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Bihar Voter Turnout: SIR का डर या कोई और वजह...बिहार की जनता में क्यों मच गई रिकॉर्डतोड़ वोटिंग की होड़

Bihar SIR Bumper Voting: लेकिन बिहार में अचानक इतनी बंपर वोटिंग होने का कारण क्या है. जाहिर तौर पर वोटिंग प्रतिशत में हुए प्रभावशाली इजाफे को यूं ही नहीं मान लेना चाहिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बाद बिहार की मतदाता सूची में काफी गिरावट आई है.

Bihar Voter Turnout: SIR का डर या कोई और वजह...बिहार की जनता में क्यों मच गई रिकॉर्डतोड़ वोटिंग की होड़

Bihar Bumper Voting: बिहार में इस बार वोटिंग के तमाम रिकॉर्ड टूट गए हैं. पहले चरण में जहां 65.08 प्रतिशत वोट पड़े वहीं दूसरे चरण में भी रिकॉर्ड तोड़ 68.76 फीसदी मतदान हुआ. 243 विधानसभा सीटों की 121 सीटों पर पहले चरण में मतदान हुआ था. जबकि 122 सीटों पर दूसरे चरण में वोट डाला गया.  कमाल की बात ये है कि साल 2020 के विधानसभा चुनाव में 57.29 फीसदी और 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार में 56.4 फीसदी वोटिंग हुई थी. 

लेकिन बिहार में अचानक इतनी बंपर वोटिंग होने का कारण क्या है. जाहिर तौर पर वोटिंग प्रतिशत में हुए प्रभावशाली इजाफे को यूं ही नहीं मान लेना चाहिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बाद बिहार की मतदाता सूची में काफी गिरावट आई है.

हटाए गए थे 30.7 लाख मतदाता

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राज्य में 2024 की लोकसभा की वोटर लिस्ट और एसआईआर के बाद फाइनल वोटर लिस्ट के तुलना में कुल 30.7 लाख मतदाता हटा दिए गए हैं, जो कुल वोटर्स की संख्या में 4% की कमी  है. वहीं पहले चरण में जिन 121 विधानसभा क्षेत्रों में वोटिंग हुई, वहां 2024 की लोकसभा की तुलना में 15.3 लाख मतदाता या 3.9% मतदाता हटाए गए. हालांकि, नए वोटिंग आंकड़ों से एक और जरूरी आंकड़ा सामने आया है.

चुनाव आयोग ने इन 121 विधानसभा क्षेत्रों के लिए रजिस्टर्ड वोटर की कुल संख्या 37.51 मिलियन बताई थी, जो फाइनल एसआईआर लिस्ट में दर्ज 37.37 मिलियन की संख्या से 0.4% ज्यादा है. इसका मतलब है कि पहले चरण के मतदान में 24.3 मिलियन वोटर्स ने वोट दिया है. यह संख्या 2024 के लोकसभा चुनावों में इन विधानसभा क्षेत्रों में मतदान करने वाले 21.55 मिलियन वोटर्स से ज्यादा है.

लिस्ट में नहीं आई कोई खास गिरावट

इस तुलना से सबसे बड़ी बात यह है कि बिहार में मतदाता सूची की एसआईआर प्रक्रिया से वोटर्स की लिस्ट में कोई खास गिरावट नहीं आई है. इसे 2010 से ठीक पांच साल के अंतराल पर हुए विधानसभा चुनावों में वोटर्स की तादाद में हुए इजाफे की जांच करके दूसरे तरीके से देखा जा सकता है.

साल 2010 और 2015 के विधानसभा चुनावों के बीच पहले चरण की 121 विधानसभा सीटों में निर्वाचकों की संख्या में 21.7% और मतदाताओं की तादाद में 30.5% की बढ़ोतरी हुई. 2015 और 2020 के चुनावों के बीच, निर्वाचकों और मतदाताओं की संख्या में लगभग समान रफ्तार से इजाफा हुआ यानी 9.2% और 9.5% फीसदी.

पहली बार वोट डालने वालों का आंकड़ा बढ़ा

2025 के चुनाव में, मतदान में 17.1% का इजाफा हुआ, जो पिछली वृद्धि दरों के बीच की दर है. हालांकि मतदाताओं की संख्या में केवल 1.1% की बढ़ोतरी हुई. इसका मतलब है कि वोटर्स की संख्या में इजाफा पहले देखी गई दर के समान ही हुई, भले ही मतदाताओं की संख्या में इजाफा धीमी रफ्तार से हुआ हो.

यह इस तर्क को सैद्धांतिक रूप से समर्थन देता है कि एसआईआर ने ज़मीनी स्तर पर वास्तविक मतदाताओं की एक बड़ी संख्या को नहीं हटाया, और हटाए गए मतदाता मुख्य रूप से उन मतदाताओं तक ही सीमित थे जो प्रवास कर गए थे या एक से ज्यादा जगहों पर रजिस्टर्ड थे. इसलिए उन मतदाताओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ, जिन्होंने पहले कभी मतदान नहीं किया था.

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Rachit Kumar

नवभारत टाइम्स अखबार से शुरुआत फिर जनसत्ता डॉट कॉम, इंडिया न्यूज, आजतक, एबीपी न्यूज में काम करते हुए साढ़े 3 साल से ज़ी न्यूज़ में हैं. शिफ्ट देखने का लंबा अनुभव है.

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