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Voter Adhikar Yatra: 17 अगस्त से शुरू हुई राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा का समापन हो चुका है. समापन के मौके पर सोमवार को पटना में गांधी मैदान से आंबेडकर पार्क तक मार्च निकाला गया और फिर वहीं एक सभा हुई, जिसे महागठबंधन के शीर्ष नेताओं ने संबोधित किया. समापन के मौके पर सभी नेताओं ने अपने संबोधन में वोट चोरी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया. हां, राहुल गांधी ने कुछ अलग करने की कोशिश की और वे इसमें 'हाइड्रोजन बम' लेकर आए. पिछली बार राहुल गांधी ने 'एटम बम' फोड़ने का दावा किया था और इस बार दावा किया है कि आगे वे 'हाइड्रोजन बम' फोड़ेंगे. उन्होंने इसके लिए भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं को सावधान रहने को भी कहा. शायद उनके जेहन में सदाकत आश्रम में भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन का मुद्दा रहा होगा. राहुल गांधी की यात्रा ने बिहार में 1300 किलोमीटर का सफर तय किया और 23 जिलों के 110 विधानसभा क्षेत्रों को कवर किया. अब यह तय करने का समय है कि राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा ने क्या हासिल किया और बिहार कांग्रेस के लिए क्या बदल गया है?
कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगा गए राहुल गांधी
बिहार उन प्रदेशों में शुमार था, जहां यह माना जाता था कि कांग्रेस के लिए अब कोई संभावना बची ही नहीं है. खुद राहुल गांधी पिछले कई सालों से बिहार कांग्रेस को लेकर कई प्रयोग कर चुके थे. कई प्रभारी और प्रदेशाध्यक्ष बदले जा चुके थे, लेकिन इस बार उन्होंने खुद मोर्चा संभाला और 16 दिनों तक प्रदेश में कैंप करके यात्रा निकाली. सासाराम से शुरू हुई यात्रा 23 जिलों को कवर करती हुई पटना में आकर खत्म हुई. यात्रा का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया था कि दलित और पिछड़ा बहुल इलाके कवर किए जा सकें. आज राजनीतिक जानकार भी यह मान रहे हैं कि 20 दिन पहले और आज की बिहार कांग्रेस के जोश में भारी अंतर आ चुका है.
खास बात यह रही कि यात्रा में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल भी साझीदार रही, लेकिन हर तरफ कांग्रेस का ही झंडा दिखता रहा. जहां तहां तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने का नारा राजद कार्यकर्ता लगा रहे थे, लेकिन कांग्रेसी कार्यकर्ता उन पर हावी रहे और पार्टी का झंडा बुलंद होता चला गया. कार्यकर्ताओं में जोश आने से पार्टी जहां जमीन पर मजबूत हुई है, वहीं पार्टी की बार्गेनिंग पावर में भी इजाफा हुआ है. ऐसा इसलिए कि राहुल गांधी का साथ देने उतरे तेजस्वी यादव यात्रा के दौरान कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सके और राहुल गांधी की बातों को ही दोहराते रहे. जब महागठबंधन में सीट शेयरिंग के लिए टेबल टॉक होगी तो इसका असर देखने को मिल सकता है और कांग्रेस अधिक से अधिक सीटों की डिमांड कर सकती है.
कांग्रेस से पहली बार गच्चा खा गए लालू और तेजस्वी यादव
पिछले 20 से 25 सालों में जब से राजद और कांग्रेस चुनावी मैदान में एक साथ दिख रहे हैं, पहली बार ऐसा हुआ है कि लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को कांग्रेस ने गच्चा दे दिया. समापन समारोह में इसका खास असर देखने को मिला. लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी तो पोस्टर से ही गायब दिखे और तेजस्वी यादव का फोटो राहुल गांधी के बरक्श काफी छोटा था. मतलब वोटर अधिकार यात्रा में तेजस्वी यादव की बराबर की मेहनत पानी में चली गई और राहुल गांधी ने बड़ी ही चतुराई से पूरा का पूरा श्रेय कांग्रेस के खाते में डाल दिया. पिछले साल जब लोकसभा चुनाव हुआ था, तब लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने कांग्रेस के साथ बड़ा गेम किया था.
दरअसल, कांग्रेस ने बिहार में पप्पू यादव को पार्टी में शामिल कराया था और पूर्णिया से उनके चुनाव लड़ने की बात कही जा रही थी, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल ने पहले ही पूर्णिया से बीमा भारती को राजद का टिकट देकर कांग्रेस के सामने मुसीबत खड़ी कर दी थी. काफी जद्दोजहद के बाद भी राजद ने पूर्णिया सीट कांग्रेस के लिए नहीं छोड़ी थी और थक हारकर पप्पू यादव को बतौर निर्दलीय चुनाव मैदान में जाना पड़ा था. उसके बाद भी लालू और तेजस्वी यादव नहीं माने. राजद के दूसरे सबसे बड़े नेता तेजस्वी यादव ने तो पूर्णिया में तीन दिनों तक कैंप कर लोगों से यह अपील कर डाली थी कि भले ही भाजपा को वोट दे देना, लेकिन पप्पू यादव को मत देना. कांग्रेस के लिए यह बहुत ही शर्मिंदगी वाली बात रही. अब शायद कांग्रेस ने तेजस्वी यादव को साइड हीरो बनाकर हिसाब चुकता कर लिया है.
पहली बार बिहार में 16 दिनों तक यात्रा पर रहे राहुल गांधी
बिहार में पहली बार कांग्रेस के नेता राहुल गांधी वोटर अधिकार यात्रा के बहाने 16 दिन रहे. इस तरह की यात्रा राहुल गांधी ने किसी और प्रदेश में अभी तक नहीं निकाली है. राहुल गांधी के इस कदम से बिहार कांग्रेस में जान आ सकती है. राजनीतिक जानकार भी ऐसा मानते हैं. पूरी यात्रा में राहुल गांधी फ्रंटफुट पर तो तेजस्वी यादव बैकफुट पर नजर आए. बिहार कांग्रेस ने पहली बार जज्बा दिखाया है और अगर यही उत्साह बना रहता है तो चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए खुशखबर ला सकते हैं. अब जब महागठबंधन के नेता सीटों के बंटवारे की बात करेंगे तो कांग्रेस के नेता अलग ही उत्साह से लबरेज नजर आएंगे.
वोटर अधिकार यात्रा से पहले बिहार में यह चर्चा चल रही थी कि राजद ने कांग्रेस को 40 से 50 सीटें ही देने का फैसला किया है और उसके कोटे की अन्य सीटें भाकपा माले को दी जा सकती हैं, लेकिन अब यात्रा के समापन के बाद इस बात को शायद ही कोई बल देगा. राजद भी कांग्रेस के इस बदली रणनीति से भौंचक रह गई है. इसमें कोई दोराय नहीं है कि वोटर अधिकार यात्रा के बाद कांग्रेस की अहमियत बिहार की राजनीति में तेजी से बढ़ी है और यह बात अब शायद लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को भी महसूस हो रही होगी.
यात्रा का रूट बनाने में इस फैक्टर पर ज्यादा फोकस
अब चूंकि यात्रा का समापन हो गया है तो इसके शुरू होने की जगह और समापन की जगह से भूगोल का तो पता चलता ही है, वोटबैंक पॉलिटिक्स का भी भान होता है. यात्रा के रूट में दलित, अतिपिछड़ा और मुस्लिम वोटबैंक के इलाकों का खास ध्यान रखा गया और उन्हीं की बस्तियों से यह यात्रा गुजारी गई. सासाराम, जहां से यात्रा शुरू हुई, वह खुद ही अपने आप में दलित बहुत इलाका है. इसके अलावा दरभंगा में दलित, अतिपिछड़ा और मुस्लिमों की तादाद अच्छी खासी है. हालांकि दरभंगा समेत पूरा मिथिलांचल एनडीए का गढ़ रहा है, लेकिन राहुल गांधी और उनकी टीम बड़े ही सधे अंदाज में यात्रा को अंतिम रूप दिया. कांग्रेस अध्यक्ष मल्ल्किार्जुन खड़गे यात्रा की शुरुआत और समापन दोनों ही मौकों पर मौजूद रहे और उनका परिचय सबसे पहले दलित नेता के रूप में कराया गया. इससे कांग्रेस की प्राथमिकताओं के बारे में परिचय मिल जाता है.
कांग्रेस का मिशन उत्तर बिहार
जब हम कांग्रेस के मिशन उत्तर बिहार की बात करते हैं तो इसके भूगोल को भी उतना ही बारीकी से समझना होगा. दरअसल, मिथिलांचल में कांग्रेस ने उन सीटों को खासतौर से कवर किया, जहां 2020 के विधानसभा चुनाव में वह दूसरे नंबर पर रही थी. जैसे सीतामढ़ी की रीगा, दरभंगा की जाले, मधुबनी की फुलपरास, पश्चिम चंपारण की बेतिया और नौतन आदि. कांग्रेस का मकसद रनर अप रही सीटों पर विनर बनने की है और इस यात्रा के जरिए वह कार्यकर्ताओं में एक उम्मीद जगा गई है. उत्तर बिहार पिछले कुछ साल से एनडीए के लिए पारसमणि की तरह रहा है. अब राहुल गांधी उन सीटों पर फोकस कर रहे हैं, जहां कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरणें दिख रही हैं.
मुख्यमंत्री उम्मीदवार पर राहुल गांधी की चुप्पी
राजद नेता तेजस्वी यादव को तब निराशा हुई होगी, जब महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के सवाल पर राहुल गांधी ने चुप्पी साध ली थी. बगल में खड़े तेजस्वी यादव को उम्मीद थी कि भले ही बिहार कांग्रेस के नेता उन्हें आंखें दिखाएं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान से वे अपने मन की बात मनवा ही लेंगे, लेकिन राहुल गांधी के तेवर इस बार बदले हुए लग रहे थे. वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार के नाम पर चुप हो गए. हालांकि इसका मतलब यह कतई नहीं कि कांग्रेस अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है, बल्कि इसलिए कि वह तेजस्वी यादव के नाम पर अपनी सहमति देकर दलितों, अति पिछड़ों को खुद से दूर करना नहीं चाहती.
तेजस्वी यादव के नाम पर कांग्रेस में हिचक है, लेकिन यह चुनाव से पहले वाली हिचक है. चुनाव के बाद कांग्रेस में हिम्मत ही नहीं है कि वह तेजस्वी यादव को बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार न करे. कांग्रेस अभी उतनी मजबूत भी नहीं हुई है. बिहार में यात्रा निकालकर राहुल गांधी ने मजबूती की नींव जरूर रखी है, लेकिन बाढ़ग्रस्त रहने वाले बिहार में कांग्रेस अपनी नींव कितनी मजबूत कर पाती है, यह तो देखने वाली बात होगी.
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