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Bihar Chunav 2025: 'लालू-तेजस्वी अपने कानों को खोल, तेरे दरवाजे पर बज रहा है ढोल, गठबंधन के लिए अपना दरवाजा खोल.' इस लब्ज के साथ एआईएमआईएम के नेता और कार्यकर्ता लालू राबड़ी आवास पर इंडी गठबंधन में शामिल करने की दरखास्त लेकर गए थे. इन लब्जों में किसी तरह का आवेदन नहीं दिखता. ऐसी भाषा का इस्तेमाल तो किसी को चिढ़ाने के लिए किया जाता है. फिर भी असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी के नेताओं को लगता है कि लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव एआईएमआईएम को इंडी गठबंधन में शामिल कर लेंगे तो यह उनकी भूल है या फिर वे लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को भी पता है कि लालू परिवार उनकी पार्टी को इंडी गठबंधन में शामिल नहीं करने वाला. कांग्रेस ने तो पहले ही पल्ला झाड़ लिया है और राजद के पाले में गेंद डाल दी है. असदुद्दीन ओवैसी यह जानने के बाद भी गठबंधन में शामिल होने को बेताब हैं. आखिर क्यों?
हमारी कोशिश है कि सभी एकजुट होकर चुनाव में जाएं, ताकि बिहार में सांप्रदायिक शक्तिों को सत्ता में आने से रोका जा सके. कोई भी पार्टी अकेले इन शक्तियों को हरा पाने की स्थिति में नहीं है. हमें महागठबंधन में शामिल न किया गया तो भाजपा और एनडीए विरोधी वोटों का बंटवारा होगा और इन शक्तियों को फायदा होगा.
- अख्तरुल ईमान, बिहार प्रदेश अध्यक्ष, एआईएमआईएम
2020 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने बिहार में सीमांचल से 5 सीटों पर विजयश्री का पताका फहराया था. महागठबंधन की हार के पीछे भी ओवैसी की पार्टी की सफलता को जिम्मेदार ठहराया गया था. अगर ये सीटें ओवैसी की पार्टी के बदले राजद को मिलतीं तो एनडीए और महागठबंधन के बीच सीटों का फासला और भी कम हो जाता. इसके अलावा बाकी जगहों पर एआईएमआईएम ने राजद का वोट काटा, जिस कारण भी एनडीए को कुछ सीटों पर बढ़त हासिल हुई थी.
असदुद्दीन ओवैसी यदि भाजपा को हराना चाहते हैं और सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं तो चुनाव लड़ने के बजाय महागठबंधन का साथ दें.
- मनोज झा, राज्यसभा सांसद, राजद
2020 से 2025 के बीच में मोदी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिसे मुस्लिम समुदाय में नाराजगी है. जैसे, नागरिकता कानून का लागू होना, वक्फ बिल पास होना, घुसपैठियों के खिलाफ बड़ा मिशन शुरू करने का ऐलान करना इत्यादि. इसके अलावा चुनाव आयोग की ओर से बिहार में शुरू किए गए एसआईआर को लेकर भी मुसलमानों में नाराजगी है. उन्हें लगता है कि इसके माध्यम से उनका वोट का अधिकार खत्म करने की कोशिश की जा रही है. हालांकि चुनाव आयोग ने इसे लेकर कई मर्तबा सफाई देने की कोशिश की है.
इन सबके कारण मुस्लिम समुदाय भाजपा या फिर एनडीए को वोट करेगा, इसकी उम्मीद कम ही है. हालांकि भाजपा और जेडीयू की ओर से पसमांदा मुसलमानों को अपने पाले में करने की कोशिश की जा रही है. अब इसका कितना लाभ चुनाव में मिल पाएगा, यह तो मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा. अब सवाल है कि भाजपा और जेडीयू से नाराजगी के बाद मुस्लिम मतदाता किसके साथ जाएगा. बिहार में यह सवाल मौजूं नहीं है, क्योंकि यहां मुसलमानों का एकमुश्त वोट राजद के साथ जाता है और इस बार भी ऐसा होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है.
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने महागठबंधन में शामिल होने का प्रस्ताव लालू प्रसाद यादव से किया है तो इसका जवाब वहीं देंगे और फैसला भी वहीं लेंगे.
- कृष्णा अल्लावुरु, कांग्रेस प्रभारी, बिहार
हालांकि, असदुद्दीन ओवैसी 2020 की सफलता को दोहराने की फिराक में हैं और इसके लिए वे कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ना चाहेंगे. उनकी कोशिश कम से कम 5 सीटें हासिल करने और कुछ और सीटें जीतने की होगी, ताकि वे यह संदेश दे सकें कि उनका वोट इंटैक्ट है और बिहार में वे मुसलमानों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं. दरअसल, 2020 के चुनाव में एआईएमआईएम के जो भी विधायक जीते थे, उन्होंने कोई छाप नहीं छोड़ी. उल्टे उनमें से 5 विधायक राजद खेमे में चले गए, जिससे ओवैसी की पार्टी को जोर का झटका लगा था.
दूसरी ओर, भाजपा से नाराजगी के फलस्वरूप मुस्लिम मतदाता उस पार्टी के पक्ष में अधिक लामबंद होना चाहेंगे, जो मोदी सरकार के विरोध में अपनी आवाज अधिक बुलंदी से रख सके. इसके लिए लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी उन्हें अधिक मुफीद लग सकती है. राजद ने वक्फ कानून और नागरिकता कानून के खिलाफ आवाज भी बुलंद की थी और मुसलमानों को अपने पाले में लाने की भरपूर कोशिश की थी. यहां तक कि लालू प्रसाद यादव ने पूर्व में लोकसभा में जिस कानून की वकालत की थी, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने उसी बिल का विरोध किया था.
लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव के साथ दिक्कत यह भी आ रही है कि कांग्रेस की नजर भी अब सीमांचल पर गड़ गई है. सीमांचल से कांग्रेस के 3 सांसद भी हैं, जिसके चलते वह अब राजद पर सीमांचल की सीटों में हिस्सेदारी मांग रही है. कांग्रेस की मांग मान लेने की स्थिति में राजद का आधार वैसे भी कमजोर हो सकता है. दूसरी ओर, 6 सीट एआईएमआईएम को दिए जाने के बाद सीमांचल में राजद के लिए खानापूरी वाली स्थिति हो जाएगी, जो पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है. कोई भी पार्टी अपने आधार वोट बैंक को खोना नहीं चाहती और राष्ट्रीय जनता दल भी वहीं कर रहा है, जिससे उसका आधार खत्म न हो.
इसलिए असदुद्दीन ओवैसी को भी पता है कि लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव उन्हें महागठबंधन में एंट्री नहीं देने वाले, लेकिन वे खत लिख रहे हैं. राबड़ी आवास पर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं और केवल 6 सीटें मांग रहे हैं. उनकी मंशा महागठबंधन में शामिल होना है भी नहीं. वे बस मुस्लिम मतदाताओं को यह जताना चाहते हैं कि मैंने तो महागठबंधन में शामिल किए जाने की मांग की थी, ताकि भाजपा के विरोधी वोटों का बंटवारा न हो लेकिन लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने इसका विरोध किया और हमें महागठबंधन में शामिल नहीं किया, जिसका लाभ भाजपा को मिला.
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