पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता संग्रामियों की कॉलोनी के नाम से जाना जाता है ये इलाका, वजह जानकर होगा गर्व

उत्तर 24 परगना के बारासात में स्थित बर्मा कॉलोनी के निवासी आजादी की लड़ाई में शहीद हुए जवानों को खूब याद करते हैं.

पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता संग्रामियों की कॉलोनी के नाम से जाना जाता है ये इलाका, वजह जानकर होगा गर्व
स्वतंत्रता संग्रामियों की कॉलोनी के नाम से जाना जाता है ये इलाका

पश्चिम बंगाल (कमलाक्ष भट्टाचार्य): उत्तर 24 परगना के बारासात में स्थित बर्मा कॉलोनी के निवासी आजादी की लड़ाई में शहीद हुए जवानों को खूब याद करते हैं. इसके पीछे एक वजह यह भी है कि यहां वीर शहीद के परिवारवाले भी रहते हैं जो पिछले 8 दशकों से इस इलाके के मूल निवासी बनकर रह रहे हैं. यह सभी लोग म्यांमार से हैं और यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चली लड़ाई के वीर सेनानी भी इन्हीं म्यांमार से आए लोगों के परिवारवाले थे और इसी वजह से इस कॉलोनी का नाम बर्मा कॉलोनी पड़ गया या यूं कहें कि स्वतंत्रता संग्रामियों की कॉलोनी के नाम से भी यह इलाका परिचित है. 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज, INA या फिर मास्टरदा सूर्य सेन के चट्टोग्राम की अस्त्र कारागार का लूट का मामला हो, इन सभी सेनानियों ने देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी. उसी दौरान जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी और नेताजी, INA, मास्टरदा का साथ दिया था, आज उन्हीं के वंशज इस बर्मा कॉलोनी में रहते हैं जो तभी से यहां पर स्थित हैं.

हमारे शहीद सेनानियों के परिवारवाले आज भी उन दिनों को याद करते हैं जब उनके परिवार के सपूतों ने देश के लिए बलिदान दिया था. इस इलाके में रहने वाले हर एक बच्चे से बूढ़े तक के लोगों को इतिहास मुंह जुबानी याद है और आज भी उन्हें गर्व होता है कि वो एक ऐसे परिवार से हैं जिसने देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया था.

ये भी देखें- 

इस इलाके का इतिहास हीरे मोती की तरह कोने कोने में बिखरा पड़ा है. बच्चों और बूढ़ों को यहां का इतिहास मालूम है. और जब भी हर साल गणतंत्र दिवस आने वाला होता है उस वक्त यहां रहने वाले लोगों में अलग ही उत्साह देखने को मिलता है. आजाद हिन्द फौज की तरह ही आज भी यहां के बच्चे परेड में शामिल होते हैं.  

इसी कॉलोनी में रहने वाले 70 वर्षीय स्वपन कुमार नंदी के पिता नेताजी के अंगरक्षक के रूप में तैनात थे और उनकी माता झांसी वाहिनी की एक सदस्या थीं. स्वपन बाबू ने बताया कि माता पिता के मुंह से नेताजी के बारे में जो कहानी सुनी थी, आज भी अगर वो याद आ जाए तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. 

वहीं रेणुकानाथ दत्त के पति और उनके जेठ मोड़ो ही मास्टरदा सूर्यसेन के दल में अहम भूमिका निभा चुके हैं. और साथ ही हाथ में ताम्रपत्र लिए इलाके के छोटे छोटे बच्चों को आजादी की  कहानी सुनाती हैं रेणुकानाथ दत्त. साथ ही पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले सूर्य चौधरी ने बताया कि वो भी अपनी मां से इस इलाके का इतिहास सुनते हैं और उन्हें बहुत अच्छा लगता है. इलाके के मोड़ पर ही बच्चों की बाल ब्रिगेड क्लब से ऊंची आवाज में कदम कदम बढ़ाए जा का गीत चल रहा था. आज भी हमारे देश के छोटे छोटे बच्चों को आजादी के किस्से अगर सुनाए जाएं तो जरूर उनमें भी अभी से देशभक्ति की एक लहर पैदा होगी.