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Supreme Court On Bihar SIR: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तिथि बढ़ाने को लेकर आज (सोमवार, 01 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है. कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी है कि कोर्ट ने पिछले आदेश में कहा था कि आधार को दस्तावेज के तौर पर स्वीकार करना है. प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनाव आयोग ये नहीं बता रहा कि रिन्यूमेरेशन फॉर्म के साथ क्या दस्तावेज लगाया गया है. हमें आशंका है कि बहुत रिन्यूमेरेशन फॉर्म खुद BLO के द्वारा भरा गया है. चुनाव आयोग कुछ मतदाताओं को नोटिस जारी कर रहा है और कह रहा है कि दस्तावेज में कमी है.
चुनाव आयोग ने अपने निर्देश का बचाव करते हुए कहा है कि उसे इस तरह की प्रक्रिया करने का अधिकार है और आगामी बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूचियों में केवल पात्र नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए यह संशोधन महत्वपूर्ण है.
अधिवक्ता प्रशांत भूषण: कई मुद्दे हैं. शनिवार को दायर कुछ आवेदनों को सूचीबद्ध नहीं किया जा सका. एक मुद्दा आवेदन दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने से संबंधित है... दूसरा आदेशों का प्रचार-प्रसार, मतदाताओं को सूचित करना आदि. तीसरा, यदि मतदाता के पास आधार कार्ड है तो प्रविष्टि को न हटाना. पिछले आदेश में कहा गया था कि जब दावे और आपत्तियाँ दायर की जाएँगी, तो आधार भी दायर किया जाएगा.
न्यायमूर्ति सूर्यकांत: सत्यापन के लिए आधार को एक दस्तावेज़ के रूप में लिया जाएगा.
प्रशांत भूषण: यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि आधार... उन्होंने मतदाताओं से प्राप्त फ़ॉर्म भी अपलोड नहीं किए हैं. जब तक मैं यह न देख लूँ कि कौन से फ़ॉर्म प्राप्त हुए हैं...
जस्टिस कांत: हमें आधार कार्ड की धारा 9 के बारे में स्पष्ट होना होगा. आधार कार्ड से जो भी मूल्य जुड़ा है, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए.
प्रशांत भूषण: उन्होंने मतदाताओं को वह नहीं दिया जो उनसे प्राप्त हुआ था. जब तक मुझे यह पता न हो... उन्होंने पहले चरण में आधार स्वीकार नहीं किया था.
प्रशांत भूषण: मान लीजिए मैंने कोई दस्तावेज़ संलग्न नहीं किया है. वे कह रहे हैं कि जिसने भी फ़ॉर्म जमा किया है, वह ड्राफ्ट सूची में है. हमारा कहना है कि इनमें से कई फ़ॉर्म मतदाताओं द्वारा स्वयं नहीं भरे गए हैं.
वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी (चुनाव आयोग की ओर से): अगर दस्तावेज़ों में कोई विसंगति है, तो हम 7 दिनों के भीतर नोटिस देंगे. 7.24 करोड़ में से 99.5% ने दस्तावेज़ जमा कर दिए हैं. ज़्यादातर राजनीतिक दल सिर्फ़ नाम हटाने के लिए आवेदन कर रहे हैं, नाम शामिल करने के लिए नहीं.
प्रशांत भूषण: वे अपनी नियमावली का भी पालन नहीं कर रहे हैं.
जस्टिस कांत: जो भी प्रावधान निर्धारित किया गया है, वह चुनाव आयोग की प्रतिबद्धता है. उसका पालन किया जाना चाहिए. उनकी नियमावली के बिंदु 11 में दावों और आपत्तियों के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित है. वे उसका पालन नहीं कर रहे हैं.
द्विवेदी: सभी ने दस्तावेज़ जमा कर दिए हैं. मुझे नहीं पता कि वे किसके लिए बहस कर रहे हैं.
न्यायमूर्ति कांत: मान लीजिए कि आप आज 1,000 मतदाताओं का सत्यापन कर पाते हैं. और मान लीजिए कि 100 में आपको विसंगतियाँ मिलती हैं. क्या आप इसका खुलासा करने के लिए 25 सितंबर तक इंतज़ार करेंगे?
द्विवेदी: नहीं, इसमें 7 दिन लगेंगे. यह एक सतत प्रक्रिया है. राजद ने अपने बीएलए से केवल 10 दावे प्रस्तुत किए हैं. किसी को भी बाहर नहीं किया गया है. उनकी एकमात्र चिंता यह है कि यह राजद के नाम पर क्यों नहीं दिखाया गया है. सीपीआईएम ने शामिल करने के लिए 103 और बाहर करने के लिए 15 दावे प्रस्तुत किए थे. अधिकांश दावे बाहर करने के पक्ष में हैं.
न्यायमूर्ति कांत: मतदाताओं के नाम हटाने के लिए वे क्या आधार तलाश रहे हैं?
द्विवेदी: ज़्यादातर मामलों में, मतदाता स्वयं आगे आकर कहते हैं कि उनका नाम कहीं और शामिल है और उसे हटाने का अनुरोध करते हैं. द्विवेदी ने अपने नोट में लिखा है: 2.7 लाख नाम हटाए गए हैं. आपत्ति दर्ज करने के लिए अधिकतम 30 दिन का समय दिया गया है. बीएलए को एएसडी सूची भी दी गई है. 1 सितंबर के बाद दावे, आपत्तियाँ या सुधार दर्ज करने पर कोई रोक नहीं है. मतदाता सूची अंतिम रूप से तय होने के बाद उन पर विचार किया जाएगा. सभी शामिल और बहिष्कृत नामों को अंतिम सूची में शामिल किया जाएगा.
द्विवेदी: वे 30 सितंबर के बाद भी आवेदन कर सकते हैं. उन सभी पर विचार किया जाएगा. लेकिन आज तारीखें टालने के लिए... तो हमें सभी तारीखें टालते रहना होगा, और यह एक अंतहीन प्रक्रिया होगी.
भूषण: वे कह रहे हैं कि जो लोग 1 सितंबर के बाद आवेदन करेंगे, उनके नाम 30 सितंबर को बनी सूची में नहीं दिखाई देंगे, लेकिन इसे ठीक किया जा सकता है... जब हम समय बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, तो यह कुछ समय का विस्तार है, शायद 10 तारीख तक. कारणों सहित सूची प्रकाशित करने का अनुरोध करने वाला आदेश 17 अगस्त को अपलोड किया गया था. फिर आधार जोड़ने का आदेश आया. अब बिहार में बाढ़ भी आ रही है. वे पारदर्शिता के अपने ही बनाए गए नियम का पालन नहीं कर रहे हैं. मुझे नहीं पता कि मेरे फॉर्म में क्या है.
भूषण: वे 30 सितंबर को सब कुछ कर लेंगे और 1 अक्टूबर को प्रकाशित करेंगे. उनकी आपत्तियाँ मानक प्रारूप में हैं.
जस्टिस कांत: हमें जो परेशानी हो रही है वह यह है कि हमारे तमाम निर्देशों के बावजूद, वे केवल 100-120 नामों के साथ आ रहे हैं?
भूषण: वे उन सभी लोगों से, जिनका नाम मतदाता सूची में नहीं है, फॉर्म 6 भरने को कह रहे हैं. जिसमें यह घोषणा भी शामिल है कि उनका नाम पिछली किसी भी मतदाता सूची में नहीं था.
द्विवेदी: लोगों को कोई समस्या नहीं है. केवल एडीआर को समस्या है. वे सभी फॉर्म 6 भर रहे हैं.
अधिवक्ता निज़ाम पाशा: वे समावेशन/बहिष्करण के लिए फॉर्म स्वीकार करने से इनकार कर रहे हैं और केवल फॉर्म 6 स्वीकार कर रहे हैं, जिसमें नए समावेशन की बात कही गई है. जब दस्तावेज़ दाखिल किए जाएँ, तो उसे ऑनलाइन दिखाया जाए. वे इसे बदल रहे हैं.
द्विवेदी: यह सब भ्रामक है. हम नए फॉर्म दे रहे हैं. हर हफ़्ते ये राजनीतिक दलों को भी दिए जा रहे हैं.
न्यायमूर्ति कांत: तो फिर इस मामले पर राजनीतिक दलों की मौजूदगी में सुनवाई होनी चाहिए. हम जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों से अनुरोध कर सकते हैं कि वे फॉर्म भरने में मदद के लिए अर्ध-विधिक स्वयंसेवकों को तैनात करें.
वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम (राजद की ओर से): 22 अगस्त को पहली बार आपके माननीय सदस्यों ने आधार का ज़िक्र किया था.
न्यायमूर्ति कांत: पक्षकार बहिष्कार की मांग कर रहे हैं.
आलम: वे कह रहे हैं कि राजद द्वारा दायर किए गए बीएलए के 36 दावे भ्रामक हैं. कृपया मेरा आईए देखें. हलफनामे पर. वे कह रहे हैं कि मेरे पास केवल 10 दावे हैं.
न्यायमूर्ति कांत: क्या यह 36 से ज़्यादा है?
आलम: हाँ.
न्यायमूर्ति कांत: लेकिन आपके अपने आईए में 36 लिखा है.
भूषण: समस्या वास्तव में पारदर्शिता की कमी में है.
द्विवेदी: समस्या मानसिकता में है. जो कि बाधा डालने की है.
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