झारखंड में धड़ल्ले से हो रही अफीम की खेती, नक्सल इलाके में रोकना पुलिस के लिए चुनौती

झारखंड वो राज्य जहां के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 30 फीसदी हिस्सा जंगल है, वो राज्य जो कभी अपनी खनिज संपदाओं के लिए जाना जाता था. अब अफीम जैसे नशीले पदार्थ की खेती की वजह से उड़ता झारखंड के नाम से बदनाम हो रहा है.

झारखंड में धड़ल्ले से हो रही अफीम की खेती, नक्सल इलाके में रोकना पुलिस के लिए चुनौती
पुलिस मुख्यालय का कहना है कि उसे दूसरी एजेंसियों का सपोर्ट नहीं मिल पा रहा

रांची: झारखंड में नशे की खेती की दास्तां 2006 से शुरू हुई और हर बार अफीम की खेती को नष्ट करने को लेकर मंथन और रणनीतियां तो बनती है लेकिन फिर भी झारखंड में अफीम का फसल लहलहाता है. मामले पर पुलिस मुख्यालय का कहना है कि उसे दूसरी एजेंसियों का सपोर्ट नहीं मिल पा रहा जिस कारण उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

झारखंड वो राज्य जहां के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 30 फीसदी हिस्सा जंगल है, वो राज्य जो कभी अपनी खनिज संपदाओं के लिए जाना जाता था. अब अफीम जैसे नशीले पदार्थ की खेती की वजह से उड़ता झारखंड के नाम से बदनाम हो रहा है. साल दर साल यहां अवैध तरीके से अफीम की खेती बढ़ती जा रही है और पुलिस हर साल की तरह इस साल भी इसे नष्ट करने में जुटी है.

खासकर प्रदेश के 5 जिले नशे की खेती से ज्यादा प्रभावित हैं जिनमे राजधानी रांची का भी नाम शुमार है. वहीं, इस खेती का केंद्र बना हुआ है प्रदेश का चतरा जिला जहां अब अफीम से मॉर्फिन बनाया जा रहा है. इन जिलों के अलावा लातेहार, खूंटी और पलामू जिले में भी बड़े पैमाने पर अफीम की खेती होती है. प्रदेश के कितने बड़े भू भाग में अफीम की खेती होती है इसे लेकर कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं लेकिन कुछ आंकड़े हैं जिसे ये बात साफ होता है कि नशे का कारोबार प्रदेश में बढ़ा है.

नशे की खेती को लेकर प्रदेश पुलिस मुख्यालय का कहना है कि सूबे की भौगोलिक स्थिति अफीम की खेती के लिए मुफीद हो जाती है. पुलिस और अन्य एजेंसियों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है और इस वजह से थोड़ी परेशानी होती है. उन्होंने बताया कि अफीम की खेती को नष्ट करने के लिए पुलिस ज्यादातर इलाकों में अकेले अभियान चलाती है. दूसरी एजेंसियों से उतना सहयोग नही मिल पाता है. प्रदेश के पुलिस प्रवक्ता एडीजी अभियान ने कहा कि अगर दूसरी एजेंसियों का सहयोग ज्यादा मिलता तो परिस्थियां पुलिस के अनुकूल होती.

पुलिस मुख्यालय ने जिन एजेंसियो का जिक्र किया उनमें नारकोटिक्स और वन विभाग शामिल है. नारकोटिक्स में प्रदेश में 12 कर्मी हैं जिस कारण प्रदेश भर के अभियान में उनका उतना सहयोग मिल पा रहा. वन विभाग भी इस मामले में थोड़ी सुस्ती बरत रही है. पुलिस प्रवक्ता का कहना है कि ज्यादातर अफीम की खेती वैसे इलाको में होती है जो नक्सल प्रभावित हैं और इसी की वजह से ये कहना भी गलत नही की नशे के कारोबार में नक्सल का साया है.

दुर्गम नक्सल इलाकों में अफीम की खेती सभी के लिए बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है और यही वजह है कि इन खेतो में लहलहा रही फसलों को नष्ट करने के लिए सभी संसाधनों का भी इस्तेमाल पुलिस भी नही कर पा रही.