झारखंड में विलुप्त हो रही पहाड़िया समुदाय को मिली पहचान, सरकार ने चलाई कई योजनएं

लिट्टीपाड़ा प्रखंड से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर मखनी पंचायत में लोगों को पीने के लिए शुद्ध पानी, आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग है. लोगों की माने तो मजदूरी करने के लिए उन्हें या तो जिला मुख्यालय या दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. तभी उनके परिवार का भरण-पोषण होता है. हालांकि, गांव में बिजली पहुंच चुकी है, लोगों को सरकारी आवास भी मिल चुका है. लेकिन, अभी भी कई लोगों को आवास की जरूरत है. ग्रामीणों को शौचालय और गैस चूल्हा भी उपलब्ध कराया गया है.

झारखंड में विलुप्त हो रही पहाड़िया समुदाय को मिली पहचान, सरकार ने चलाई कई योजनएं
पहाड़िया समुदाय के लोगों की रक्षा के लिए सरकार कई तरह की योजना चला रही है

मदन कुमार सिंह/पाकुड़: पाकुड़ जिले से तकरीबन 35 किलोमीटर दूर लिट्टीपाड़ा प्रखंड के मखनी गांव में रह रहे पहाड़िया जनजाति के लोगों की स्थिति पहले से जरूर बदली है, लेकिन अभी भी लोगों को शुद्ध पेयजल और रोजगार की आवश्यकता है. विलुप्त होने की कगार पर पहाड़िया समुदाय के लोगों की रक्षा के लिए सरकार कई तरह की योजना चला रही है, लेकिन अभी भी कई जगहों पर और ध्यान देने की जरूरत है.

दरअसल, लिट्टीपाड़ा प्रखंड से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर मखनी पंचायत में लोगों को पीने के लिए शुद्ध पानी, आवास और रोजगार की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग है. लोगों की माने तो मजदूरी करने के लिए उन्हें या तो जिला मुख्यालय या दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. तभी उनके परिवार का भरण-पोषण होता है. हालांकि, गांव में बिजली पहुंच चुकी है, लोगों को सरकारी आवास भी मिल चुका है. लेकिन, अभी भी कई लोगों को आवास की जरूरत है. ग्रामीणों को शौचालय और गैस चूल्हा भी उपलब्ध कराया गया है.

वहीं, सरकार के द्वारा लिट्टीपाड़ा प्रखंड कार्यालय स्थित 'गुतु गलांग' अभियान के तहत पहाड़िया समुदाय की महिलाओं को बोरा बनाने के काम में जोड़ा गया है. इस बोरे में 35 किलो अनाज भरके डाकिया योजना के तहत सभी लाभुकों के घरों तक पहुंचाया जाता है. राज्य का यह अकेला सेंटर है जहां से बोरा तैयार कर 24 जिलों में भेजा जाता है. पूरे राज्य में प्रत्येक महीने में 72 हजार के करीब बोरे की खपत होती है और यहीं से बोरा तैयार कर भेजा जाता है. इस केंद्र पर रॉ मैटेरियल गुजरात और कोलकाता से मंगाए जाते हैं. फिर यहां कटिंग कर बोरा तैयार किया जाता है.

राज्य में सबसे अधिक पहाड़िया समुदाय इसी प्रखंड क्षेत्र में निवास करते हैं इसलिए इस योजना की शुरुआत इसी जगह पर की गई है. साथ ही बरबटी की पैकिंग भी महिलाओं के द्वारा की जाती है. दिल्ली कोलकाता चेन्नई या देश के अन्य हिस्सों में सरस मेला के माध्यम से इस प्रोडक्ट को बेचा भी जाता है. इस काम में जुटी महिला प्रत्येक महीने तीन से चार हजार तक आमदनी कर लेती है.

महिलाएं सुबह 8 बजे से लेकर शाम के 4 बजे तक काम करती है. तकरीबन 36 की संख्या में महिला पहाड़िया समुदाय इस काम से जुड़ी हुई है. प्रखंड के एम ओ अधिकारी सुरेंद्र कुमार की मां ने बताया कि पहले उन्हें दूसरी जगह से बोरा मंगवाना पड़ता था, लेकिन अब प्रखंड कार्यालय से ही प्राप्त हो जाने से उन्हें सुविधा मिल रही है. यहीं से 35 किलो अनाज पैक कर योजना के तहत पहाड़ियां समुदाय तक भेजा जाता है.

गुतु गलांग योजना से जुड़े अधिकारी की मानें तो, इससे पहाड़िया समुदाय की महिलाओं को काफी लाभ मिला है. पिछले एक वर्ष में 74 लाख के करीब इस बोरे के निर्माण से ट्रांजैक्शन किया गया है, इससे तकरीबन 14 लाख के करीब आमदनी हुई है, जिसे सीएसआर फंड के तहत महिलाओं के उत्थान के लिए ही खर्च किया जा रहा है.

मखनी गांव के बच्चे भी अब साक्षर हो रहे हैं. बच्चे बाहर रहकर विद्यालयों में पढ़ाई कर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. हालांकि, लॉकडाउन की वजह से स्कूल जब बंद हुए तब से वह घर पर ही हैं. स्कूल खुलने के बाद फिर वह दोबारा स्कूल जाएंगे और अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाएंगे. बच्चों की माने तो उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आया है.