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सीवान में कस्तूरबा के साथ पहुंचे थे गांधी, 1927 की सभा में 30 हजार लोग हुए थे शामिल

18 जनवरी, 1927 को सीवान के मैरवा में बापू ने सभा की थी. उस सभा में करीब 30 हजार लोग शामिल हुए थे. 

सीवान में कस्तूरबा के साथ पहुंचे थे गांधी, 1927 की सभा में 30 हजार लोग हुए थे शामिल
कई बार बिहार आए थे बापू.

आकाश, सीवान: बिहार की धरती से देश को अनेक विभूतियां मिली हैं. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म सीवान जिले में हुआ. इसके अलावा मौलाना मजहरूल हक जैसी विभूतियां का सीवान कर्मभूमि रही है. इस धरती की महत्ता ऐसा है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी इस जिले में कई बार कदम रखे. बापू ने 1927 में स्वतंत्रता संग्राम की लौ को तेज करने के लिए बिहार का रुख किया था. इस दौरान बापू सीवान भी आए थे.

18 जनवरी, 1927 को सीवान के मैरवा में बापू ने सभा की थी. उस सभा में करीब 30 हजार लोग शामिल हुए थे. बापू ने पर्दानशीं महिलाओं से खद्दर खरीदने की अपील की थी. एक बार फिर 1930 में महात्मा गांधी सीवान के मैरवा पहुंचे थे. यह वो दौर था जब स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भड़क चुकी थी.

महात्मा गांधी की पुकार पर सैकड़ों लोग जंग-ए-आजादी में कूद पड़े थे. इलाके का बच्चा-बच्चा सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलन से जुड़ गया था. आज गांधी जयंती के अवसर पर गांधी का रूप धारण किए सीवान के मैरवा निवासी चौधरी हाशिम राहगीर उर्फ गांधी जी ने बताया कि 1942 के दौर में प्रशासन ने इन लोगों के खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की शुरुआत कर दी. लंगड़पुरा के रामदेनी कुर्मी ने थानेदार को चुनौती दी तो थानेदार ने सीने में गोली उतार दी थी. वे वहीं पर शहीद हो गए.

मैरवा रेलवे स्टेशन इस शहादत का गवाह बना. महात्मा गांधी ने दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मैरवा नौतन मोड़ पर सभा को संबोधित किया. बापू ने नशा उन्मूलन की अपील की तो सबने खैनी की डिबिया फेंक दी. इस सभा के बाद स्वतंत्रता संग्राम की चिगारी धधक उठी थी. सीवान में बापू के साथ कस्तूरबा गांधी भी थीं. 

महात्मा गांधी ने जिस जगह पर सत्याग्रह का बिगुल फूंका था, वहां चौधरी हाशिम राहगीर ने गांधी आश्रम बनाया. इस स्थान पर एक चबूतरा का निर्माण हुआ. चबूतरे के पास ही एक खपड़ैल कमरा था, जिसे गांधी जी के लिए चौधरी हाशिम राहगीर के दादा जी ने दान कर दी थी. यहां गांधी जी ठहरते थे. इसी स्थान पर बैठक करके महात्मा गांधी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रणनीति बनाते थे. इसे उस समय गांधी आश्रम कहा जाता था. उस स्थान पर आज मध्य विद्यालय खड़ा है. कहा जाता है महात्मा गांधी की अस्थियों का कुछ हिस्सा चबूतरा के बगल से बहती झरही नदी में प्रवाहित की गई थीं.