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कभी आतंक का प्रयाय रहे, माओवाद की राह छोड़ आज बच्चों के बीच जगा रहे शिक्षा की अलख

जामताड़ा और दुमका जिले में कभी आतंक का पर्याय बने मंटू दा के नाम से कुख्यात आज ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर शिक्षा से जोड़ने का काम कर रहे हैं. 

कभी आतंक का प्रयाय रहे, माओवाद की राह छोड़ आज बच्चों के बीच जगा रहे शिक्षा की अलख
एक नक्सली के रूप में थी मंटू बागती की पहचान.

जामताड़ा : झारखंड के जामताड़ा के कुण्डहित थाना क्षेत्र के जीतूहीड गांव का मंटू बागती, जिसकी पहचान कल तक एक नक्सली के रूप में थी, आज वह बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहे हैं. समाज में आज उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली है.

जामताड़ा और दुमका जिले में कभी आतंक का पर्याय बने मंटू दा के नाम से कुख्यात आज ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब परिवार के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर शिक्षा से जोड़ने का काम कर रहे हैं. लोग भी आज उनकी प्रशंसा करते नहीं अघाते हैं.

मंटू साल 2007 के दौरान माओवादियों के सम्पर्क में आने के बाद नक्सली गतिविधियों में शामिल हो गया था. इस दौरान जामताड़ा के कुण्डहित और दुमका जिले के शिकारीपाड़ा थानों में उसके विरूद्ध कई मामले दर्ज किए गए. संगठन में कई साल तक रहने के बाद वह नक्सल गतिविधि को छोड़कर समाज की मुख्य धारा से जुड़ गए.

हालांकि 2013 में आत्मसमर्पण के बाद चार वर्षों तक जामताड़ा और दूमका जेल की हवा भी खानी पड़ी. 2016 में बेल पर छूटने के बाद घर लौटे और गरीब बच्चों को शिक्षा देने में जुट गए. आज करीब सौ बच्चों को मामूली फीस लेकर शिक्षा देने का का काम रहे हैं. बीए की डीग्री हासिल कर मंटू आज क्षेत्र में मिशाल बन चुके हैं.