पलामू: चुनावी मुद्दे से दूर इस किले की वर्तमान स्थिति बदहाल, जीर्णोद्धार की उम्मीद लगाए खड़ा

पलामू: चुनावी मुद्दे से दूर इस किले की वर्तमान स्थिति बदहाल, जीर्णोद्धार की उम्मीद लगाए खड़ा

इतिहास के अनुसार इसका निर्माण 1766-1770 के आसपास चेरोवंशीय राजा गोपाल राय ने करवाया था और चेरो सत्ता के अवसान काल के दौरान पलामू का सम्राज्य को यहीं से संचालित किया जाता था.

पलामू: चुनावी मुद्दे से दूर इस किले की वर्तमान स्थिति बदहाल, जीर्णोद्धार की उम्मीद लगाए खड़ा

पलामू: झारखंड में विधानसभा चुनाव (Jharkhand assembly election) को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. चुनावी शोर से दूर हसीन वादियां, घनघोर जंगल, चहचहाते पंछी के बीच स्थित यह किला पलामू किले के तौर पर जाना जाता है. इस किले का इतिहास सैकड़ों साल पुराना रहा है. इसका निर्माण राजा मेदनीराय ने 1630 में कराया था. इसमें राजा मेदनीराय ने कई गुप्त गुफा भी बनाया था.

स्थानीय लोग इस किले को 'चलानी किला' भी कहतें हैं. इतिहास के अनुसार इसका निर्माण 1766-1770 के आसपास चेरोवंशीय राजा गोपाल राय ने करवाया था और चेरो सत्ता के अवसान काल के दौरान पलामू का सम्राज्य को यहीं से संचालित किया जाता था. सन् 1771 में पलामू किला पर अंग्रेजों के आक्रमण और नियंत्रणाधीन होने के बाद शाहपुर किला ही राजा का निवास स्थान बना.

यह किला पलामू के मुख्यालय मेदिनीनगर के दक्षिण दिशा में कोयल नदी के तट पर इतिहास के सैकड़ों वर्षों की स्मृतियों को समेटे खड़ा है. लेकिन आज उपेक्षा की वजह से इस धरोहर की स्थिति बदहाल है. कई किलोमीटर तक फैले इस किले की दरकती दीवारें और जंगलों से झांकता इतिहास अपने जीर्णोद्धार की उम्मीद लगाए खड़ा है. 

वहीं, भले ही आज ये किला बदहाल है, लेकिन इतिहास के पन्नों में कैद इसकी कहानियां लोगों को इसकी ओर आकर्षित करती हैं. लोग यहां पर आकर इसके इतिहास को समझने की कोशिश तो करते हैं, साथ ही साथ अपने सरकार से इसके जीर्णोद्धार की मिन्नतें भी कर रहे हैं.

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