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लालू यादव के बिना फीकी है बिहार की राजनीति, एक भूल और धीरे-धीरे खत्म हो रहा सबकुछ

न्याय की संघिताओं से ऊपर और नियमों के सदाचार से पड़े राजनीति का चाणक्य लालू प्रसाद यादव जो कह देते थे वही कानून बन जाता था. उस दौरान बिहार में धीरे-धीरे अपहरण, फिरौती, हत्या और लूट जैसे अपराध बढ़ते गए और उस दौर को ‘जंगलराज’ तक कहा गया.

लालू यादव के बिना फीकी है बिहार की राजनीति, एक भूल और धीरे-धीरे खत्म हो रहा सबकुछ
सेहत बिगड़ने के कारण मौजूदा समय में लालू यादव पिछले डेढ़ साल से रिम्स में इलाजरत हैं. (फाइल फोटो)

विकास चौधरी, पटना: भारतीय राजनीति में लालू यादव ऐसे चेहरे हैं जिनके नाम से बिहार में कानून पनाह लेता था, लेकिन बिगड़ती सेहत और घटती सियासी ताकत के कारण धीरे-धीरे लालू का नाम धूमिल परता चला गया. याद कीजिए 90 के दशक जब बिहार में लालू प्रसाद यादव का जलवा था. जब राज्य के नियम-कानून दोनों लालू यादव के इशारों पर चलते थे.

न्याय की संघिताओं से ऊपर और नियमों के सदाचार से पड़े राजनीति का चाणक्य लालू प्रसाद यादव जो कह देते थे वही कानून बन जाता था. उस दौरान बिहार में धीरे-धीरे अपहरण, फिरौती, हत्या और लूट जैसे अपराध बढ़ते गए और उस दौर को ‘जंगलराज’ तक कहा गया.

 

बने छात्र नेता से बिहार के 'बादशाह'
बिहार के गोपालगंज में एक यदुवंशी परिवार में जन्मे लालू यादव ने अपने राजनीति की वैसे तो 1970 से ही शुरू किया लेकिन पहली बार 1973 में छात्र संघ का बने. 24 जुलाई 1975 गांधी मैदान पटना लाखों लोगों ने जय प्रकाश नारायण की एक आवाज पर देश की हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोल दिया. उस दौरान देश आपातकाल के दौड़ से गुजर रहा था लेकिन जेपी कहां झुकने बाले थे. 

जानकार बताते हैं कि जब जेपी के ऊपर लाठियां चलनी शुरू हुई तो उस समय पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष जेपी के ऊपर झुक गए थे. लालू ने अपने शरीर पर सैकड़ों लाठियां खाई. और यहीं से लालू यादव ने अपनी राजनीतिक उड़ान भरी. 1977 में महज 29 वर्ष की उम्र में छपरा लोकसभा से जनता पार्टी की टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे. 

लेकिन जब 1980 में वैचारिक मतभेदों के कारण केंद्र में सरकार गिर गई, लेकिन तब तक लालू यादव राजनीति में परिपक्व हो गए थे और 1980 में बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते भी इसके बाद लम्बे समय तक विधानसभा के सदस्य रहे. लालू 1990 को पहली बार बिहार के मुख्‍यमंत्री बने. 1995 में दूसरी बार राज्य के मुख्‍यमंत्री बने. 1997 में लालू ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी नाम से अलग पार्टी बना ली. 

 लालू यादव

लालू यादव की एक भूल
दूसरी बार मिले सत्ता ने लालू के आत्मविश्वास को आसमान पर पहुंचा दिया था. लालू यादव की सबसे बड़ी भूल थी कि उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि सियासत सरोकारों से चलती है. बिहार में उनकी तूती बोल रही थी. यह पहला मौका था जब किसी नेता के नाम पर बिहार के चौराहों पर चर्चा हो रही थी. लालू यादव ने अपनी परिपक्वता से लोकप्रिय राजनीति की परिभाषा ही बदल डाली, इस परिभाषा में लोकतांत्रिक का आचरण कहीं गुम हो रहे थे. और जब आचरण निरंकुश हो जाए तो बुनियाद हिल ही जाती है लेकिन तब उनके विरोधी खामोश थे. चोट के लिए सही मौके के इंतजार में थे. 

ऐसे शुरू हुई मुसीबत
जनवरी 1996 को कमिश्नर अमित खरे ने चाईबासा के पशुपालन विभाग के दफ्तर पर छापा मारकर दस्तावेज बरामद किए तो करोड़ों के घोटाले एक-एक करके सामने आने लगे. इससे पहले लालू संभल पाते खरे ने सारे दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिया. जब लालू यादव की चारा घोटाले में गिरफ्तारी तय हो जाने के बाद लालू ने मुख्यमन्त्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी राबड़ी देवी को 1997 में मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपकर सबको हैरान कर दिया.

लालू प्रसाद यादव अब शायद ही सक्रिय राजनीति में वापसी कर पाएं

लालू यादव को चारा घोटाले के अलग-अलग मामले में उन्हें सीबीआई की स्पेशल कोर्ट से सजा हुई है. उनकी उम्र 71 वर्ष से अधिक हो चुकी है और उन्हें अब तक 25 साल से अधिक की सजा सुनाई जा चुकी है. सेहत बिगड़ने के कारण मौजूदा समय में लालू यादव पिछले डेढ़ साल से रिम्स में इलाजरत हैं. बीच में कुछ दिनों के लिए पैरोल पर अपने बड़े बेटे तेजप्रताप की शादी में बाहर आए थे. 

इसके बाद पौरोल खत्म होने का बाद फिर लालू यादव जेल गए लेकिन तबियत बिगड़ने के कारण उन्हें फिर से रिम्स में शिफ्ट किया गया. जहां उन्हें जेल मैलुअल के मुताबिक हफ्ते में सिर्फ तीन लोगों से मिल सकते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी पूरी तरह साफ हो गई है. कांग्रेस और कई दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर बने उनके महागठबंधन को महज एक सीट ही मिली. फिलहाल लालू की दिन व दिन बिगड़ती सेहत के कारण शायद ही बिगड़ती सेहत और घटती सियासी ताकत के साथ लालू अब शायद ही सक्रिय राजनीति में वापसी कर पाएं.