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गया टाउन से लगातार 9वीं बार के विधायक डॉ. प्रेम कुमार को मंगलवार को बिहार विधानसभा का 18वां अध्यक्ष निर्विरोध चुना गया है. अध्यक्ष पद के लिए महागठबंधन की तरफ से किसी अन्य उम्मीदवार ने नामांकन दाखिल नहीं किया था. इसलिए उनका निर्वाचन तय माना जा रहा था. विपक्षी दल राजद के विधायकों ने भी प्रेम कुमार के नाम पर सहमति जताई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने नवनिर्वाचित स्पीकर प्रेम कुमार को आसन तक पहुंचाया. प्रेम कुमार को विधानसभा अध्यक्ष बनाने के साथ ही भाजपा ने अगले 5 साल के लिए खुद को सुरक्षित कर लिया है और साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर चेक एंड बैलेंस भी लगा दिया है. इसे महाराष्ट्र के स्पीकर राहुल नार्वेकर से जोड़कर देखें तो यह भाजपा के लिए बड़ा मुफीद माना जा रहा है.
राहुल नार्वेकर महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर हैं. पिछले साल वे लगातार दूसरी बार विधानसभा अध्यक्ष के लिए चुने गए थे. राहुल नार्वेकर चर्चाओं में तब आए थे, जब महाराष्ट्र में शिवसेना में बड़ी टूट हुई थी और एकनाथ शिंदे गुट अस्तित्व में आया था. किसी पार्टी में टूट के समय विधानसभा अध्यक्ष का रोल बड़ा ही महत्वपूर्ण हो जाता है. इसी तरह राहुल नार्वेकर का रोल उस समय सबसे महत्वपूर्ण हो गया था. उन्होंने अरसे बार यह फैसला दिया था कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ही असली शिवसेना है.
उसके बाद शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में बड़ी टूट हुई थी और अजित पवार के नेतृत्व में ज्यादातर विधायक निकल गए थे और उन्होंने अपना अलग गुट बना लिया था. राहुल नार्वेकर ने बतौर विधानसभा अध्यक्ष यह फैसला दिया था कि अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ही असली कांग्रेस है. राहुल नार्वेकर के इन दोनों फैसलों पर विवाद भी हुए और स्पीकर पद की भूमिका को लेकर तमाम आरोप लगाए गए थे. मामला पहले चुनाव आयोग और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तक गया था.
क्यों महत्वपूर्ण होता है स्पीकर का पद?
संविधान के अनुच्छेद 178 में विधानसभा अध्यक्ष के रोल को परिभाषित किया गया है. चाहे लोकसभा हो या विधानसभा, स्पीकर का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है. कई मामलों में स्पीकर का फैसला निर्णायक होता है. सरकार जब बहुमत साबित करती है और दल बदल कानून लागू होता है, तब भी स्पीकर का रोल अहम हो जाता है. इसके अलावा सदन के सदस्यों की योग्यता और अयोग्यता पर फैसला लेने का हक भी स्पीकर के पास ही होता है. वैसे तो स्पीकर सदन के अंदर वोटिंग प्रक्रिया से दूर ही रहता है, लेकिन सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बराबर बराबर नंबर होने की स्थिति में स्पीकर का वोट निर्णायक हो जाता है. स्पीकर किसी सदस्य को अनुशासन तोड़ने के आरोप में सदन से निलंबित कर सकता है. दलबदल के आधार पर स्पीकर किसी सदस्य को अयोग्य ठहरा सकता है और उसकी सदस्यता भी ले सकता है. सदन में निंदा, स्थगन और अविश्वास प्रस्ताव बिना स्पीकर की मर्जी के नहीं लाए जा सकते.
प्रेम कुमार के स्पीकर बनने से बीजेपी को क्या होगा फायदा?
वैसे तो सरकार चलाने में स्पीकर का कोई बहुत बड़ा रोल नहीं होता, लेकिन जब सदन चलता है, तब उसका रोल बहुत बड़ा हो जाता है. सामान्य स्थिति में स्पीकर के पास केवल रुटीन काम होते हैं, लेकिन जब सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ जाए, विधायकों का एक गुट बगावत कर दे, गठबंधन के साथी अलग हो जाएं और पाला बदल लें, ऐसे समय में स्पीकर की भूमिका निर्णायक हो जाती है.
इसलिए, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्पीकर का पद जेडीयू के पास रखने देना चाहते थे, लेकिन बीजेपी के आगे उनकी नहीं चली और प्रेम कुमार के रूप में नया स्पीकर बिहार विधानसभा को मिला है. पूर्व में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनडीए को छोड़ महागठबंधन में और महागठबंधन को छोड़ एनडीए में आते रहे हैं. इससे पहले जनादेश इस तरह का था कि भाजपा और उसके स्पीकर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए थे, लेकिन इस बार का जनादेश एनडीए को तीन चौथाई बहुमत देता है और ऐसे में नीतीश कुमार चाहकर भी अपनी निष्ठा नहीं बदल पाएंगे और अगर बदले भी तो भाजपा के पास स्पीकर के रूप में एक ऐसी चाबी है, जो ऐसे हालात को अपने पक्ष में कर सकती है.राहुल नार्वेकर के रूप में भाजपा ऐसे प्रयोग कर चुकी है और भविष्य में अगर बिहार में भी ऐसी स्थिति पैदा होती है तो प्रेम कुमार भी उसी रोल में दिखेंगे.