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झारखंड : कराह रही महिला को देख नहीं पसीजा डॉक्टरों का दिल, RIMS में नहीं लिया एडिमट

महिला की तस्वीरें काफी विचलित कर देने वाली है. किसी की भी रूह कांप जाए इन तस्वीरों को देखकर. 

झारखंड : कराह रही महिला को देख नहीं पसीजा डॉक्टरों का दिल, RIMS में नहीं लिया एडिमट
अस्पताल के बाहर कराहती महिला.

सौरभ शुक्ला, रांची : वो तो अपनों का इंतजार कर रही थी. इंतजार उस रहनुमा की कर रही थी जो इसके जख्म पर मरहम लगा दे. उसके मर्म को ठीक करने के लिए सरकार करोड़ों रुपए स्वास्थ्य व्यवस्था पर खर्च कर रही है. इसके लिए राज्य में एक बड़ा अस्पताल बनाया, जिसका नाम रिम्स है. महिला उसी रिम्स परिसर में पड़ी है, जहां लोग ठीक होने की उम्मीद लिए इलाज के लिए पहुंचते हैं. महिला का गुनाह इतना है कि इसका कोई अपना नहीं है. सिर पर गहरे घाव हैं. जख्मों में कीड़े लग गए, लेकिन इसे एडमिट नहीं लिया गया.

महिला की तस्वीरें काफी विचलित कर देने वाली है. किसी की भी रूह कांप जाए इन तस्वीरों को देखकर. सिर के गहरे जख्मों पर कीड़े अपना जाल बिछा चुके हैं. इसे तो अब जीने की उम्मीद भी नहीं थी, लेकिन सूरज की एक किरण की तरह रिम्स का ही एक कर्मचारी दीपक का दिल पसीज गया.

दीपक अपने किरदार से अलग कभी डॉक्टर बनकर उसके जख्म पर दवा डालता, तो कभी उसका अपना बेटा बन उसे निवाला खिलाता और पानी पिलाता. दीपक अपने हाथों से उसका बाल भी काटा, ताकि कीड़े काम हों.

इसी राह से गुजर रहे एक और इंसान से रहा नहीं गया तो उसने भी महिला की मदद की. खुद बाजार से कैंची खरीद कर लाया, ताकि उसके बाल को काटा जा सके. उसके जख्मों की पीड़ा कम हो, उसके घाव में लगे कीड़े खत्म हो. लेकिन दीपक डॉक्टर नहीं था. जरूरत उस महिला को डॉक्टर की थी, जो उसकी जान बचाए. अब तो वो उम्मीद ही छोड़ चुकी है और लापरवाह सिस्टम के साथ सभ्य समाज की भी नजर उसपर नहीं पड़ती है.

जाहिर है लापरवाह सिस्टम और सिस्टम में लगे कीड़े उस महिला के जख्मों के कीड़े को और बढ़ा रहं हैं. उम्मीद कम है, लेकिन सवाल इस सभ्य समाज और सिस्टम से है कि आखिरकार जख्मों के मर्म को हम और हमारे डॉक्टर क्यों नहीं समझते हैं.

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