)
Bihar Politics: राजतंत्र में सत्ता का हस्तांतरण दो तरीके से होता था. पहला, राजतिलक के माध्यम से युवराजों को राजगद्दी सौंपी जाती थी और दूसरा, राजा या राजा के उत्तराधिकारी को मारकर सिंहासन पर कब्जा जमाया जाता था. इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जब या तो रक्तपात या फिर बिना खून बहाए सिंहासन एक राजा से दूसरे राजा के हाथ में चला गया. अब जमाना लोकतंत्र का है. यहां सिंहासन यानी राजगद्दी पर कब्जा करना आसान नहीं है, क्योंकि यहां जनता तय करती है कि किसका शासन होगा और किसका नहीं. ऐसे में इसका भी तरीका ईजाद कर लिया गया है. अब सिंहासन नहीं, पार्टियां कब्जाई जाती हैं. जिसके पाले में जितना मजबूत राजनीतिक दल होगा, उसके सिंहासन तक पहुंचने का रास्ता उतना ही आसान होता चला जाएगा. अब यह राजनेताओं पर निर्भर करता है कि वह पार्टियों को कैसे अपने कब्जे में करते हैं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पर कब्जे का अखिलेश यादव का अपना तरीका था तो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल पर कब्जा करने का तेजस्वी यादव का अनोखा तरीका है.
लालू परिवार में तेज प्रताप और उनकी बहनें जब तक कुछ समझ पाते, तेजस्वी यादव पूरी पार्टी को अपने कंट्रोल में ले चुके थे. जब तक बाकी लोगों को समझ में बात आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और तेजस्वी यादव पूरी पार्टी पर हावी हो चुके थे. बगावत की स्थिति पैदा होती, उससे पहले एक इंस्टाग्राम पोस्ट को लेकर तेज प्रताप यादव को न केवल पार्टी बल्कि पूरे परिवार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. जब तेज प्रताप को निकाला गया, तब उनकी बहनों ने चुप्पी साधे रखी. शायद इनमें उनका अपना कोई स्वार्थ होगा, लेकिन बगावत की चिंगारी अंदर ही अंदर सुलग रही थी.
ताजा मामला तब सतह पर आया, जब राष्ट्रीय जनता दल के दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता संजय यादव को बिहार अधिकार यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव की सीट पर बैठे देखा गया. राजद के ही कई नेताओं को यह नागवार गुजरा और सोशल मीडिया पर इसको लेकर तमाम पोस्ट किए जाने लगे. लालू प्रसाद यादव को किडनी देकर जीवनदान देने वाली उनकी बेटी रोहिणी आचार्य ने ऐसे किसी पोस्ट को अपने हैंडल से शेयर कर दिया. फिर क्या था, राजनीतिक तूफान सा आ गया. अंदर ही अंदर बात इतनी बिगड़ गई कि रोहिणी आचार्य ने एक्स हैंडल पर सभी को अनफॉलो कर दिया और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सिंगापुर चली गईं हैं.
हालांकि, 21 सितंबर को किए गए एक पोस्ट में रोहिणी आचार्य ने लिखा, 'मेरे संदर्भ में ट्रोलर्स, उद्दंडों, पेड-मीडिया एवं पार्टी हड़पने की कुत्सित मंशा रखने वालों द्वारा फैलाए जा रहे तमाम अफवाह निराधार और मेरी छवि को नुकसान पहुंचाने के मकसद से किए जा रहे दुष्प्रचार का हिस्सा हैं.. मेरी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा न कभी रही थी, न है और ना ही आगे रहेगी, न मुझे खुद विधानसभा का प्रत्याशी बनना है, ना ही किसी को प्रत्याशी बनवाना है, न राज्यसभा की सदस्य्ता की मेरी कोई आकांक्षा है, न ही परिवार के किसी भी सदस्य से मेरी किसी भी प्रकार की प्रतिद्वंद्विता है और ना ही पार्टी या भविष्य में बनने वाली किसी भी सरकार में किसी पद की कोई लालसा है.. मेरे लिए मेरा आत्मसम्मान, मेरे माता-पिता के प्रति सम्मान व समर्पण, मेरे परिवार की प्रतिष्ठा ही सर्वोपरि है.'
लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने रोहिणी आचार्य का खुलकर समर्थ किया है. तेज प्रताप यादव ने कहा, 'वे अपनी बहन की गोद में खेले हैं और वह जो कह रही हैं, बिल्कुल सही कह रही हैं. रोहिणी ने लालू प्रसाद यादव को अपनी किडनी देकर एक ऐसा काम किया है, जो हमेशा इतिहास में दर्ज रहेगा. बहन का अपमान करने वालों पर कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलेगा. परिवार के अंदर के मतभेद का फायदा उठाकर बाहरी लोग सत्ता हथियाना चाहते हैं. हर पार्टी में RSS और बीजेपी की सोच के लोग घुसपैठ कर चुके हैं. रोहिणी आचार्य ने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ी है और हर किसी को यह समझना होगा.'
तेज प्रताप के लिए सहानुभूति तो रोहिणी के लिए आदर का भाव
2020 का मुकबला बहुत नजदीकी था. तेजस्वी यादव की सरकार बनते बनते रह गई थी. इस बार तेजस्वी यादव की पूरी कोशिश उस कम अंतर को पाटकर अपनी सरकार बनाने की है, लेकिन परिवार और पार्टी में कलह उनका बना बनाया काम खराब कर सकती है. लालू प्रसाद यादव ने भले ही तेज प्रताप यादव को परिवार और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है, लेकिन लोगों की नजर में उनका अपराध इतना सा ही है कि उन्होंने अपने संबंधों को जाहिर किया. हालांकि उनका दावा है कि अनुष्का यादव से संबंधों वाला पोस्ट उन्होंने नहीं किया था. सोशल मीडिया पर आमलोगों की राय है कि प्रेम करना कोई गुनाह नहीं है और तेज प्रताप यादव को इतनी बड़ी सजा नहीं मिलनी चाहिए थी.
इसके अलावा रोहिणी आचार्य ने तो लालू प्रसाद यादव को अपनी किडनी दी है. इसलिए विरोधी दलों के नेता भी रोहिणी आचार्य को लेकर सोच समझकर बोलते हैं. भाजपा और जेडीयू के नेता भले ही रोहिणी आचार्य की आलोचना करें, लेकिन किडनी दान करने को लेकर वे भी उनके प्रति आदर का भाव रखते हैं. भाजपा और जेडीयू या एनडीए के और दल ही नहीं, बिहार की जनता में भी रोहिणी आचार्य को लेकर एक आदर का भाव है. बिहार में लालू प्रसाद यादव की लोकप्रियता आज भी कम नहीं हुई है और उनको जीवनदान देने वाली उनकी बेटी के प्रति लोगों का आदर कैसे कम हो सकता है. ऐसे में उनकी नाराजगी तेजस्वी यादव को भारी पड़ सकती है. हालांकि, एक कड़वा सच यह भी है कि राजनीति में आगे बढ़ने के लिए आदर्शों और उसूलों की परवाह नहीं की जाती.
इंदिरा गांधी ने कब्जा ली थी पूरी कांग्रेस
राजनीतिक दलों पर कब्जे का इतिहास नया नहीं है. आजाद भारत में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिर गांधी ने सबसे पहले अपनी पार्टी कांग्रेस पर कब्जे की जंग छेड़ी थी. ताशकंद में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद कांग्रेस ने पहले प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी सौंपी थी. कांग्रेसियों ने समझा था कि इंदिरा गांधी गूंगी गुड़िया की तरह काम करेंगी, लेकिन इंदिरा गांधी उम्मीदों के विपरीत निकलीं और अंत में 12 नवंबर को उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था. तब एम. कामराज कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे. उसके बाद निजलिंगप्पा पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए. 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस फिर से जीत गई थी और प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी ने फिर से शपथ ले ली थी.
इंदिरा गांधी की कार्यशैली कांग्रेस के कुछ नेताओं की आंखों में खटकने लगी. सरकार और संगठन के बीच में शीतयुद्ध की नौबत आ गई थी. इस बीच राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन का निधन हो गया तो कांग्रेस नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से राय मशविरा किए बगैर नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया था. इसके बाद इंदिरा गांधी निर्दलीय वीवी गिरि के समर्थन में खड़ी गई थीं. इंदिरा गांधी ने संसद सदस्यों से अंतरात्मा की आवाज पर वोटिंग करने की अपील की थी. उनकी अपील काम आई और वीवी गिरि राष्ट्रपति चुनाव जीत चुके थे. इससे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आपे से बाहर हो गए और 12 नवंबर, 1969 को इंदिरा गांधी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
उसके बाद इंदिरा गांधी ने देशव्यापी दौरे किए और कांग्रेस की बैठकों में जाना बंद कर दिया था. 1 नवंबर, 1969 को कांग्रेस कार्यसमिति की दो बैठकें हुई थीं. एक प्रधानमंत्री आवास पर तो दूसरी कांग्रेस कार्यालय में. कांग्रेस की बैठक में संसदीय दल से नया नेता चुनने को कहा गया था. इस बीच इंदिरा गांधी ने कांग्रेस आर नाम से नई पार्टी बना ली और पुरानी पार्टी का नाम कांग्रेस ओ हो गया था. इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने तत्काल अधिवेशन बुलाया और 705 में से 450 सदस्यों ने इसमें भाग लिया. संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस के 429 में से 310 सांसद इंदिरा गांधी के साथ आ गए थे. इनमें लोकसभा के सांसदों की संख्या 220 थी. अब इंदिरा गांधी को सरकार बचाने के लिए दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत थी. उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, वाम दल और निर्दलीयों से समर्थन मांगा और उनकी सरकार बच गई थी. अब सरकार और संगठन दोनों पर इंदिरा गांधी का कब्जा हो गया था. उसके बाद इंदिरा गांधी 1977 तक प्रधानमंत्री रही थीं.
अखिलेश यादव ने ऐसे किया था समाजवादी पार्टी पर कब्जा
29 दिसंबर, 2016 को समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने तीन नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बर्खास्त कर दिया था. इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सैफई महोत्सव में शामिल न होने की अटकलें लगाई जाने लगीं. हालांकि महोत्सव शुरू होने के चौथे दिन यानी 1 जून, 2016 को अखिलेश यादव सैफई पहुंचे थे.
2 जून, 2016 को अखिलेश यादव ने मुख्तार अंसारी से नजदीकी रखने के कारण मंत्री बलराम यादव को बर्खास्त कर दिया था और 25 जून को समाजवादी पार्टी ने मुख्तार अंसारी से नाता तोड़ दिया था. हालांकि, 27 जून, 2016 को बलराम यादव को फिर से मंत्री बनाया गया. शपथ ग्रहण समारोह में शिवपाल यादव तो मौजूद थे पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नदारद रहे थे.
14 अगस्त, 2016 को शिवपाल यादव ने पार्टी नेताओं पर जमीन के खरीद फरोख्त में शामिल होने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की धमकी दी थी. इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को चेताया था कि अगर शिवपाल यादव इस्तीफा देते हैं तो पार्टी दो भागों में बंट जाएगी.
13 सितंबर, 2016 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के करीबी और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटा दिया था. इसके बाद मुलायम सिंह और महासचिव अमर सिंह की मुलाकात के बाद अखिलेश यादव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था. बदले में अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के सभी करीबियों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया था.
14 सितंबर, 2016 को शिवपाल यादव ने सैफई में विशाल रैली का आयोजन किया तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें मिलने के लिए दिल्ली बुलाया. इस बीच अखिलेश यादव ने कहा कि सारे विवाद की जड़ अमर सिंह हैं.
अगले दिन यानी 15 सितंबर, 2016 को शिवपाल यादव ने पार्टी और सरकार से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन अखिलेश यादव ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया था. 16 सितंबर को मुलायम सिंह लखनऊ पहुंचे और शिवपाल यादव को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लिया. इसके बाद शिवपाल के करीबियों को फिर से सरकार में शामिल कर लिया गया था.
30 दिसंबर, 2016 को मुलायम सिंह ने अपने बेटे अखिलेश यादव को पार्टी से 6 साल के लिए बर्खास्त कर दिया था. ठीक एक दिन बाद अखिलेश यादव ने 200 विधायकों के साथ बैठक की. बैठक में विधायकों ने अखिलेश यादव की सपा में वापसी पर मुहर लगा दी थी.
1 जनवरी, 2017 को अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया और मुलायम सिंह यादव को मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया गया था.
बिहार की नवीनतम अपडेट्स के लिए ज़ी न्यूज़ से जुड़े रहें! यहाँ पढ़ें Bihar News in Hindi और पाएं Bihar latest News in Hindi हर पल की जानकारी । बिहार की हर ख़बर सबसे पहले आपके पास, क्योंकि हम रखते हैं आपको हर पल के लिए तैयार। जुड़े रहें हमारे साथ और बने रहें अपडेटेड!