करने के पीछे रस्सी के वजन उठाने की क्षमता को भी चेक करना होता है कि रस्सी फांसी देते वक्त टूट तो नहीं जाएगी.

क्या होती है फांसी देने की प्रक्रिया ? 
राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज़ होने के 14 दिन के अंदर फांसी देनी होती है. राष्ट्रपति का फैसला जैसे ही निचली अदालत को मिलता है तो अदालत फांसी देने के लिए ब्लैक वारंट जारी करती है जिसमें फांसी देने की तारीख और समय दिया होता है. उस ब्लैक वारंट की एक कॉपी कैदी को भी दी जाती है. जिसके बाद उसे परिवार वालो से मिलने भी दिया जाता है. 

ब्लैक वारंट जारी होने के बाद कैदी को एक अलग कंडम सेल में रखा जाता है. उस पर फांसी पर लटकाए जाने तक हर वक़्त नज़र रखी जाती है. उसको बाकी कैदियों से दूर रखा जाता है. फांसी वाले दिन उसे सुबह साढ़े 4 बजे जगा कर नहलाया जाता है चाय और नास्ता दिया जाता है, उसका मेडिकल होता है, फिर काले कपड़े पहनाकर फांसी के तख्ते पर लाया जाता है. 

फांसी देते वक्त उस जगह जल्लाद के अलावा सिर्फ चार लोग मौजूद होते है. जिसमे उस जेल का सुपरिटेंडेंट, एसडीएम, और दो चिकित्सा अधिकारी होते हैं.