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बिहार: पानी ही नहीं अनाज से भी आर्सेनिक का खतरा, रिसर्च में हुआ खुलासा

वर्कशॉप में यूनिवर्सिटी ऑफ सैलफोर्ड मैनचेस्टर, जाधवपुर यूनिवर्सिटी पश्चिम बंगाल, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur), आईआईटी रुड़की समेत देश के कई जाने माने रिसर्च संस्थानों के स्कॉलरों ने भाग लिया.

बिहार: पानी ही नहीं अनाज से भी आर्सेनिक का खतरा, रिसर्च में हुआ खुलासा
अनाज से भी ऑर्सेनिक का खतरा.

पटना : बिहार में आर्सेनिक कैंसर (Cancer) का खतरा बढ़ गया है. बिहार के 38 में से 18 जिले आर्सेनिक की चपेट में आ गये हैं. इस बात का खुलासा पटना (Patna) में आयोजित पर्यावरण में आर्सेनिक और स्वास्थ्य पर इनका प्रभाव विषय के दौरान हुआ. विशेषज्ञों की माने तो अब केवल पानी से ही आर्सेनिक का खतरा नहीं है, बल्कि चावल, गेहूं और आलू भी आर्सेनिक कैंसर की बड़ी वजह बन सकते हैं.

वर्कशॉप में यूनिवर्सिटी ऑफ सैलफोर्ड मैनचेस्टर, जाधवपुर यूनिवर्सिटी पश्चिम बंगाल, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur), आईआईटी रुड़की समेत देश के कई जाने माने रिसर्च संस्थानों के स्कॉलरों ने भाग लिया.

आर्सेनिक इन वाटर एंड फूड चेन को लेकर रिसर्च करने वाली यूनिवर्सिटी ऑफ सैलफोर्ड मेनचेस्टर की देबप्रिया मोंडल ने बताया कि ''आर्सेनिक के प्रभाव की जांच के लिए बिहार के 77 आर्सेनिक प्रभावित घरों का चयन किया. जहां पानी के साथ-साथ चावल और आटे की भी जांच की गयी. जिसमें चावल और आटे में आर्सेनिक का बराबर प्रभाव पाया गया, जबकि आटे में इसका प्रभाव कम होना चाहिए था, क्योंकि गेहूं में आर्सेनिक का प्रभाव सिर्फ गेहूं के दाने के उपरी सतह में पाया जाता है, जबकि चावल अपने कल्टिवेशन के दौरान पूरा आर्सेनिक ऑब्जर्व कर लेता है. आटा बनने के बाद आर्सेनिक का प्रभाव कम हो जाना चाहिए था, लेकिन इसका प्रभाव बिल्कुल भी कम नहीं हुआ.''

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कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने कोलकाता और बिहार में आर्सेनिक की स्थिति की जानकारी दी. पूरे देश में बिहार के बाद कोलकाता और असम ही आर्सेनिक प्रभावित राज्य हैं. जानकारों ने बताया कि आर्सेनिक अब सिर्फ पानी तक ही सीमित नहीं है. किसान इसी पानी का इस्तेमाल खेती में भी करते हैं, जिसके कारण आर्सेनिक का असर खेतों से निकलने वाले गेहूं, चावल और आलू जैसे उत्पादों में दिखने लगा है. पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के चेयरमैन अशोक घोष ने कहा कि ''आर्सेनिक का प्रभाव सिर्फ पानी तक ही सीमित नहीं हैं. आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में उपजनेवाले चावल गेहूं और आलू का सप्लाई दूसरों जिलों में भी हो रहा है. जिसके कारण गैरप्रभावित जिले भी इसकी चपेट में आ गये हैं.''

विशेषज्ञों की माने तो आर्सेनिक लाईलाज नहीं है. आर्सेनिक के पानी को ठीक करने के लिए संयंत्र लगाये जा सकते हैं. प्रति 200 की आबादी पर आर्सेनिक मुक्त पानी उपलब्ध कराने के लिए जो मशीन मार्केट में उपलब्ध है उसकी कीमत दो से तीन लाख रुपये तक आती है. बिहार में कुछ जगहों पर ये मशीन लगायी भी गई है, लेकिन रखरखाव की कमी के कारण मशीन खराब हो गई है.

ऐसे में किसानों को धान की खास किस्म का उत्पादन करना होगा जो आर्सेनिक को ऑब्जर्व नहीं करते हैं. विशेषज्ञों ने बताया कि सोनम सुगंधा और बीपी धान की ऐसी तीन किस्में हैं, जो आर्सनिक को लेकर सबसे सुरक्षित मानी जा रही हैं. इनपर रिसर्च हो चुका है, जहां तक गेहूं की बात है तो इसपर रिसर्च अभी जारी है. 

(Edited By Meena Bisht)