बच्चों की देखरेख में मां ही नहीं, पिता की भी होती है महत्वपूर्ण भूमिका: सुशील मोदी

आमतौर पर हमारे समाज में बच्चों की चिंता करना मां का दायित्व माना जाता है, लेकिन इसमें पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है. 

बच्चों की देखरेख में मां ही नहीं, पिता की भी होती है महत्वपूर्ण भूमिका: सुशील मोदी
कार्यक्रम का उद्घान करते सुशील मोदी.

पटना: अगर किसी बच्चे का शोषण किया जा रहा है तो उसपर बच्चों को किसी भी स्तर पर जाकर विरोध करना चाहिए. अगर बच्चों को अपने विद्यालय में मध्याह्न भोजन में कोई अनियमितता मिले तो जरुर आवाज़ उठाएं. बच्चों ने मुझे जो मांग सौपें हैं उनमें से एक सुझाव जैसे स्कूलों में एक सुझाव पेटी लगाना जाए, जिसमें बच्चे शिकायत डाल सकते हैं, मैं शिक्षा विभाग के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करूंगा कि यह शिकायत पेटी हर विद्यालय में लगाई जाए. साथ ही यह भी व्यवस्था करनी होगी कि उसे विद्यालय के बाहर किसी सरकारी पदाधिकारियों की उपस्थिति में खोला जाए. इसके साथ ही बाकी सुझावों को हम पूरा करने के लिए भी काम करेंगे. बच्चों के अधिकार के साथ ही उनकी जिम्मेदारियां भी हैं. यह कहना था बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी का.

सुशील मोदी ने पटना में विश्व बाल दिवस (20 नवंबर) और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की 30वीं वर्षगांठ के अवसर पर महिला विकास निगम, समाज कल्याण विभाग और यूनिसेफ, बिहार के द्वारा आयोजित एक राज्य स्तरीय किशोर किशोरियों के शिखर सम्मलेन को संबोधित कर रहे थे.

सुशील मोदी ने कहा कि बाल विवाह से बच्चों का बचपना ख़त्म हो जाता है. सिर्फ कानून बनाने से समाज में बदलाव नहीं होगा जागृति से होगा. आमतौर पर हमारे समाज में बच्चों की चिंता करना मां का दायित्व माना जाता है, लेकिन इसमें पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है. लड़कियों के साथ घर में भी भेदभाव होता है, उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और देखभाल और खाने में घर में भी भेदभाव होता है. इसके खिलाफ भाइयों को लड़ने की आवश्यकता है. लड़कियों के अधिकारों पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है इसी तरह अनुसूचित जाति/जनजाति के बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करना जरूरी है. 
 
कार्यक्रम का उद्घाटन उपमुख्मंत्री सुशील मोदी ने मंत्री अनुसूचित जाति जनजाति कल्याण विभाग, रमेश ऋषिदेव, अपर मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग अतुल प्रसाद, विशेष सचिव दयानिधान पाण्डेय और सुजाता चालाना, महिला विकास निगम की प्रबंध निदेशक, डॉ एन विजयलक्षमी, यूनिसेफ, बिहार के प्रमुख असदुर रहमान, 500 बच्चे, सरकारी पदाधिकारियों, नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में दीप जलाकर किया. 

कार्यक्रम के दौरान  बिहार के 11 जिलों से आये बच्चों ने घर, स्कूल, समुदाय और सार्वजनिक स्थानों को बच्चों के लिए हिंसा मुक्त बनाने के लिए अपने सुझाव को उप मुख्यमंत्री, मंत्री और एवं वरीय पदाधिकारियों  के साथ साझा किया. कार्यक्रम के दौरान बिहार बाल भवन किलकारी के बच्चों ने बाल सुरक्षा पर एक नाटक की प्रस्तुति भी दी. इस नाटक के माध्यम से बच्चों ने घरों में, समाज में, स्कूल में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को उजागर किया. 

मंत्री अनुसूचित जाति जन जाति कल्याण विभाग, रमेश ऋषिदेव ने कहा कि बिहार सरकार ने बाल विवाह और दहेज़ प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया है, जिसका बहुत सकारात्मक प्रभाव आया है. महादालित समुदाय में भी कमी आई है. शिक्षा बाल विवाह को कम करने में बहुत मददगार है. हमारे विकास मित्र इसमें बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. इस अभियान का सबसे ज्यादा फायदा अनुसूचित जाति/ जन जाति के लोगों का हुआ है. 

यूनिसेफ, बिहार के प्रमुख असदुर रहमान ने कहा कि बिहार में 46 प्रतिशत आबादी 18 साल से कम उम्र के बच्चों की है जो पूरे भारत में सबसे ज्यादा है. वंचित समुदायों से आने वाले बच्चों ने बहुत ही स्पष्टता और हिम्मत के साथ विस्तृत रूप से अपने सुझाव रखे. उन्होंने सिर्फ समस्याओं की बात नहीं की बल्कि उसका हल भी बताया. बच्चों के मांगों को पूरा करने की जिम्मेदारी हम बड़ों की है. हमने बिहार सरकार को बिहार के बच्चों के लिए एक्शन प्लान विकसित करने में तकनीकी सहयोग दिया. इसके साथ ही यूनिसेफ बिहार सरकार के साथ मिलकर चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस, कोर्ट और स्कूल को हिंसा मुक्त करने के लिए तकनिकी सहयोग देती है.