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जो खाता था मूत्रनली से निकलता था, 100 सालों में ऐसे 11 मरीज, दुर्लभ ऑपरेशन सफल

आइये आज आपको एक ऐसे ही शख्स के बारे में बताते हैं जिसके शरीर में एक ऐसी दिक्कत पाई गई जिसके बारे में कल्पना भी आप करेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे.

जो खाता था मूत्रनली से निकलता था, 100 सालों में ऐसे 11 मरीज, दुर्लभ ऑपरेशन सफल
मंगलवार को बर्दवान मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रफीकुल का ऑपरेशन किया गया जिसे डॉक्टरों की 10 सदस्यों वाली टीम ने अंजाम दिया.

बर्दवान: कई बार ऐसी बीमारी सामने आती है कि डॉक्‍टर भी उसके कारणों का पता नहीं लगा पाते. लेकिन चमत्कार भी होता है और दुर्लभ ऑपरेशन से मौत का सामना कर रहे इंसान की जिंदगी बच जाती है. आइये आज आपको एक ऐसे ही शख्स के बारे में बताते हैं जिसके शरीर में एक ऐसी दिक्कत पाई गई जिसके बारे में कल्पना भी आप करेंगे तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे. यह खबर पश्चिम बंगाल के बर्दवान ज़िले की है. यहां के रहने वाले शेख रफीकुल इस्लाम की मूत्रनली से पेशाब नहीं बल्कि वो जो भी खाता जैसे दाल, भात, मुरमुरा निकल रहा था. रफीकुल के पिता की मौत काफी साल पहले हो चुकी है और वह अपनी मां नूरजहां बीबी के साथ रहता है. दोनों मां- बेटे शक्तिगढ़ जूट मिल में काम करते हैं.

जब बीमारी का पता चला
रफीकुल जब 8 साल का था तभी से वो इस बीमारी से ग्रस्त था. कुछ भी खाने के बाद जब रफीकुल पेशाब करता तो उसके यूरिन के रास्ते से खाना बाहर निकल जाता. उसकी मां नूरजहां ने बताया कि उस वक़्त उन्हें लगा कि शायद रफीकुल को गैस की समस्या है और उसे ज़्यादा से ज़्यादा पानी पीने के लिए कहा जाने लगा लेकिन उससे भी कोई हल नहीं निकला. ऐसे ही रफीकुल ने बिना किसी डॉक्टर को दिखाए 15 साल निकाल दिए.

अब इस अद्भुत बीमारी के साथ रफीकुल की उम्र भी बढ़ती जा रही थी और वैसे-वैसे उसकी समस्या भी बढ़ती चली गई. जब परेशानी बढ़ने लगी तो रफीकुल ने कई डॉक्टरों को दिखाया मगर इससे भी कुछ ठीक नहीं हुआ. यहां तक कि कई डॉक्टरों ने उसे मानसिक बीमारी से ग्रस्त बताकर उसका इलाज तक नहीं किया.

बर्दवान मेडिकल कॉलेज
सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद जब रफीकुल को सिर्फ मायूसी हाथ लगी तो आखिर में वो बर्दवान मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंच गया जहां पर डॉक्टर नरेंद्र नाथ मुखोपाध्याय ने इस विषय को गंभीर रूप से लिया और उन्होंने रफीकुल का इलाज शुरू किया.  उनकी देखरेख में ही रफीकुल की इस बीमारी के कारण का पता चला और 19 अक्टूबर को रफीकुल को भर्ती कर लिया गया.

यूरेट्रो ड्यूडेनल फिस्‍टुला
रफीकुल का CT यूरोग्राफी किया गया और तब पता चला कि रफीकुल की खाद्य नली में छेद है और उसके ठीक नीचे के हिस्से में ड्योडनम से एक अलग से द्वार बन गया है जो सीधे किडनी के यूरेटर तक जा पहुंचा है और इसी के ज़रिये खाना सीधे यूरिन जमा करने वाली थैले तक जा रहा था. इस बीमारी का नाम यूरेट्रो ड्यूडेनल फिस्‍टुला (Uretero Duodenal Fistula) है.

बर्दवान अस्पताल के सर्जरी विभाग के डॉक्टर नरेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय ने बताया कि इंटरनेट पर रिसर्च कर पाया कि पिछले 100 सालों में पूरे विश्व में केवल 11 ही ऐसे मामले पाए गए हैं.

कैसे हुई बीमारी?
जब रफीकुल 8 साल का था तभी एक राउंड वर्म (केचुए) ने उसकी खाद्य नली में छेद कर दिया था जिससे ये समस्या शुरू हुई. कल यानी मंगलवार को बर्दवान मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रफीकुल का ऑपरेशन किया गया जिसे डॉक्टरों की 10 सदस्यों वाली टीम ने अंजाम दिया. अस्पताल के सीनियर चिकित्सक नरेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, मधुसूदन चट्टोपाध्याय और ज्योतिर्मेय भट्टाचार्य के अलावा 3 जूनियर डॉक्टर एवं 4 एनेस्थीसिया देने वाले डॉक्टर थे. करीब दो घंटे के ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों को सफलता हाथ लगी और बताया कि ऑपरेशन सफल हुआ है. रफीकुल अब पूरी तरह खतरे से बाहर है. नरेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय ने यह भी कहा की इस तरह की बीमारी उन्होंने अपने कार्यकाल में नहीं देखी है. ऑपरेशन के बाद रफीकुल की मां और उसके परिजनों के चेहरे पर ख़ुशी लौट आई और उन्होंने राहत की सांस ली.