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बिहार के इस गांव से विलुप्त हो रहे हैं मोर, कभी मोरगांव के नाम से जानते थे लोग

मोरों की घटती संख्या को देखने के लिए कल्यापुर के विधायक सचिन्द्र प्रसाद सिंह और डीएफओ प्रभाकर झा मोरगांव पहुंचे. डीएफओ प्रभाकर झा ने गांव के लोगों से इस बारे में बातचीत की.

बिहार के इस गांव से विलुप्त हो रहे हैं मोर, कभी मोरगांव के नाम से जानते थे लोग
मोतिहारी का माधोपुर गोविंद कभी मोर गांव के नाम से जाना जाता था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मोतिहारी : भारत के राष्ट्रीय पक्षी का नाम मोर जरुर है, लेकिन अब ये मोर विलुप्त होते जा रहे है. मोतिहारी के कल्याणपुर प्रखंड स्थित मोरगांव माधोपुर गोविंद कभी मोर गांव के नाम से जाना जाता था. लेकिन अब यह गांव मोरों के विलुप्त होने की वजह से जाना जाता है. किसी वक्त में यहां 200 से भी ज्यादा मोर थे, लेकिन अब इस गांव में मोरों की संख्या आधी भी नहीं रह गई.

मोरों की घटती संख्या को देखने के लिए कल्यापुर के विधायक सचिन्द्र प्रसाद सिंह और डीएफओ प्रभाकर झा मोरगांव पहुंचे. डीएफओ प्रभाकर झा ने गांव के लोगों से इस बारे में बातचीत की.

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इस मौके पर सचिन्द्र प्रसाद ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक राकेश कुमार से भी बात की. राकेश कुमार ने जमुई के जंगलों से मादा मोर भेजने का आश्वासन दिया. इस आश्वासन के बाद विलुप्त होते मोरों को लेकर एक आशा की किरण दिखाई दे रही है. साथ ही सचिन्द्र प्रसाद ने मोर को बचाने के लिए गन्ने की खेती से परहेज करने की बात कही. सचिन्द्र प्रसाद ने बताया कि इन्हीं गन्ने के खेतों की आड़ में गीदड़ मोर को शिकार बनाते हैं.

डीएफओ ने यह भी बताया कि अप्रैल से जून तक तीन महीने मादा मोर के अंडे देने का समय होता है. अंडों से बच्चों के बाहर आने तक उनकी देखभाल के लिए मोररक्षी नियुक्त किए जाएंगे. जलजमाव के लिए नहर किनारे पोखरों का निर्माण भी कराया जाएगा. पोखरों और सड़कों के किनारे फलदार और छायादार पेड़ भी लगाए जाएंगे.