पटना: पैनल डिस्कशन में जुटी तमाम हस्तियां, कहा- गर्वमेंट स्कूलों की तरफ ध्यान दे सरकार

कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर दिया गया वो था ज्ञानदान यानि हम जितना संभव हो शिक्षा का प्रचार-प्रसार करें. इसमें दिल्ली की लेडी श्रीराम कॉलेज से जुड़ी छात्राओं ने भी अपने विचार रखे. 

पटना: पैनल डिस्कशन में जुटी तमाम हस्तियां, कहा- गर्वमेंट स्कूलों की तरफ ध्यान दे सरकार
एएन कॉलेज में आयोजित की गई पैनल चर्चा. (फाइल फोटो)

पटना: पटना ही नहीं बिहार में मशहूर अनुग्रह नारायण कॉलेज में पब्लिक एजुकेशन पर एक पैनल डिस्कशन हुआ. इसमें शिक्षा जगत से जुड़ी हस्तियों के साथ-साथ शिक्षा के लिए काम करने वाली छात्राएं और छात्रों को भी बोलने का मौका मिला.दरअसल रोल ऑफ पिपुल्स पार्टिसिपेशन इन पब्लिक एजुकेशन नाम से एक पैनल डिस्कशन अनुग्रह नारायण कॉलेज में हुआ.

इसमें जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया वो था ज्ञानदान यानि हम जितना संभव हो शिक्षा का प्रचार-प्रसार करें. इसमें दिल्ली की लेडी श्रीराम कॉलेज से जुड़ी छात्राओं ने भी अपने विचार रखे. ये लड़कियां पिछले दो सालों से कटिहार में शिक्षा और नारी स्वास्थ्य को लेकर काम कर रही हैं. छात्राओं के मुताबिक, बिहार के स्कूलों में ड्रॉप आउट की समस्या सबसे ज्यादा है और पोस्ट ग्रेजुएशन तक छात्राएं पढ़ाई जारी नहीं कर पा रही हैं.

इस पैनल डिस्कशन में मुख्य रूप से बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉक्टर राजवर्धन आजाद शामिल हुए. राजवर्धन आजाद ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का उदाहरण देते हुए कहा कि हम ये न सोचें कि देश से हमें क्या मिला है. हम ये सोचें कि देश को हम क्या दे सकते हैं. देश का सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क ही शिक्षक बने ये सरकार की कोशिश होनी चाहिए, क्योंकि शिक्षा ही देश का निर्माण करती है. 

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कंट्री हेड, भारत के संजय कुमार भी इस पैनल डिस्कशन में शामिल हुए. संजय कुमार बिहार के कटिहार से हैं और वो पिछले कई सालों से शिक्षा के लिए यहीं काम कर रहे हैं. उनकी एक किताब कटिहार टू कैनेडी है. 

उन्होंने कहा कि एक समय था जब देश के बड़े शहरों में अंग्रेजी स्कूल नहीं थे. उस जिले का कलेक्टर हो या किसी विभाग के चपरासी उनके बच्चे-बच्चियां सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे. जाहिर सी बात है कि इससे जिले के कलेक्टर या सरकारी अधिकारियों का ध्यान स्कूलों की तरफ जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. 90 के दशक के खत्म होते कस्बों में निजी स्कूल खुल गए और यहीं वजह है कि सरकारी स्कूल से लोगों का मोह भंग होना शुरू हो गया. सरकार और इसकी मशीनरी ने ध्यान देना बंद कर दिया.