close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

बिहार: एक बार फिर इस जिले के पर्दे से बढ़ सकती है राष्ट्रपति भवन की खूबसूरती

सरकारी उदासीनता के कारण अब यहां के परदे जाने बंद हो गए. बाबजूद इसके एक बार फिर यहां के डिजाइन किए गए पर्दे को राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए कपड़ा मंत्रालय ने नई दिल्ली भेजा गया है. 

बिहार: एक बार फिर इस जिले के पर्दे से बढ़ सकती है राष्ट्रपति भवन की खूबसूरती
डिजाइन को मंत्रालय द्वारा चयन कर लिया गया तो इन्हे राष्ट्रपति द्वारा सम्मनित किया जाएगा.

दीपक विश्वकर्मा, नालंदा: कभी राष्ट्रपति भवन कि खूबसूरती में चार चांद लगाने वाले हस्तनिर्मित पर्दे बिहार के नालंदा से मंगवाए जाते थे. हालांकि सरकारी उदासीनता के कारण अब यहां के परदे जाने बंद हो गए. बाबजूद इसके एक बार फिर यहां के डिजाइन किए गए पर्दे को राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए कपड़ा मंत्रालय ने नई दिल्ली भेजा गया है. अगर इनके पर्दा का चयन राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चयन हो गया तो यहां कारीगरों के अच्छे दिन तो आएंगे ही और साथ ही इससे हस्तकरघा को बढ़ावा मिलेगा.

बिहारशरीफ के बसवन बिगहा के कारीगरों द्वारा निर्मित परदे पांच वर्ष पहले जापान और जर्मनी निर्यात किए जाते थे लेकिन अब यह बंद हो गया है. दरअसल प्राथमिक बुनकर सहयोग समिति लिमिटेड बसवन बिगहा के द्वारा 8 महीने पहले तैयार किये गए पर्दे को राष्ट्रपति भवन में चयन के लिए बुनकर सेवा केंद्र भागलपुर के माध्यम से भारत सरकार कपड़ा मंत्रालय नई दिल्ली को भेजा गया है. अगर इनके बनाए गए डिजाइन को मंत्रालय द्वारा चयन कर लिया गया तो इन्हे  राष्ट्रपति द्वारा सम्मनित किया जाएगा. 

और इनके हांथो से निर्मित पर्दे फिर से राष्ट्पति भवन के खिड़की और दरवाजे पर लगेंगे. इन बुनकरों द्वारा बनाये गए डिजाइन में बौद्ध धर्म पर फोकस किया गया है. जिसमें गया के बोधि मंदिर के बीच भगवान बुद्ध की ध्यानमुद्रा और महाबोधि पीपल वृक्ष को दिखाया गया है. जो बौद्ध धर्माबलंबियों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

कपिलदेव प्रसाद की माने तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद जब राष्ट्रपति थे तब यही के बने पर्दा राष्ट्रपति भवन में लगते थे. मगर उनके बाद अधिकारियों की अनदेखी के कारण बंद कर दिया गया. यही नहीं आम लोगों की भी रुचि हस्तकरघा के कपड़ों में नहीं रही जिसके कारण कारीगरों के समक्ष भूखमरी की समस्या उत्पन्न हो गयी . जिसके कारण कई लोगों ने इस रोजगार को छोड़ दूसरे रोजगार को अपना लिया है .

पहले इस काम में पचास से साठ कारीगर काम करते थे अब स्थिति यह है कि यहां सिर्फ 20 ही कारीगर काम करते हैं. हालांकि 1992 में निर्यात निगम द्वारा हस्तकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए हैंडलूम कर्मशाला का निर्माण करवा कर उनके द्वारा बनाये गए कपड़ों का निर्यात करने का प्रयास किया गया. मगर धीरे-धीरे निर्यात निगम ने भी मुंह मोड़ लिया .

करीब 50 वर्षो से कपिलदेव प्रसाद किसी तरह परिवार का गुजर बसर कर पा रहे हैं. आज भी यहां के बनाए गए बाबन बूटी साड़ी और परदे की मांग भारत में ज्यादा न हो  मगर चीन, जापान सहित अन्य बौद्धिस्ट देशों से आने वाले पर्यटक इसे काफी पसंद करते हैं .